7 ब्राह्मण, 108 बटुक, 107 भिक्षु—धार्मिक अनुष्ठानों से भरे शपथ ग्रहण पर विवाद, सेक्युलरिज्म पर उठे सवाल
ढोल की आवाज़ें राजनीतिक नहीं थीं। शंख की ध्वनि साधारण नहीं थी। और जब बालेंद्र ‘बालेन’ शाह शपथ मंच की ओर बढ़े, तो पूरा समारोह एक सरकारी प्रक्रिया से अधिक हिंदू-बौद्ध आस्था से सजे एक सुनियोजित आयोजन जैसा नजर आया जिसे आलोचकों ने विवादास्पद भी..
ढोल की आवाज़ें राजनीतिक नहीं थीं। शंख की ध्वनि साधारण नहीं थी। और जब बालेंद्र ‘बालेन’ शाह शपथ मंच की ओर बढ़े, तो पूरा समारोह एक सरकारी प्रक्रिया से अधिक हिंदू-बौद्ध आस्था से सजे एक सुनियोजित आयोजन जैसा नजर आया जिसे आलोचकों ने विवादास्पद भी बताया।
धार्मिक अनुष्ठानों के साथ शुरू हुआ शपथ ग्रहण
बालेन शाह के शपथ ग्रहण समारोह की शुरुआत हिंदू और बौद्ध परंपराओं के साथ हुई। ब्राह्मणों ने शंखनाद किया, जबकि 108 बटुकों (युवा पुजारियों) ने स्वस्ति पाठ के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ किया। शपथ लेने के ठीक समय सात शंख बजाने की भी योजना बनाई गई थी।
समारोह का समय भी विशेष रूप से चुना गया था। शपथ ग्रहण दोपहर 12:34 बजे (भारतीय समयानुसार 12:19 बजे) रखा गया—जो “1234” की क्रमिक संख्या बनाता है। पार्टी नेताओं के अनुसार, इसे शुभ मानते हुए यह विश्वास किया गया कि इस समय शुरू किया गया कार्य सफल होगा।
हिंदू-बौद्ध मंत्रों के बीच शपथ
जैसे-जैसे कार्यक्रम आगे बढ़ा, धार्मिक मंत्रोच्चार सरकारी प्रक्रिया के साथ चलते रहे। 108 बटुकों ने ‘स्वस्ति शांति’ का पाठ किया, जबकि 107 बौद्ध भिक्षुओं ने ‘अष्टमंगल’ का जाप किया। ये दोनों अपने-अपने धर्मों में अत्यंत शुभ माने जाते हैं। इन्हीं अनुष्ठानों के बीच बालेन शाह ने शपथ ली।
शपथ के बाद उन्होंने अपने मंत्रिमंडल के सदस्यों को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। इसके बाद दोपहर करीब 2:15 बजे उन्होंने सिंह दरबार में औपचारिक रूप से प्रधानमंत्री पद संभाला। इससे एक दिन पहले वे प्रतिनिधि सभा के सदस्य के रूप में भी शपथ ले चुके थे।
धार्मिक रंग पर उठा विवाद
इस समारोह के धार्मिक स्वरूप ने नागरिक समाज और बुद्धिजीवियों के बीच बहस छेड़ दी। कई लोगों ने सवाल उठाया कि एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य में इस तरह के आयोजन का क्या संदेश जाता है।
राजनीति विज्ञान की प्रोफेसर सुचेता प्याकुर्याल ने इस पर खुलकर आलोचना की। उन्होंने नेपाल के संविधान में निहित धर्मनिरपेक्षता का हवाला देते हुए कहा कि राज्य के कार्यों में किसी एक धर्म का प्रभाव नहीं होना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि एक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक देश में राजनीति, कानून, शिक्षा और शासन को किसी एक धर्म से प्रभावित नहीं होना चाहिए। झापा जिले की विविध आबादी—जिसमें किरात, मुस्लिम, ईसाई और अन्य समुदाय शामिल हैं—का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि ऐसा आयोजन अल्पसंख्यकों को अलग-थलग कर सकता है।
उन्होंने चेतावनी दी कि इस तरह का प्रदर्शन “अहंकारी मेगालोमेनिया” (अत्यधिक आत्ममुग्धता) को दर्शा सकता है, खासकर तब जब शपथ पूरे देश के नागरिकों के लिए हो।
मानवशास्त्री दिनेश पंत ने भी चिंता जताई। उनका कहना था कि यह आयोजन सार्वजनिक संस्थानों में हिंदू प्रतीकों के बढ़ते प्रभाव को दर्शाता है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या नेपाल में भी भारत की तरह “हिंदुत्व राजनीति” जैसी प्रवृत्तियां उभर रही हैं, और इसके शुरुआती संकेत मधेश क्षेत्र में दिखाई दे रहे हैं।
रैप बैटल से प्रधानमंत्री तक का सफर
साल 2022 में, स्ट्रक्चरल इंजीनियर और अपने काले चश्मे व अंडरग्राउंड रैप के लिए प्रसिद्ध बालेन शाह ने काठमांडू मेयर चुनाव जीतकर सबको चौंका दिया था।
स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में “लाठी” चुनाव चिन्ह पर उन्होंने 61,767 वोट हासिल किए। उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी नेपाली कांग्रेस की सिर्जना सिंह को 38,341 वोट मिले, जबकि पूर्व मेयर और सीपीएन-यूएमएल के उम्मीदवार केशव स्थापित 38,117 वोट के साथ पीछे रहे।
चार साल बाद, 35 वर्षीय बालेन शाह नेपाल के सबसे युवा प्रधानमंत्रियों में शामिल हो गए हैं।
उनकी लोकप्रियता अचानक नहीं आई। 2013 में ‘रॉ बार्ज़’ रैप बैटल लीग से पहचान बनाने के बाद उन्होंने मेयर चुनाव से पहले करीब ढाई साल तक शांतिपूर्वक तैयारी की। हिमालयन व्हाइट हाउस कॉलेज से इंजीनियरिंग और भारत से स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग में मास्टर्स की डिग्री ने उन्हें तकनीकी रूप से मजबूत छवि दी, जो पारंपरिक राजनीति से निराश मतदाताओं को आकर्षित करने में मददगार रही।
सोची-समझी राजनीतिक रणनीति
सितंबर में हुए प्रदर्शनों के दौरान 77 लोगों की मौत और केपी शर्मा ओली के इस्तीफे के बाद, जेन-ज़ी कार्यकर्ताओं ने बालेन शाह को अंतरिम सरकार का नेतृत्व करने का प्रस्ताव दिया था। लेकिन उन्होंने इसे ठुकरा दिया और पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की का समर्थन किया।
यह फैसला रणनीतिक साबित हुआ। छह महीने के अंतरिम कार्यकाल के बजाय उन्होंने खुद को पांच साल के पूर्ण कार्यकाल के लिए तैयार किया।
18 जनवरी 2026 को उन्होंने औपचारिक रूप से राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी जॉइन की और अगले ही दिन जनकपुर से चुनाव अभियान शुरू किया। उन्होंने झापा-05 सीट से चुनाव लड़ने का जोखिम उठाया—जो लंबे समय से केपी शर्मा ओली का गढ़ मानी जाती थी।
यह दांव सफल रहा। बालेन शाह ने झापा-5 में ओली को भारी अंतर से हराया। यह नतीजा नेपाल की राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है।
What's Your Reaction?