दिल्ली दंगे मामला: उमर खालिद और शरजील इमाम को हाईकोर्ट से जमानत नहीं
दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार को छात्र कार्यकर्ताओं उमर खालिद और शरजील इमाम को फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों की “बड़ी साज़िश” मामले में जमानत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि दोनों की भूमिकाएँ “प्रथमदृष्टया गंभीर” प्रतीत होती हैं और नागरिकता संशोधन विधेयक (CAB) दिसंबर 2019 में संसद से पारित होने के बाद सबसे पहले कार्रवाई करने वाले..
नयी दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार को छात्र कार्यकर्ताओं उमर खालिद और शरजील इमाम को फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों की “बड़ी साज़िश” मामले में जमानत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि दोनों की भूमिकाएँ “प्रथमदृष्टया गंभीर” प्रतीत होती हैं और नागरिकता संशोधन विधेयक (CAB) दिसंबर 2019 में संसद से पारित होने के बाद सबसे पहले कार्रवाई करने वाले यही थे।
जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस शालिंदर कौर की खंडपीठ ने 133 पन्नों के फैसले में सात अन्य आरोपियों, छात्र कार्यकर्ता गुलफिशा फातिमा, यूनाइटेड अगेन्स्ट हेट के संस्थापक खालिद सैफी, अतहर खान, मोहम्मद सलीम, शिफाउर रहमान, मीरान हैदर और शादाब अहमद की जमानत याचिकाएँ भी खारिज कर दीं। अदालत ने माना कि कथित साज़िश को आगे बढ़ाने में इनकी भी भूमिकाएँ रही हैं, जिसके परिणामस्वरूप दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा हुई थी, जिसमें 53 लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हुए।
शरजील इमाम को 28 जनवरी 2020 को और उमर खालिद को 14 सितंबर 2020 को गिरफ्तार किया गया था। दोनों पर कठोर गैरकानूनी गतिविधि (निवारण) अधिनियम (UAPA) के तहत मामला दर्ज है। दिल्ली पुलिस ने आरोप लगाया कि ये दोनों इस साज़िश के “बौद्धिक शिल्पी” थे, जिससे सीएए विरोधी प्रदर्शनों के दौरान 23 फरवरी 2020 से उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंसा भड़की।
पुलिस के आरोप
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और विशेष लोक अभियोजक अमित प्रसाद ने अदालत को बताया कि शरजील इमाम ने अलीगढ़, आसनसोल और चकंद में भड़काऊ भाषण दिए, जबकि उमर खालिद ने 17 फरवरी 2020 को अमरावती में भाषण देकर 24 फरवरी को विरोध का आह्वान किया — ठीक उसी दिन जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत यात्रा पर आए थे।
पुलिस ने यह भी आरोप लगाया कि दोनों ने मिलकर व्हाट्सऐप ग्रुप बनाए, मुस्लिम बहुल इलाकों में पर्चे बांटे और चक्का जाम (सड़क नाकेबंदी) की योजना बनाई ताकि आवश्यक आपूर्ति बाधित हो।
अदालत ने कहा, “रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों और घटनाक्रमों को देखते हुए प्रथमदृष्टया प्रतीत होता है कि अपीलकर्ता (इमाम और खालिद) नागरिकता संशोधन विधेयक पारित होने के बाद सबसे पहले सक्रिय हुए। इन्होंने व्हाट्सऐप ग्रुप बनाए और मुस्लिम आबादी वाले क्षेत्रों में पर्चे बांटे, जिनमें प्रदर्शन और चक्का जाम का आह्वान किया गया।”
अदालत की टिप्पणियाँ
- अदालत ने कहा कि दोनों ने “सांप्रदायिक आधार पर भाषण दिए ताकि मुस्लिम समुदाय को बड़े पैमाने पर लामबंद किया जा सके।”
- दोनों की दंगे के समय अनुपस्थिति को अदालत ने महत्वहीन माना और कहा कि “योजना और लामबंदी पहले ही की जा चुकी थी।”
- अदालत ने माना कि जमानत “नियम” और अस्वीकृति “अपवाद” है, लेकिन UAPA जैसे विशेष क़ानून में तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर ही विवेक का इस्तेमाल किया जा सकता है।
- जजों ने कहा कि जांच एजेंसी ने गहरी साज़िश को उजागर करने के लिए “वास्तविक प्रयास” किए और 58 गवाहों के बयान दर्ज किए, चार पूरक आरोपपत्र दाखिल किए।
- समानता (parity) पर दिए गए तर्क को खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि नताशा नरवाल, देवांगना कलिता और आसिफ इकबाल तन्हा की भूमिका सीमित थी, जबकि खालिद और इमाम की भूमिका “गंभीर” दिखती है।
- अदालत ने कहा कि नागरिकों को कानून बनाने के खिलाफ अपनी आवाज़ उठाने का मौलिक अधिकार है, लेकिन साजिशन हिंसा को “प्रदर्शन” के रूप में छिपाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
बचाव पक्ष की दलीलें
- इमाम और खालिद ने कहा कि उन पर लगाए गए आरोप कमजोर हैं और उन्हें किसी ऐसी बैठक से नहीं जोड़ा गया जहाँ हिंसा की योजना बनी हो।
- उन्होंने दलील दी कि वे दंगे के समय दिल्ली में मौजूद भी नहीं थे।
- वकीलों ने कहा कि वे पहले से पाँच साल से अधिक समय से विचाराधीन कैदी हैं और इस लंबी कैद के दौरान जमानत मिलनी चाहिए।
- खालिद ने कहा कि उनके भाषण में अमेरिकी राष्ट्रपति की यात्रा का ज़िक्र भर था, इसका दंगों से कोई संबंध नहीं।
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