“ग़म ए रोजगार में जैसलमेर” साहित्यिक दृष्टि से सांस्कृतिक इतिहास पर लिखी गई किताब हैः ओम थानवी
पत्रकार-संपादक ओम थानवी का कहना था कि इस किताब को इसलिए पढ़ा जाना चाहिए क्योंकि यह पर्यटन पर नहीं बल्कि साहित्यिक दृष्टि से सांस्कृतिक इतिहास पर लिखी गई किताब है..
जयपुर। “ग़ालिब ने रोज़ाना के दुख दर्द और रोजमर्रा की तकलीफों को कभी अच्छा नहीं माना। वे कहते हैं कि यदि जीवन में ग़म-ए-इश्क़” नहीं होता तो जीवन व्यर्थ की बातों में उलझ जाता। इश्क़ का ग़म आपकी जान निचोड़कर रख देता है लेकिन जिनके पास दिल होता है वो इस ग़म ए इश्क़ से बच भी नहीं सकता।” यह कहना था वरिष्ठ आलोचक डॉ जीवन सिंह मानवी का जो आज राजस्थान प्रौढ़ शिक्षण समिति के सभागार में जनवादी लेखक संघ और आमोर कला एवं संस्कृति सोसाइटी की ओर से आयोजित राघवेंद्र रावत की पुस्तक “ग़म ए रोजगार में जैसलमेर” पर चर्चा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि जगहों और शहरों पर लिखी किताबों में हमारे यहाँ गढ़ी हुई किंवदंतियों और अप्रमाणिक इतिहास को शामिल करने की प्रवृत्ति रही है। लेखक की जिम्मेदारी होती है कि अपने व्यक्तिपरख लेखन से इनको दूर कर छोटे से छोटे किरदारों पर भी ईमानदारी से लिखें।
इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सूरज पालीवाल ने कहा कि एक कवि और रंगकर्मी जब संस्मरण या डायरी लिखते हैं तो उसमें मन के निकट की भाषा में एक सुंदर किताब बन पड़ती है। डॉ राघवेंद्र रावत की इस किताब में गद्य के साथ-साथ कविता भी है या इसे कवितामय गद्य भी कहा जा सकता है। उन्होंने कहा कि यह संस्मरण और डायरी के साथ रेखाचित्रों की भी किताब है। इसमें जैसलमेर के लोगों के किरदार हैं। लेखक विधाओं की सीमा तोड़ते रहे हैं। जैसलमेर को जानने के लिए यह एक बेहद ज़रूरी किताब है। इसमें एक क़िरदार में कई किरदार व्यक्त हुए हैं।
वरिष्ठ पत्रकार-संपादक ओम थानवी ने कहा कि इस किताब के बारे में क्या बात की जाए, यह किताब ख़ुद कहेगी अपनी बात। उन्होंने कहा कि किताब के कार्यक्रम में वक्ताओं द्वारा उसके अंश पढ़कर सुना देने से पाठक के लिए किताब का रोमांच खत्म हो जाता है। उन्होंने किताबों पर चर्चा के कार्यक्रम की अवधि भी एक से डेढ़ घंटे तक रखने की सलाह दी। उनका कहना था कि इस किताब को इसलिए पढ़ा जाना चाहिए क्योंकि यह पर्यटन पर नहीं बल्कि साहित्यिक दृष्टि से सांस्कृतिक इतिहास पर लिखी गई किताब है।
वरिष्ठ आलोचक राजाराम भादू ने कहा कि यह एक सचेत व्यक्ति की, एक रंगकर्मी की, एक कवि की संवेदना से रची गई कृति है । उन्होंने कहा कि वर्चस्व और वंचना की शक्तियों को अलग अलग देखने की दृष्टि यहीं से विकसित होती है। लेखक ने जैसलमेर के पर्यटन व संस्कृति के साथ इतिवृत को प्रमुखता से रचा है।
डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल ने कहा कि इस किताब के एक लेखक बहुत सारे लोग शामिल हैं। लेखक कवि,शायर, रंगकर्मी के साथ ही पेशे से इंजीनियर हैं और इस किताब में लेखक के कई रूप नज़र आते हैं । यहाँ वे पर्यटक, लोक संस्कृति के अध्येता, पारिवारिक व्यक्ति की अलग अलग भूमिकाओं में हैं। उनका कहना था कि सरकारी नौकरी के बाद लेखक को अपने कार्यकाल में आए उन दबावों के बारे में लिखना चाहिए ताकि पीड़ित व्यक्ति और पीड़ित करने वाले व्यक्ति दोनों का पक्ष सामने आ सके। सरहद के आसपास रहने वालों की पीड़ा भी है।
इस अवसर पर प्रो राजीव गुप्ता ने कहा कि किसी भी पुस्तक की रचना के लिए एक लेखक में स्पष्ट दृष्टिकोण का होना जरूरी है। बिना दृष्टिकोण के कोई किताब लिखी ही नहीं जा सकती ।उन्होंने कहा कि यह संस्मरण दिल को छूने वाले हैं। यह किताब समाजशास्त्र के विद्यार्थियों के लिए भी बहुत उपयोगी है।
इस अवसर पर लेखक राघवेन्द्र रावत ने कहा कि मैंने लिखा कम और पढ़ा ज़्यादा है। अमृत पाने की ललक मुझे कभी नहीं रही। इस किताब में भी अपने भीतर के मनुष्य को बचाने की जद्दोजहद है। उन्होंने कहा कि सबके पास स्मृतियों का एक खजाना होता है जिसे अपने शिल्प से संवार कर पाठकों के समझ प्रस्तुत करना एक कला है। कार्यक्रम का संचालन डॉ विशाल विक्रम सिंह ने किया ।
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