सबरीमाला मामला: महिलाओं के प्रवेश पर सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता संगठन पर उठाए सवाल

महिलाओं के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान भारत का सर्वोच्च न्यायालय ने बुधवार को याचिकाकर्ता संगठन की भूमिका और अधिकार (लोकस स्टैंडी) पर कड़े सवाल उठाए। कोर्ट ने 2006 में दायर जनहित याचिका (PIL) करने वाले संगठन यंग इंडियन लॉयर्स एसोसिएशन के वकीलों से तीखी पूछताछ..

सबरीमाला मामला: महिलाओं के प्रवेश पर सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता संगठन पर उठाए सवाल
06-05-2026 - 12:32 PM

महिलाओं के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान भारत का सर्वोच्च न्यायालय ने बुधवार को याचिकाकर्ता संगठन की भूमिका और अधिकार (लोकस स्टैंडी) पर कड़े सवाल उठाए। कोर्ट ने 2006 में दायर जनहित याचिका (PIL) करने वाले संगठन यंग इंडियन लॉयर्स एसोसिएशन के वकीलों से तीखे सवाल कर दिये।

याचिकाकर्ता की वैधता पर सवाल

नौ जजों की पीठ, जिसकी अगुवाई मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत कर रहे थे, ने पूछा कि युवा वकीलों के हितों से जुड़ा संगठन धार्मिक मुद्दे पर याचिका कैसे दाखिल कर सकता है।

कोर्ट ने यह भी पूछा कि क्या संगठन ने औपचारिक रूप से इस याचिका को मंजूरी दी थी। संगठन का अध्यक्ष कौन है? क्या अध्यक्ष ने इस याचिका के लिए प्रस्ताव पारित किया था?”— कोर्ट ने सवाल किया।

यह याचिका केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को चुनौती देने के लिए दायर की गई थी।

धार्मिक आस्था बनाम याचिका की दलील

मुख्य न्यायाधीश ने याचिका में विरोधाभास की ओर इशारा करते हुए पूछा कि जब याचिकाकर्ता धार्मिक मान्यता को चुनौती नहीं दे रहा, तो फिर महिलाओं के प्रवेश की मांग कैसे की जा रही है।

न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना ने भी सवाल उठाया कि कोई संगठन ‘आस्था’ का दावा कैसे कर सकता है।
उन्होंने कहा, “आस्था और विश्वास व्यक्ति का विषय है, संगठन का नहीं।” उन्होंने तीखे अंदाज में पूछा, “आपका इस मामले से क्या लेना-देना है?”

कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

सुनवाई के दौरान कोर्ट का रुख सख्त दिखा। मुख्य न्यायाधीश ने व्यंग्यात्मक टिप्पणी करते हुए कहा, “क्या आप देश के मुख्यमंत्री हैं?”

वहीं न्यायमूर्ति नागरत्ना ने सुझाव दिया कि संगठन को अपने मूल उद्देश्यों पर ध्यान देना चाहिए, जैसे युवा वकीलों के हित में काम करना।

संवैधानिक पहलुओं पर बहस

सुनवाई के दौरान धार्मिक स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन पर भी चर्चा हुई।याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गुप्ता ने कहा,कोई भी अधिकार पूर्ण नहीं होता। धर्म का पालन भी सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन होता है।”

इस पर न्यायमूर्ति नागरत्ना ने सवाल उठाया, क्या इसका मतलब है कि बिना आस्था वाले लोग भी मंदिर में प्रवेश कर सकते हैं?”

उन्होंने स्पष्ट किया कि कोर्ट जानबूझकर धार्मिक नियमों के उल्लंघन को प्रोत्साहित नहीं करेगा।

मामले की पृष्ठभूमि

  • 1991 में केरल हाईकोर्ट ने महिलाओं के एक आयु वर्ग के प्रवेश पर रोक को सही ठहराया था।
  • 2006 में यंग इंडियन लॉयर्स एसोसिएशन ने इस फैसले को चुनौती दी।
  • 2018 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने ऐतिहासिक फैसला देते हुए 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को असंवैधानिक करार दिया और सभी आयु वर्ग की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दी।

वर्तमान सुनवाई का महत्व

यह सुनवाई धार्मिक स्वतंत्रता और समानता जैसे मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन के बड़े संवैधानिक सवालों से जुड़ी है। साथ ही, यह भी तय करेगा कि अदालतें धार्मिक परंपराओं और ‘आवश्यक धार्मिक प्रथाओं’ की समीक्षा किस हद तक कर सकती हैं।

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THE NEWS THIKANA, संपादकीय डेस्क यह द न्यूजठिकाना डॉट कॉम की संपादकीय डेस्क है। डेस्क के संपादकीय सदस्यों का प्रयास रहता है कि अपने पाठकों को निष्पक्षता और निर्भीकता के साथ विभिन्न विषयों के सच्चे, सटीक, विश्वसनीय व सामयिक समाचारों के अलावाआवश्यक उल्लेखनीय विचारों को भी सही समय पर अवगत कराएं।