धार्मिक अनुष्ठान करने से इनकार पर सेवा समाप्त, ईसाई सेना अधिकारी ने सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती..!

सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है जिसमें एक ईसाई सेना अधिकारी की सेवा समाप्ति को चुनौती दी गई है। अधिकारी ने मंदिर के गर्भगृह में धार्मिक अनुष्ठान करने से इनकार किया था। यह मामला धार्मिक स्वतंत्रता और सैन्य अनुशासन के बीच संतुलन के बुनियादी सवाल खड़ा..

धार्मिक अनुष्ठान करने से इनकार पर सेवा समाप्त, ईसाई सेना अधिकारी ने सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती..!
08-10-2025 - 11:09 AM
22-04-2026 - 05:53 PM

नयी दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है जिसमें एक ईसाई सेना अधिकारी की सेवा समाप्ति को चुनौती दी गई है। अधिकारी ने मंदिर के गर्भगृह में धार्मिक अनुष्ठान करने से इनकार किया था। यह मामला धार्मिक स्वतंत्रता और सैन्य अनुशासन के बीच संतुलन के बुनियादी सवाल खड़ा करता है।

यह मामला सैमुअल कमलेसन, तीसरी कैवेलरी रेजिमेंट के पूर्व लेफ्टिनेंट, से जुड़ा है, जिनकी सेवा इस वजह से समाप्त कर दी गई कि उन्होंने अपने वरिष्ठ अधिकारी के आदेश पर मंदिर के गर्भगृह में जाकर आरती करने से मना कर दिया था। कमलेसन का कहना था कि यह कार्य उनके एकेश्वरवादी (Monotheistic) ईसाई विश्वास के विपरीत है।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ विशेष अनुमति याचिका (Special Leave Petition) पर सुनवाई करेगी। इसमें यह विचार किया जाएगा कि क्या संविधान द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को सैन्य एकता और अनुशासन की आवश्यकताओं के अधीन रखा जाना चाहिए।

दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला

दिल्ली हाईकोर्ट ने इससे पहले, मई माह के अपने आदेश में, सेना के निर्णय का समर्थन किया था। अदालत ने कहा था कि अधिकारी ने “अपने धर्म को अपने वरिष्ठ के वैध आदेश से ऊपर रखा,” और इसे अनुशासनहीनता (insubordination) की श्रेणी में माना था।
हाईकोर्ट ने कहा था कि उनकी यह अस्वीकृति सेना के बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन करती है क्योंकि सैन्य कार्यप्रणाली नागरिक जीवन से पूरी तरह भिन्न होती है।

अधिकारी का पक्ष क्या है?

अपने वकील अभिषेक जेबराज के माध्यम से दायर याचिका में कमलेसन ने बताया कि उनकी रेजिमेंट में तीन स्क्वाड्रन थे, सिख, जाट और राजपूत। रेजिमेंट में एक मंदिर और एक गुरुद्वारा था, लेकिन बहु-धार्मिक प्रार्थना स्थल या चर्च नहीं था।

कमलेसन ने कहा कि वे हर सप्ताह होने वाली धार्मिक परेड में सक्रिय रूप से शामिल होते थे — अपने सैनिकों के साथ मंदिर और गुरुद्वारे दोनों में जाते थे, और दीपावली, नवरात्रि, लोहड़ी, गुरुपुरब और होली जैसे त्यौहार भी उनके साथ मनाते थे।

उनकी एकमात्र मांग थी,गर्भगृह में प्रवेश से छूट” क्योंकि यह उनके ईसाई धार्मिक विश्वास के विपरीत था। उन्होंने यह भी कहा कि यह छूट सैनिकों की धार्मिक भावनाओं के सम्मान में भी थी।

याचिका के अनुसार, कमलेसन उन अनुष्ठानों के दौरान मंदिर के आंगन में उपस्थित रहते थे, जूते-टोपी उतारकर उचित प्रोटोकॉल का पालन करते थे, और अपने दस्ता (unit) के साथ खड़े रहते हुए गर्भगृह के भीतर होने वाले अनुष्ठान को देखते थे।

हाईकोर्ट के समक्ष उन्होंने यह दलील दी कि उनका अपने सैनिकों से संबंध “आपसी सम्मान, एक ही राष्ट्र और झंडे के प्रति निष्ठा, और साझा जीवन — भोजन, अभ्यास, विश्राम स्थल और कर्तव्यों” पर आधारित था। उन्होंने कहा कि भाईचारा केवल धार्मिक आयोजनों से नहीं बनता।

कमलेसन ने आरोप लगाया कि कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने बार-बार उन्हें “अपना धर्म या सेना में सेवा — इनमें से एक चुनने” के लिए दबाव डाला, और अंततः मार्च 2021 में उनकी सेवा समाप्ति का आदेश जारी कर दिया गया।

केंद्र सरकार का पक्ष

केंद्र सरकार ने हाईकोर्ट में यह तर्क दिया कि विशेष देवी-देवताओं की पूजा और धार्मिक अनुष्ठान सैनिकों के प्रेरणा और गर्व” का स्रोत हैं, जिनसे उनके युद्धघोष (battle cry) का भी जन्म होता है।

सरकार ने कहा कि यदि कोई अधिकारी इन परंपराओं से अलग रहता है, तो इससे सैनिकों का मनोबल (morale) गिर सकता है और रेजिमेंट की एकता, सामंजस्य (cohesion) और युद्धक क्षमता (combat effectiveness) पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

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THE NEWS THIKANA, संपादकीय डेस्क यह द न्यूजठिकाना डॉट कॉम की संपादकीय डेस्क है। डेस्क के संपादकीय सदस्यों का प्रयास रहता है कि अपने पाठकों को निष्पक्षता और निर्भीकता के साथ विभिन्न विषयों के सच्चे, सटीक, विश्वसनीय व सामयिक समाचारों के अलावाआवश्यक उल्लेखनीय विचारों को भी सही समय पर अवगत कराएं।