लोकसभा अध्यक्ष और उपराष्ट्रपति को न्यायाधीश की जांच पर अभी तक सीजेआई की रिपोर्ट नहीं मिली
दिल्र्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग की संभावनाओं को लेकर मानसून सत्र में कोई स्पष्ट प्रगति नहीं हुई है, क्योंकि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला और राज्यसभा सभापति जगदीप धनखड़ के कार्यालयों को अब तक संबंधित रिपोर्ट नहीं मिली है..
नयी दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग की संभावनाओं को लेकर मानसून सत्र में कोई स्पष्ट प्रगति नहीं हुई है, क्योंकि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला और राज्यसभा सभापति जगदीप धनखड़ के कार्यालयों को अब तक संबंधित रिपोर्ट नहीं मिली है। यह रिपोर्ट तत्कालीन भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) द्वारा राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजी गई थी।
एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर बताया कि सरकार फिलहाल जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रक्रिया शुरू करने की कोई जल्दी में नहीं है, जिन्हें हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट से स्थानांतरित कर इलाहाबाद हाईकोर्ट भेज दिया गया है। दरअसल, उनके आवास के परिसर में आग लगने के बाद वहां की एक स्टोर रूम से बड़ी मात्रा में नकद और जली हुई मुद्रा बरामद की गई थी।
संसद के एक शीर्ष अधिकारी ने 'हिन्दुस्तान टाइम्स' को बताया कि लोकसभा सचिवालय को अब तक कोई रिपोर्ट नहीं मिली है, इसलिए महाभियोग की कोई तैयारी शुरू नहीं हुई है। इसी तरह राज्यसभा सभापति धनखड़ के कार्यालय को भी अब तक कोई आधिकारिक पत्राचार प्राप्त नहीं हुआ है।
एक अन्य सूत्र ने यह भी कहा कि सरकार ने 25 जून को आपातकाल के 50 वर्ष पूरे होने पर विशेष सत्र बुलाने की कोई योजना भी अभी तक नहीं बनाई है, जैसा कि कुछ मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया था।
क्या है मामला?
तत्कालीन CJI संजीव खन्ना द्वारा गठित तीन सदस्यीय जांच समिति — जिसमें पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश शील नागु, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जी.एस. संधवालय और कर्नाटक हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति अनु शिवरामन शामिल थीं — ने 5 मई को रिपोर्ट सौंप दी थी। इस रिपोर्ट में पुष्टि की गई थी कि जस्टिस वर्मा के आवास पर नकदी मिली थी, जो एक स्टोर रूम में रखी गई थी। 14 मार्च को वहां आग लगने पर दमकल विभाग और पुलिस ने इस नकदी को बरामद किया, जिसमें कुछ अधजली मुद्रा भी शामिल थी। पुलिस ने इस घटना का वीडियो भी रिकॉर्ड किया था।
महाभियोग की प्रक्रिया क्या है?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 218, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की बर्खास्तगी से संबंधित अनुच्छेद 124 पर आधारित है और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की बर्खास्तगी का मार्गदर्शन करता है।
अनुच्छेद 124 के अनुसार:
- उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को केवल राष्ट्रपति के आदेश द्वारा हटाया जा सकता है, वह भी दोनों सदनों द्वारा पारित एक प्रस्ताव के बाद।
- यह प्रस्ताव सदन के कुल सदस्यों के बहुमत और उपस्थित एवं मतदान कर रहे सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से पारित होना चाहिए।
- प्रस्ताव में न्यायाधीश के खिलाफ दुर्व्यवहार या अक्षमता के सिद्ध आरोप होने चाहिए।
संसद में महाभियोग का प्रारंभ:
- लोकसभा में कम से कम 100 सांसद और राज्यसभा में 50 सांसद महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करके नोटिस दे सकते हैं।
- स्पीकर या चेयरमैन उस नोटिस पर विशेषज्ञों से सलाह लेकर या अन्य साक्ष्य देखकर उसे स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं।
जांच समिति का गठन:
- यदि प्रस्ताव स्वीकार होता है, तो तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की जाती है — इसमें एक सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश, एक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता होते हैं।
- समिति आरोप तय करती है और न्यायाधीश को अपनी लिखित सफाई देने का अवसर देती है।
संसद में प्रस्ताव:
- समिति रिपोर्ट स्पीकर या चेयरमैन को सौंपती है, जो उसे सदन के समक्ष रखते हैं।
- यदि रिपोर्ट में दुर्व्यवहार या अक्षमता सिद्ध होती है, तो प्रस्ताव को बहस के लिए लिया जाता है।
- दोनों सदनों से पारित होने के बाद प्रस्ताव राष्ट्रपति को भेजा जाता है, जो अंतिम रूप से न्यायाधीश को पद से हटाने का आदेश जारी करते हैं।
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