वंदे मातरम् की सभी छह पंक्तियों के अनिवार्य पाठ का मुस्लिम संगठनों, वाम दलों और टीएमसी ने किया विरोध
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने गुरुवार को केंद्र सरकार की उस हालिया अधिसूचना पर कड़ा एतराज जताया, जिसमें आधिकारिक कार्यक्रमों और स्कूलों में राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ से पहले ‘वंदे मातरम्’ की सभी छह पंक्तियों के पाठ को अनिवार्य किया..
नयी दिल्ली। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने गुरुवार को केंद्र सरकार की उस हालिया अधिसूचना पर कड़ा एतराज जताया, जिसमें आधिकारिक कार्यक्रमों और स्कूलों में राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ से पहले ‘वंदे मातरम्’ की सभी छह पंक्तियों के पाठ को अनिवार्य किया गया है।
एआईएमपीएलबी ने इस फैसले को “असंवैधानिक और धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ” करार देते हुए मांग की कि सरकार तुरंत इस अधिसूचना को वापस ले। बोर्ड ने चेतावनी दी कि यदि ऐसा नहीं किया गया तो वह इस फैसले को अदालत में चुनौती देगा। प्रमुख मुस्लिम संगठन जमीयत उलमा-ए-हिंद के दोनों गुटों ने भी सरकार के आदेश पर आपत्ति जताई है।
इस बीच, वाम दलों—सीपीआई (एम) और सीपीआई—ने भी गृह मंत्रालय (एमएचए) के आदेश का विरोध किया। सीपीआई (एम) ने सरकार से “संविधान की भावना को बनाए रखने और इस आदेश को तुरंत वापस लेने” की मांग की।
सीपीआई (एम) ने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार “राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान को लेकर अनावश्यक विवाद पैदा कर रही है और इसके पीछे निहित स्वार्थ हैं।” पार्टी ने कहा कि “बीजेपी सरकार को ऐसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक प्रतीकों के साथ खिलवाड़ नहीं करने दिया जाना चाहिए।”
वाम दल ने यह भी रेखांकित किया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51A(क) में स्पष्ट कहा गया है कि प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान करे। पार्टी के अनुसार, विस्तृत विचार-विमर्श के बाद संविधान सभा ने तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के उस वक्तव्य को स्वीकार किया था, जिसमें कहा गया था कि राष्ट्रीय गीत के रूप में केवल इसकी दो ही पंक्तियां गाई जाएंगी।
सीपीआई (एम) ने कहा, “हालिया आदेश के जरिए सरकार शेष चार पंक्तियों को शामिल करना चाहती है, जिन्हें संविधान सभा ने भारतीय गणराज्य के धर्मनिरपेक्ष चरित्र के अनुरूप नहीं माना था।”
सीपीआई के राज्यसभा सांसद संदोष कुमार पी ने सरकार पर “संस्कृति का निंदक तरीके से इस्तेमाल कर समाज को ध्रुवीकरण करने” का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “हमारी स्थिति साफ है—हमारे लिए देश पहले है, जबकि बीजेपी के लिए चुनाव पहले हैं।”
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि “यह विडंबना है कि जिनका स्वतंत्रता संग्राम में कोई योगदान नहीं था और जो ब्रिटिश उपनिवेशवाद के अधीन रहे, वही आज राष्ट्रवाद का प्रमाणपत्र बांटने का दावा कर रहे हैं।”
तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने भी सरकार पर हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि बीजेपी “बंगाल विरोधी” है। पार्टी ने X पर एक पोस्ट में कहा कि गृह मंत्रालय ने आधिकारिक अधिसूचना में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा आनंदमठ में रचित वंदे मातरम् के मूल गीत को विकृत किया है।
विरोध के कारणों को स्पष्ट करते हुए एआईएमपीएलबी के महासचिव मौलाना मोहम्मद फ़ज़लुर रहीम मुजद्दिदी ने कहा कि एमएचए का आदेश “असंवैधानिक है, धार्मिक स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के खिलाफ है, सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के विपरीत है और मुसलमानों की धार्मिक मान्यताओं से सीधे टकराता है।”
उन्होंने कहा, “पश्चिम बंगाल चुनावों से पहले इस फैसले के पीछे जो भी राजनीतिक कारण हों, मुसलमान इसे स्वीकार नहीं कर सकते क्योंकि यह सीधे उनके ईमान से टकराता है।”
मौलाना मुजद्दिदी ने बताया कि रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह और संविधान सभा में हुई चर्चाओं के बाद यह तय हुआ था कि वंदे मातरम् की केवल पहली दो पंक्तियों का ही प्रयोग किया जाएगा। उन्होंने कहा कि “एक धर्मनिरपेक्ष सरकार किसी एक धर्म की शिक्षाओं या मान्यताओं को दूसरे धर्मों के अनुयायियों पर जबरन नहीं थोप सकती।”
उन्होंने यह भी जोड़ा कि यह गीत बंगाल की पृष्ठभूमि में लिखा गया था और इसमें दुर्गा सहित अन्य देवी-देवताओं की वंदना के संदर्भ हैं।
उन्होंने कहा, “एक मुसलमान केवल एक ईश्वर—अल्लाह—की इबादत करता है और इस्लाम में ईश्वर के साथ किसी को साझीदार ठहराने की अनुमति नहीं है। इसलिए बोर्ड मांग करता है कि केंद्र सरकार तुरंत इस अधिसूचना को वापस ले, अन्यथा इसे अदालत में चुनौती दी जाएगी।”
जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने सरकार के आदेश को “पक्षपाती” बताते हुए आरोप लगाया कि यह संविधान द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता छीनने की साजिश है। उन्होंने कहा कि यह फैसला “एकतरफा और दमनकारी” है और इससे अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों को सीमित करने का व्यवस्थित प्रयास झलकता है।
मौलाना महमूद मदनी के नेतृत्व वाले जमीयत गुट के महासचिव मौलाना हकीमुद्दीन क़ासमी ने कहा, “यदि बहुसंख्यक समुदाय इसे पढ़ना चाहता है तो उसे पूरा अधिकार है, लेकिन इसे सभी नागरिकों के लिए अनिवार्य बनाना धार्मिक स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाने के समान होगा।”
उन्होंने कहा कि भारत एक बहुधार्मिक और बहुलतावादी देश है, जहां संविधान की सर्वोच्चता और “एकता में विविधता” का सिद्धांत राष्ट्रीय एकता की बुनियाद है। “कोई भी कदम जो इस बुनियाद को कमजोर करे, देश के हित में नहीं हो सकता।”
उन्होंने अंत में कहा, “भारत के मुसलमानों का यह सर्वसम्मत और स्पष्ट मत है कि धार्मिक स्वतंत्रता को कमजोर करने वाला कोई भी निर्णय स्वीकार नहीं किया जाएगा। हम केंद्र सरकार से आग्रह करते हैं कि वह संविधान, न्यायिक मिसालों और देश के विविध सामाजिक ताने-बाने के आलोक में इस अधिसूचना की समीक्षा करे, ताकि धार्मिक स्वतंत्रता, संवैधानिक गरिमा और सामाजिक सौहार्द सुरक्षित रह सके।”
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