संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद रिपोर्ट: लाल किला हमले में पाकिस्तान की भूमिका पर मुहर, पहलगाम मामले में भी इस्लामाबाद की संलिप्तता स्वीकार..!
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) की प्रतिबंध निगरानी टीम की इस सप्ताह जारी द्विवार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है कि जैश-ए-मोहम्मद (JeM) को 9 नवंबर को लाल किला, नयी दिल्ली में हुए उस हमले से “जुड़ा हुआ बताया गया है”, जिसमें 15 लोगों की मौत..
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) की प्रतिबंध निगरानी टीम की इस सप्ताह जारी द्विवार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है कि जैश-ए-मोहम्मद (JeM) को 9 नवंबर को लाल किला, नयी दिल्ली में हुए उस हमले से “जुड़ा हुआ बताया गया है”, जिसमें 15 लोगों की मौत हुई थी।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि जैश-ए-मोहम्मद ने कई हमलों की जिम्मेदारी लेने का दावा किया है और पिछले नवंबर लाल किले के पास हुए एक संदिग्ध आत्मघाती कार बम हमले में उसकी भूमिका मानी जा रही है। यह हमला ऐसे समय में हुआ था, जब इसके प्रमुख मसूद अजहर ने औपचारिक रूप से केवल महिलाओं की एक शाखा “जमात उल मुमिनात” (जो फिलहाल प्रतिबंध सूची में शामिल नहीं है) की स्थापना की घोषणा की थी, जिसका उद्देश्य आतंकवादी हमलों को समर्थन देना बताया गया है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि एक संयुक्त राष्ट्र सदस्य देश ने दावा किया कि जैश-ए-मोहम्मद “अब निष्क्रिय (डिफंक्ट)” हो चुका है। इस दावे को रिपोर्ट ने पाकिस्तान के उन लंबे समय से किए जा रहे बयानों से जोड़ा है, जिनमें कहा जाता रहा है कि घरेलू आतंकवाद-रोधी कानूनों के तहत ऐसे संगठनों को “निष्क्रिय” कर दिया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, 28 जुलाई 2025 को पहलगाम, जम्मू-कश्मीर में हुए हमले में कथित रूप से शामिल तीन आतंकियों को मार गिराया गया था। इस पहलगाम हमले को लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के प्रॉक्सी संगठन द रेजिस्टेंस फ्रंट से जोड़ा गया था। इस हमले में 26 नागरिकों की मौत हुई थी, जिसके बाद भारत ने पाकिस्तान में आतंकी ढांचे को निशाना बनाते हुए जवाबी कार्रवाई की थी।
रिपोर्ट में बताया गया है कि 1267 प्रतिबंध समिति अल-कायदा, इस्लामिक स्टेट और उनसे जुड़े संगठनों पर लगाए गए प्रतिबंधों की निगरानी जारी रखे हुए है। लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद को 1990 के दशक से अल-कायदा से उनके ऐतिहासिक संबंधों के कारण इस समिति के अंतर्गत सूचीबद्ध किया गया है।
अफगानिस्तान के संदर्भ में रिपोर्ट में कहा गया है कि वहां की “डी फैक्टो अथॉरिटीज़” ने विभिन्न आतंकवादी संगठनों, विशेष रूप से तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP), के लिए एक “अनुकूल माहौल” उपलब्ध कराया हुआ है। रिपोर्ट में यह भी दर्ज किया गया है कि अफगानिस्तान से संचालित होकर पाकिस्तान में टीटीपी के हमलों में वृद्धि हुई है, जिससे क्षेत्रीय तनाव बढ़ा है और संबंध और अधिक नाजुक हुए हैं।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि हालांकि इस्लामिक स्टेट-खुरासान (ISIL-K) लगातार आतंकवाद-रोधी दबाव में है, फिर भी उसके पास “प्रभावी क्षमता और बाहरी हमलों को अंजाम देने की मंशा” बनी हुई है। वहीं, अल-कायदा ने अफगानिस्तान में अन्य आतंकी संगठनों के लिए प्रशिक्षण और सलाह देकर एक “सेवा प्रदाता और ताकत बढ़ाने वाले” की भूमिका निभाई है।
क्षेत्रीय देशों ने अफगानिस्तान में आतंकवादी संगठनों की निरंतर मौजूदगी और उनकी सीमा-पार गतिविधियों पर गंभीर चिंता जताई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अफगानिस्तान की डी फैक्टो सरकार ने दावा किया कि उसके भीतर कोई भी आतंकवादी संगठन मौजूद नहीं है लेकिन “किसी भी संयुक्त राष्ट्र सदस्य देश ने इस दावे का समर्थन नहीं किया”, जिससे तालिबान शासन के दावों पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय के संदेह को रेखांकित किया गया है।
अंत में, रिपोर्ट ने आतंकवादी संगठनों द्वारा नई तकनीकों के “प्रभावी उपयोग में स्पष्ट वृद्धि” की ओर ध्यान दिलाया है। रिपोर्ट के अनुसार, आतंकी संगठन विशेष रूप से प्रचार के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के इस्तेमाल में अधिक दक्ष होते जा रहे हैं और भर्ती व कट्टरपंथ फैलाने के लिए एआई टूल्स को अपनाया जा रहा है। हालांकि रिपोर्ट ने कहा कि यह क्षमताओं में कोई बड़ा बदलाव नहीं है लेकिन इससे अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद-रोधी प्रयासों के सामने बढ़ती चुनौती जरूर उजागर होती है।
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