शंकराचार्य और योगी सरकार के बीच टकराव गहराया, अफसरों के इस्तीफे, बीजेपी नेताओं की दखल, संतों में बंटवारा
उत्तर प्रदेश में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और योगी आदित्यनाथ सरकार के बीच चला आ रहा विवाद अब एक बड़े राजनीतिक और प्रशासनिक संकट का रूप ले चुका है। माघ मेले में शुरू हुआ यह मामला अब व्यापक टकराव में बदल गया है, जिसमें वरिष्ठ भाजपा नेता खुलकर सामने आ गए हैं, नौकरशाही के भीतर इस्तीफे हो रहे हैं, धार्मिक संतों के बीच गहरी मतभिन्नता..
उत्तर प्रदेश में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और योगी आदित्यनाथ सरकार के बीच चला आ रहा विवाद अब एक बड़े राजनीतिक और प्रशासनिक संकट का रूप ले चुका है। माघ मेले में शुरू हुआ यह मामला अब व्यापक टकराव में बदल गया है, जिसमें वरिष्ठ भाजपा नेता खुलकर सामने आ गए हैं, नौकरशाही के भीतर इस्तीफे हो रहे हैं, धार्मिक संतों के बीच गहरी मतभिन्नता उजागर हुई है और राजनीतिक ध्रुवीकरण तेज हो गया है।
वरिष्ठ भाजपा नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने खुलकर शंकराचार्य के समर्थन में बयान दिया है। उन्होंने माघ मेला प्रशासन द्वारा शंकराचार्य से प्रमाण मांगने पर कड़ी आपत्ति जताई और कहा कि अधिकारियों ने संतों को दी जाने वाली पारंपरिक मर्यादा को ठेस पहुंचाई है। उमा भारती ने कहा कि प्रशासन ने अपने अधिकारों की सीमाएं लांघ दी हैं और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को शंकराचार्य की चिंताओं से अवगत कराया जाना चाहिए। उनके इस बयान से विवाद को राजनीतिक मजबूती मिली है और राज्य सरकार पर दबाव और बढ़ गया है।
विपक्ष ने भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरा है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बयान जारी कर कहा कि जगतगुरु शंकराचार्य के प्रत्येक शिष्य और अनुयायी को इस घटना से गहरा आघात पहुंचा है। उन्होंने इसे संत का अपमान बताया और कहा कि इससे सनातन धर्म के प्रति असम्मान का भाव झलकता है।
यह टकराव अब प्रशासनिक तंत्र के भीतर भी साफ नजर आने लगा है। बरेली में नगर मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने 26 जनवरी को शंकराचार्य के समर्थन और नई यूजीसी नियमावली के विरोध में इस्तीफा दे दिया। हालांकि राज्य सरकार ने उनका इस्तीफा खारिज कर दिया, उन्हें निलंबित कर विभागीय जांच के आदेश दे दिए गए।
इसके बाद मंगलवार को अयोध्या में तैनात राज्य जीएसटी विभाग के डिप्टी कमिश्नर प्रशांत सिंह ने भी इस्तीफा दे दिया। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ शंकराचार्य की बार-बार की गई टिप्पणियों से उन्हें गहरा आघात पहुंचा है। अपने इस्तीफे में उन्होंने लिखा कि वह संवैधानिक व्यवस्था और देश के निर्वाचित नेतृत्व के खिलाफ की जा रही गैर-जिम्मेदाराना और अपमानजनक टिप्पणियों पर चुप नहीं रह सकते।
लगातार हो रहे इन इस्तीफों से नौकरशाही के भीतर बढ़ती असहजता उजागर हुई है। वहीं, माघ मेला प्रशासन के कुछ हिस्सों में इस बात को लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई है कि इस बढ़ते टकराव से कैसे निपटा जाए।
इस पूरे विवाद की जड़ 18 जनवरी की है। प्रयागराज में मौनी अमावस्या के अनुष्ठान के दौरान पुलिस कर्मियों ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को पालकी में आगे बढ़ने से रोक दिया और उनसे पैदल चलने को कहा। इस पर विवाद हो गया और उनके शिष्यों का आरोप है कि पुलिस ने उन्हें धक्का दिया। इस घटना से नाराज होकर शंकराचार्य ने अपने शिविर के बाहर धरना दिया और प्रशासन पर धार्मिक परंपराओं के अपमान का आरोप लगाया।
इसके बाद 48 घंटों के भीतर माघ मेला प्रशासन ने उन्हें दो नोटिस जारी किए। एक नोटिस में उनसे शंकराचार्य की उपाधि के उपयोग को लेकर सवाल किया गया, जबकि दूसरे में मौनी अमावस्या की घटना पर स्पष्टीकरण मांगा गया। साथ ही चेतावनी दी गई कि उन्हें माघ मेला क्षेत्र में प्रवेश से रोका भी जा सकता है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने बाद में दोनों नोटिसों का जवाब दिया।
शनिवार देर रात तनाव और बढ़ गया, जब कुछ युवकों के एक समूह ने कथित तौर पर उनके शिविर में हंगामा किया। शिविर प्रशासन के अनुसार, आठ से दस युवक भगवा झंडे लेकर और सरकार समर्थक नारे लगाते हुए जबरन शिविर में घुसने की कोशिश कर रहे थे। इस दौरान शिष्यों के साथ हल्की झड़प भी हुई। पुलिस को दी गई शिकायत में आरोप लगाया गया है कि युवक लाठियां लेकर आए थे और शिविर में मौजूद लोगों पर हमला करने की कोशिश की। शिविर प्रशासन ने सुरक्षा बढ़ाने की मांग करते हुए कहा कि हालात बेहद गंभीर हो सकते थे।
इस घटना के बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने दावा किया कि गौ रक्षा जैसे मुद्दे उठाने के कारण उन्हें निशाना बनाया जा रहा है और उन्हें डराने-धमकाने की कोशिशें हो रही हैं। उन्होंने कहा कि दबाव की राजनीति से वह पीछे हटने वाले नहीं हैं और आरोप लगाया कि सत्ता प्रतिष्ठान उनके खिलाफ इसलिए खड़ा है क्योंकि वह अब असहज करने वाले सवाल उठा रहे हैं।
मामले पर संतों में मतभेद
यह विवाद संत समाज को भी दो हिस्सों में बांट चुका है। श्रीकृष्ण जन्मभूमि मामले के मुख्य याचिकाकर्ता दिनेश फलाहारी बाबा ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अपने खून से पत्र लिखकर शंकराचार्य को पूरा सम्मान देने और उनके स्नान की उचित व्यवस्था करने की मांग की है। साथ ही उन्होंने 18 जनवरी की घटना में शामिल अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की भी मांग की।
वहीं, अयोध्या छावनी धाम के प्रमुख परमहंस महाराज ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और एक अन्य संत पर माघ मेले को बदनाम करने का आरोप लगाया है। उन्होंने मेला क्षेत्र में उनके प्रवेश पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की मांग की और शंकराचार्य के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत कार्रवाई की भी बात कही।
विवाद में एक और परत जोड़ते हुए, जगद्गुरु रामभद्राचार्य के शिष्य और श्रीकृष्ण जन्मभूमि मामले से जुड़े आशुतोष ब्रह्मचारी ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के खिलाफ दो शिकायतें दर्ज कराई हैं। एक शिकायत में आरोप लगाया गया है कि उनके शिविर में नाबालिगों को रखा गया है और उनसे विभिन्न सेवाएं कराई जाती हैं। दूसरी शिकायत में उन पर भ्रामक लेटरहेड का इस्तेमाल कर खुद को ज्योतिष पीठ का शंकराचार्य बताने का आरोप लगाया गया है। पुलिस अधिकारियों ने कहा है कि सभी शिकायतों और हालिया घटनाओं की जांच की जा रही है।
वरिष्ठ भाजपा नेताओं के समर्थन, विपक्ष के हस्तक्षेप, अफसरों के खुले रुख और संतों के बीच विभाजन के साथ यह मामला अब केवल माघ मेला प्रोटोकॉल का विवाद नहीं रह गया है। यह योगी आदित्यनाथ सरकार के लिए एक संवेदनशील राजनीतिक परीक्षा बन गया है, जिसमें प्रशासनिक अधिकार, धार्मिक भावनाएं और भीतर बढ़ती बेचैनी के बीच संतुलन साधना बड़ी चुनौती साबित हो रही है।
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