चुनाव आयोग की एसआईआर प्रक्रिया की वैधता पर आज सुप्रीम कोर्ट सुनाएगा फैसला
सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया आज निर्वाचन आयोग द्वारा कराई गई स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अपना फैसला..
सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया आज निर्वाचन आयोग द्वारा कराई गई स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अपना फैसला सुनाएगा।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ आज इस मामले में निर्णय सुनाएगी।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत में दलील दी थी कि भारत निर्वाचन आयोग को संविधान के अनुच्छेद 326, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 तथा उससे जुड़े नियमों के तहत इतने बड़े पैमाने पर एसआईआर प्रक्रिया चलाने का अधिकार नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी को दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था।
ADR समेत कई याचिकाकर्ताओं ने उठाए सवाल
इस प्रक्रिया को चुनौती देने वालों में गैर-सरकारी संगठन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स भी शामिल था।
ADR का कहना था कि निर्वाचन आयोग के पास इतने व्यापक स्तर पर मतदाता सूची पुनरीक्षण अभियान चलाने का न तो संवैधानिक अधिकार है और न ही वैधानिक आधार।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने चल रही एसआईआर प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था लेकिन यह स्पष्ट किया था कि वह इस बड़े कानूनी प्रश्न की जांच करेगा कि क्या निर्वाचन आयोग के पास ऐसा अभियान चलाने की शक्ति है या नहीं।
अदालत ने यह भी कहा था कि अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित हो जाने के बाद भी यदि प्रक्रिया में कोई अवैधता पाई जाती है, तो कोर्ट हस्तक्षेप करने के लिए स्वतंत्र रहेगा।
चुनाव आयोग ने दिया संवैधानिक दायित्व का तर्क
निर्वाचन आयोग ने अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा कि उसकी शक्तियां सीधे संविधान के अनुच्छेद 326 से आती हैं, जो मतदान का अधिकार केवल भारतीय नागरिकों तक सीमित करता है।
आयोग का कहना था कि यह सुनिश्चित करना उसका संवैधानिक दायित्व है कि केवल पात्र भारतीय नागरिकों के नाम ही मतदाता सूची में बने रहें। आयोग ने तर्क दिया कि गैर-नागरिकों को मतदान की अनुमति देना लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करेगा।
एसआईआर प्रक्रिया पर क्यों हुआ विवाद?
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर विवाद तब बढ़ गया था, जब निर्वाचन आयोग ने उन मतदाताओं से, जिनके नाम 2002 या 2003 की मतदाता सूचियों में नहीं थे, अपने पूर्वजों का संबंध उन लोगों से साबित करने को कहा जिनके नाम उन पुरानी सूचियों में मौजूद थे।
आयोग ने यह भी स्पष्ट किया था कि आधार कार्ड और मतदाता पहचान पत्र को नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।
कई राज्यों में पूरी, कई में जारी
यह प्रक्रिया बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल में पूरी हो चुकी है। वहीं उत्तर प्रदेश, गुजरात और राजस्थान समेत कई राज्यों में यह अभियान अभी जारी है।
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