दो भव्य परिणयोत्सव, दो दिव्य सन्देश परन्तु अडाणीजी का कार्य अनुकरणीय
भारतवर्ष ही नहीं पूरे संसार ने विश्व के सबसे धनाढ्य परिवारों में गिने जाने वाले दो भारतीय परिवारों के विवाहोत्सवों को साक्षीभाव से देखा हैI दोनों ही परिणयोत्सव अविस्मरणीय, सराहनीय, प्रशंसनीय और ऐतिहासिक सिद्ध हुए हैं ..
भारतवर्ष ही नहीं पूरे संसार ने विश्व के सबसे धनाढ्य परिवारों में गिने जाने वाले दो भारतीय परिवारों के विवाहोत्सवों को साक्षीभाव से देखा हैI दोनों ही परिणयोत्सव अविस्मरणीय, सराहनीय, प्रशंसनीय और ऐतिहासिक सिद्ध हुए हैं। अम्बानी परिवार ने अपने बेटे के विवाह में अपना खजाना खोला यह कोई विशेष बात नहीं है और न ही उल्लेखनीय है क्योंकि अधिकाँश भारतीय सम्पन्न परिवार अपनी पूर्ण क्षमता से धन खर्च करते ही हैं और अन्य भारतीय परिवार भी ऋण लेकर “देखो रे शान” में अपना भविष्य दांव पर लगाते रहते हैं।
अम्बानी परिवार के परिणयोत्सव में जो सबसे बड़ी, उल्लेखनीय, प्रशंसनीय तथा विशेष बात यह थी कि उन्होंने भारतीय विवाह संस्कार के धार्मिक अनुष्ठानों के कई बिन्दुओं को पूरे विश्व के समक्ष प्रस्तुत किया I यह सनातन संस्कृति का प्रकटीकरण और प्रदर्शन भी था। इसके अतिरिक्त इस विवाह महोत्सव के माध्यम से अपने पुत्र के अनुकरणीय प्रकृति, पर्यावरण प्रेम और जीवजगत के प्रति दायित्व को भी जग जाहिर किया है। साथ ही करोड़ों रुपए का शुल्क देकर राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय कलाकारों को नचाकर या बुलाकर उनके लाखों प्रशंसकों को भी इस विवाह को उत्सुकता से देखने के लिए विवश किया है। महीनों तक चले इन सब कृत्यों से पूरे विश्व का ध्यानाकर्षण अम्बानी परिवार के बहाने भारत की समृद्ध परम्पराओं पर भी केन्द्रित हुआ था। यह भी सन्देश सभी के अवचेतन में चला गया कि विवाह कोई लिव इन रिलेशनशिप जैसा अनुबन्ध नहीं है या मात्र दो व्यक्तियों के मिलन का उत्सव नहीं है अपितु ईश्वर, अग्निदेव, कुल देवी-देवताओं तथा समाज की साक्षी में एक दूसरे के प्रति प्रेम और समर्पण का भी अत्यन्त महत्वपूर्ण उत्सव है जो गृहस्थाश्रम का श्रीगणेश है। भारतीय संस्कृति में तो भगवान शिव का अर्द्धनारीश्वर स्वरूप विवाह के वास्तविक अर्थों का ही प्रकटीकरण है।
वैसे भारतीय धनाढ्य परिवार विवाह में पैसा तो बहुत अधिक खर्च करते हैं परन्तु पूजा-पाठ, धार्मिक मान्यताओं-संस्कारों को इतना गौण कर देते हैं कि उनके धन-वैभव को तो दुनिया देखती है परन्तु भारतीयता और सनातन संस्कृति प्राय: अदृश्य रहती है। कहीं-कहीं तो विवाह वेदी पर वैदिक मंत्रोच्चार के माध्यम से देवताओं का आव्हान करने वाले पण्डित के ऊपर अभद्र टिप्पणियाँ करते दिखाई देते हैं और यह सात फेरों का अत्यन्त ही पवित्र संस्कार उपहास का विषय बन जाता है। ऐसे ही अभद्र तथा अस्वीकार्य दृश्य वरमाला के समय भी दिखाई देते हैं। भारतीय परम्परागत महिला संगीत की मंगलता को तो इवेंट मैनेजिंग कम्पनियां समूचा निगल चुकी हैं। वे इतनी स्वतन्त्रता से परिवार के लोगों को अपने संकेतों पर नाचने या कुछ भी करने के लिए विवश कर देते हैं, वह कदापि सम्मानीय नहीं लगता है। बेचारे कठपुतलियों की तरह संचालन करने वाली युवती के आदेशों का अक्षरशः पालन करते दिखाई देते हैं। नई-नई वधू जिस तरह से बड़े-बूढों के सामने निर्लज्जता के साथ वर की कमर में हाथ डालकर, मटकती हुई अथवा वरमाला हेतु या महिला संगीत में नृत्य करने आती है अथवा वर-वधु के माता-पिता तथा अन्य सगे सम्बन्धी पहलीबार नृत्य करने के उपक्रम में अपने सुडौल या बेडौल शरीर के साथ कमर मटकाते हुए अनगढ़ नृत्य करते हैं, वह शोभनीय तो नहीं कहा जा सकता है। भले ही लोग झूठी प्रशंसा करते हों परन्तु सच सभी दर्शकों के हृदयों में चुपचाप मुस्काता रहता है। कुछ धनाढ्य विदेशी नृत्यांगनाओं का नाच करवाते हैं, उनका गौरा-गौरा और लम्बा कद, बिजली की तेजी से थिरकता शरीर साथ ही बिकनियों से झांकते अंग वहां उपस्थित युवाओं के लिए आकर्षण का विषय तो होते हैं परन्तु अपने माता-पिताओं तथा सगे–सम्बन्धियों की उपस्थिति में वे मन-मसोस कर रह जाते हैं। वहां उपस्थित कुंवारी युवतियों के मन में चल रही उथलपुथल को समझना कठिन है। विवाहित महिलाएं भीतर ही भीतर कुढती रहती हैं और प्रौढ़ और वृद्धों के मनोभाव तो “जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन जैसी” वाली चौपाई से ही समझी जा सकती है। बच्चे उन्हें कौतूहल की दृष्टि से देखते हैं। पीठ पीछे कुछ लोग इसे धनवानों की चोंचलेबाजी निरूपित कर अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करते मिल जाते हैं।
वधू या वर जब धूम-धड़ाकों, फौज फाटे और फटाकों के साथ विवाह स्थल में प्रवेश करते हों, तब ऐसा लगता है कि महाराजा और महारानीजी दास-दासियों के लाव-लश्कर के साथ पधार रहे हों। इन सब कृत्यों में धन का वैभव अवश्य सर्वत्र दिखाई देता है, परन्तु वो सब नदारद रहते हैं, जिनका होना सनातनी विवाहोत्सव में अनिवार्य-सा होता है। देवी-देवताओं की स्तुति में घर-परिवार और समाज की महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले मंगल गीत फिल्मी गीतों की बलिवेदी पर लुप्त हो जाते हैं।
अस्तु, अम्बानी परिवार का विवाहोत्सव कदापि अनुकरणीय या अनुसरणीय नहीं था और अडाणी परिवार का विवाह उत्सव न केवल प्रशंसनीय, सराहनीय, अविस्मरणीय, ऐतिहासिक रहा अपितु अनुकरणीय और अनुसरणीय भी सिद्ध हुआ है।
अडाणी परिवार ने अपने निकट के परिजनों की उपस्थिति में पूरे विधि-विधान और पारिवारिक संस्कारों के साथ विवाह किया है, यह अनुपम है। वे चाहते तो अम्बानी परिवार की तरह अपनी शानोशौकत का प्रदर्शन कर सकते थे, वे भी हाई प्रोफाइल व्यक्ति हैं। देश-विदेश के शीर्षस्थ नेता, अभिनेता आदि को वे बुलाने में सक्षम हैं। फिर भी ये सादगी अनुकरणीय है। इसका अनुकरण सभी भारतीयों को करना चाहिए ताकि फिजूलखर्ची पर अंकुश लग सके और विवाह के उपरान्त एक सकारात्मक सन्देश पूरे समाज में व्यापक आकार ले सके। यदि व्यर्थ खर्चों से बचा जाए तो बचे हुए धन से नव विवाहितों का हितसाधन हो सकता है अथवा सामाजिक उन्नयन के लिए भी खर्च किया जा सकता है। चूँकि सनातन संस्कृति और भारतीय कृषि गौ आधारित रही है साथ ही हमारे अवतार और तीर्थंकर भी गौ संरक्षक रहे हैं, चाहे गोपाल कृष्ण हों या नन्दीश्वर शिव हों या प्रथम जैन तीर्थंकर वृषभनाथ ऋषभदेव हों, या दतात्रेय भगवान हों या भगवान राम ही क्यों न हों, सभी का गौमाता के प्रति स्नेह अनुपम रहा है I अतएव गौशाला हेतु दान दिया जाना धर्म सम्मत है I
अडाणीजी ने समाजोत्थान के लिए दस हजार करोड़ रुपए का उल्लेखनीय दान देकर एक और दिव्य सन्देश दिया है, इसकी हमें मुक्तकंठ से प्रशंसा करना चाहिए और समाज को उनका अनुकरण करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।
इस विषय में श्रीमद्भगवतगीता के तीसरे अध्याय के 21 वें श्लोक में भगवान ने कहा है..
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।3.21।
श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्य-समुदाय उसी के अनुसार बरतने लग जाता है।
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