जनता की कमाई, इन्होंने ठिकाने लगाई..! बैंक-उद्योगपतियों की ‘धूर्तक्रीड़ा’
<p><em><strong>वीडियोकॉन (Vediocon) के मालिक ने बैंक के साथ मिलकर ही 1730 करोड़ रूपये का घोटाला (Bank fraud) कर डाला और सालों तक किसी को हवा तक नहीं लगी। आखिर क्यों है बैंक का ये दोहरा रवैया?</strong></em></p>
छोटा-सा बैंक लोन और सिर पर चिंता का बोझ...किसी महीने अगर किस्त नहीं दी तो बैंक का दबाव नींद हराम करने के लिए काफी होता है, लेकिन बैंक का ये खौफनाक चेहरा तो आम आदमी के लिए है। अमीरों के साथ तो होती है बैंक की सांठ-गांठ। जैसे, इस तस्वीर में मास्क की आड़ में अपने चेहरे को छुपाते टाॅप 100 अमीरों में शुमार वीडियोकॉन के मालिक वेणुगोपाल धूत। इन पर बैंक लोन की आड़ में करोड़ों रूपये का चूना लगाने के आरोप लगे हैं।
धूत पर हैं घोटाले के आरोप
वेणुगोपाल पर आईसीआईसीआई बैंक की पूर्व सीईओ चंदा कोचर और उनके पति दीपक कोचर के साथ मिलकर को एक दो करोड़ की नहीं, बल्कि 1,730 करोड़ रूपये की धोखाधड़ी के आरोप लगे हैं। सीबीआई ने इस कथित धोखाधड़ी के लिए कोचर, धूत और नूपावर रिन्यूएबल्स और वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। वेणुगोपाल ने साल 2010 और साल 2012 के बीच में चंदा कोचर की मदद से आईसीआईसीआई बैंक से 3,250 करोड़ रूपये का लोन लिया। सीबीआई के मुताबिक इस लोन को लेने की एवज में वेणुगोपाल ने चंदा कोचर के पति की कंपनी नूपावर रिन्यूएबल्स में 64 करोड़ रूपये का इन्वेस्टमेंट किया था। इसके अलावा मुंबई के चर्च गेट में वीडियोकॉन कंपनी का 5 करोड़ का एक फ्लैट दीपक कोचर को महज 11 लाख में दे दिया गया।
इलेक्ट्रिक एप्लायंस बनाती है वीडियोकॉन
दरअसल वीडियोकॉन कंपनी 2010 के बाद से लगातार घाटे में चल रही थी। एक जमाने में वीडियोकॉन का अच्छा खासा नाम था। 1985 में वीडियोकॉन कंपनी की स्थापना हुई थी। शुरुआती दिनों में ये कंपनी इलेक्ट्रिक एप्लायंस में काम करती थी। उस वक्त वेणुगोपाल धूत अपने पिता नंदलाल माधवलाल धूत के साथ कंपनी का कारोबार देख रहे थे। हर घर में वीडियोकॉन टेलीविजन, वीडियोकॉन वाशिंग मशीन हुआ करती थी। न सिर्फ भारत में बल्कि मैक्सिको, इटली, पोलैंड में भी वीडियोकॉन ने अपने प्लांट लगाए। भारत में पहला रंगीन टेलीविजन भी वीडियोकॉन का ही था। बाद में, वेणुगोपाल ने इलेक्ट्रिक एप्लायंस के साथ-साथ टेलीकॉम, ऑयल और पावर सेक्टर में भी हाथ आजमाने की सोची, लेकिन यहां कंपनी को खासा नुकसान हुआ। लोन की धोखाधड़ी का ये मामला भी साल 2010 के बाद का ही है।
दस साल तक सामने नहीं आया घोटाला
इस धोखाधड़ी को दस साल से ज्यादा का वक्त बीत चुका है, लेकिन वीडियोकॉन के मालिक इतने बड़े फ्रॉड के बावजूद सालों तक मजे से अपनी जिंदगी बिताते रहे। बैंक ने इतनी बड़ी रकम लोन के रूप में दे दी, लेकिन ये चेक करना जरूरी नहीं समझा कि क्या जिनको लोन दिया जा रहा है क्या वो इसके काबिल हैं। उस वक्त की बैंक की सीईओ चंदा कोचर और उनके पति ने अपना मुनाफा कमाया और वीडियोकॉन के मालिक ने अपना। तब न किसी को पेपर्स की याद आई, न कोई फॉर्मेलिटी की गई और अब सालों बाद जब ये फ्रॉड आम जनता के सामने आया तो आरोपी वीडियोकॉन कंपनी के मालिक को शर्म आ रही है और वो मुंह छुपाकर जा रहे हैं।
आम आदमी के साथ बैंक के सख्त रूल
अगर कोई आम आदमी बैंक में एक छोटा सा लोन लेने जाएं तो उससे कई तरह के पेपर्स मांगे जाते हैं। उसकी इनकम का प्रूफ मांगा जाता है। यहां तक कि किसी अन्य से लोन की गारंटी भी ली जाती है। सौ तरह कि फॉर्मेलेटी होती हैं। बार-बार बैंक के चक्कर लगाने पड़ते हैं, तब कहीं जाकर 20-30 लाख का लोन मिलता है।
अमीरों को बिना औपचारिकता के लोन क्यों?
आखिर बैंक की ये दोहरी नीति क्यों है? जब आम आदमी को छोटा सा लोन देने के लिए इतनी औपचारिकताओं से गुजरना पड़ता है तो क्यों अमीर उद्योगपतियों को बिना जांचे-समझे करोड़ों रूपये का लोन दे दिया जाता है। 2015 में फोब्र्स ने वीडियोकॉन के मालिक को देश के अमीर आदमियों में 61वां स्थान दिया था। उनकी कंपनी के नेटवर्थ 1.19 बिलियन थी जो आज के हिसाब से 98 अरब रूपये है।
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