पति द्वारा काम काज सँभालने पर चुनी गयी महिला प्रधान की रबर स्टाम्प कहकर तगड़ी फटकार लगायी उच्च न्यायालय ने 

<p>इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश में महिला प्रधानों के स्थान पर उनके पतियों के काम करने की प्रथा की तगड़ी आलोचना की और कहा कि ऐसी दखलअंदाजी राजनीति में महिलाओं को आरक्षण देने के मकसद को कमजोर करती है। एक प्रधानपति यानी एक महिला प्रधान के पति द्वारा दायर की गयी रिट याचिका रद्द करते हुए न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी ने कहा कि उसका ग्राम सभा के कामकाज से कोई लेना देना नहीं होता।</p>

पति द्वारा काम काज सँभालने पर चुनी गयी महिला प्रधान की रबर स्टाम्प कहकर तगड़ी फटकार लगायी उच्च न्यायालय ने 
29-11-2023 - 01:57 PM
21-04-2026 - 12:04 PM

प्रधानपति पर क्या कहा उच्च न्यायालय?
उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) ने कहा ‘प्रधानपति शब्द उत्तर प्रदेश में काफी लोकप्रिय है और व्यापक स्तर पर इसका उपयोग किया जाता है। इसका उपयोग एक महिला प्रधान के पति के लिए किया जाता है।  अधिकृत प्राधिकारी नहीं होने के बाद भी प्रधानपति आमतौर पर एक महिला प्रधान यानी अपनी पत्नी की ओर से कामकाज करता है’। 

महिला प्रधान रबर स्टाम्प की तरह 
अदालत (Allahabad High Court) ने कहा, ‘ऐसे कई उदाहरण हैं जहां एक महिला प्रधान सभी व्यवहारिक उद्देश्यों के लिए केवल एक "रबड़ स्टैंप" की तरह काम करती है तथा सभी प्रमुख निर्णय तथाकथित प्रधानपति द्वारा लिए जाते हैं एवं निर्वाचित प्रतिनिधित महज मूक दर्शक की तरह कार्य करती है।  यह रिट याचिका ऐसी स्थिति का एक ज्वलंत उदाहरण है’। 

क्या है पूरा मामला?
यह रिट याचिका बिजनौर जिले की नगीना तहसील के मदपुरी गांव की ग्राम सभा ने अपनी प्रधान कर्मजीत कौर के द्वारा दायर की थी।  इस रिट याचिका के साथ निर्वाचित प्रधान के पक्ष में ऐसा कोई प्रस्ताव संलग्न नहीं था जिसमें उसके पति इस रिट याचिका के लिए अधिकृत किया गया हो। रिट याचिका के साथ प्रधानपति यानी कर्मजीत कौर के पति सुखदेव द्वारा एक हलफनामा लगाया गया था। 

अदालत ने कहा , ‘प्रधान के तौर पर याचिकाकर्ता को अपने निर्वाचित पद से अधिकार, कर्तव्य आदि अपने पति या किसी अन्य व्यक्ति को सौंपने का कोई अधिकार नहीं है।  यहां पैरोकार यानी प्रधानपति का गांव सभा के कामकाज से कोई लेना देना नहीं है। 

लगा दिया जुर्माना
जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी ने आगे कहा कि, 'यदि ऐसी अनुमति दी जाती है तो यह न केवल महिला सशक्तीकरण के उद्देश्य को विफल करेगा, बल्कि महिलाओं को आगे आकर राजनीति की मुख्य धारा में शामिल होने के लिए उन्हें आरक्षण देने का उद्देश्य भी विफल करेगा’।  हाईकोर्ट ने दोनों पर 5-5 हजार रुपये का जुर्माना भी लगा दिया। 

हालाँकि यह मुद्दा महज उत्तर प्रदेश और महिला प्रधानों तक ही सीमित नहीं है बल्कि किसी भी राज्य में किसी भी महिला पद पर इस तरह के वाकयात देखे जा सकते हैं ,जहाँ निर्वाचित महिला का पति या पुत्र उस पद का कार्यभार सँभालते हैं और निर्वाचित महिला वाकई में एक रबर स्टाम्प की तरह है। चाहे पूर्व में कोई मुख्यमंत्री पद हे क्यों न हो, सच्चाई किसी से छिपी नहीं रहती। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस प्रथा की कड़ी आलोचना का सच्ची उजागर की है, जो वाकई प्रशंसनीय है।   

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow

THE NEWS THIKANA, संपादकीय डेस्क यह द न्यूजठिकाना डॉट कॉम की संपादकीय डेस्क है। डेस्क के संपादकीय सदस्यों का प्रयास रहता है कि अपने पाठकों को निष्पक्षता और निर्भीकता के साथ विभिन्न विषयों के सच्चे, सटीक, विश्वसनीय व सामयिक समाचारों के अलावाआवश्यक उल्लेखनीय विचारों को भी सही समय पर अवगत कराएं।