संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिशद उस पुराने क्लब की तरह हो चुकी है जिसके सदस्य अपनी पकड़ ढीली नहीं करना चाहते, इससे इस संस्था का प्रभाव घट रहा हैः एस जयशंकर
<p><em>भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर बिना किसी लाग-लपेट के खरी-खरी सुनाने के लिए दुनिया में विख्यात है। इस बार उन्होंने संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) को भी खूब सुनाया। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद एक पुराने क्लब की तरह हो गयी है जिसमें कुछ सदस्य अपनी पकड़ ढीली नहीं करना चाहते हैं। इसके परिणाम स्वरूप इसका प्रभाव घटने लगा है। दरअसल में भारत सुरक्षा परिषद में सुधार की बात करता रहा है और वह इसमें स्थायी सदस्यता की प्रभावशाली तरीके से अपने दावेदारी भी जताता रहा है। वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमेरिका और यूरोपीय देशों का वर्चस्व है और भारत की चाहत है कि इस वर्चस्व को खंडित किया जाए।</em></p> <p> </p>
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने रविवार, 17 दिसंबर को कहा कि सुरक्षा परिषद एक पुराने क्लब की तरह होकर रह गया है। यहां ऐसे सेट सदस्य हैं जो पकड़ को जाने नहीं देना चाहते हैं। दरअसल ये देश उस क्लब पर नियंत्रण रखना चाहते हैं। न तो वे ज्यादा सदस्यों को स्वीकार करने के लिए बहुत उत्सुक हैं और न ही वे चाहते हैं कि उनकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए जाएं। सच कहा जाय तो एक तरह से यह एक मानवीय विफलता है।
विदेश मंत्री बोले कि उन्हें लगता है कि आज इससे दुनिया को नुकसान पहुंचा रहा है। दुनिया के सामने मौजूद प्रमुख मुद्दों पर संयुक्त राष्ट्र कम प्रभावी होता जा रहा है। उन्होंने कहा, 'मैं आपको वैश्विक भावना भी बता सकता हूं। मेरा जयशंकर ने कहा कि और मैं आपको वैश्विक भावना भी बता सकता हूं. मेरा मतलब है, आज, अगर आप दुनिया के 200 देशों से पूछें, क्या आप सुधार चाहते हैं या नहीं चाहते हैं? बहुत बड़ी संख्या में देश कहेंगे, हां, हम चाहते हैं सुधार.... उन्होंने इस बात पर जोर देते हुए कहा कि राष्ट्र मौजूदा चुनौतियों से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार के प्रयासों का आग्रह कर रहे हैं। जयशंकर ने कहा कि इस संगठन की हालत बस में बैठे उन यात्रियों की तरह है जो दूसरे सवारी के लिए सीट नहीं छोड़ रहे हैं।
विदेश मंत्री एस जयशंकर हर मुद्दे पर खुलकर अपनी राय रखते हैं। उनकी इस बेबाकी के कारण ही भारतीय की विदेश नीति में आक्रामकता आई है। जब यूक्रेन से जंग के बीच रूस से पेट्रोल खरीदने पर सवाल खड़े किए गए थे तब भी जयशंकर ने यूरोप को आईना दिखा दिया था। जयशंकर कहते रहे हैं कि अपने लिए कुछ और दूसरों के लिए कुछ नियम नहीं रह सकते हैं। दुनिया में शक्ति का संतुलन तेजी से बदल रहा है। यह बदलाव संयुक्त राष्ट्र में प्रतिबिंबित नहीं होता है।
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