रोटी पलटेगी, या बढ़ेगी आंच...! क्या होगा सियासी चाणक्य शरद पवार का अगला दांव
<p><em><strong>एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार ने ऐलान कर दिया है कि वे पार्टी में अध्यक्ष का पद छोड़ देंगे। इसके साथ उन्होंने पार्टी में रोटी पलटने का संकेत दिया। राजनीति में कभी राम मनोहर लोहिया लोकतंत्र में रोटी अलटने-पलटने की बात करते थे। हालांकि पवार ने इस जुमले का इस्तेमाल पार्टी में पकड़ मजबूत करने के लिए ही किया है।</strong></em></p>
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी यानि नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के अध्यक्ष और दिग्गज नेता शरद पवार ने ऐलान किया है कि वह अब एनसीपी के अध्यक्ष पद को छोड़ देंगे। उन्होंने कहा कि रोटी को पलटने का समय आ गया है। पिछले कुछ दिनों से एनसीपी में अंदरूनी उथल-पुथल की खबरें आ रही थीं। इसके बाद अब पवार की इस घोषणा से जाहिर है कि वे रोटी तो पलटेंगे ही, एनसीपी में अपने विरोधियों को किनारे भी लगाएंगे। यानी सियासत से किनारे होकर बैठने की जगह शायद ज्यादा ताकत के साथ सियासी मोहरे चलने की स्थिति में होंगे।
भारतीय राजनीति में 50 और 60 के दशक में जब कांग्रेस का बोलबाला था और कोई विपक्षी दल आसपास नहीं था, तब समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया यह जुमला अक्सर बोला करते थे कि लोकतंत्र में जरूरी है कि रोटी को पलटा जाए। बिना अलटे-पलटे रोटी तरीके से पक नहीं पाती। लिहाजा अब नए परिप्रेक्ष्य में शरद पवार अपनी पार्टी में ऐसा ही करने जा रहे हैं।
बेटी को मिल सकती कमान
पार्टी के अंदर अजित पवार की बार-बार की बगावत को देखते हुए शरद पवार अब दूसरी पीढ़ी में शायद अब अपनी बेटी को पार्टी की कमान सौंपने जा रहे हैं। इसके बाद पार्टी में पवार को कमजोर करने के साथ बेटी की पकड़ को दमदार करने का काम करेंगे। सुप्रिया सुले को राजनीति में रहते दो दशक से ज्यादा का समय हो चुका है।
एनसीपी यानी शरद पवार
इसमें कोई शक नहीं कि महाराष्ट्र में एनसीपी का मतलब अब भी शरद पवार का ही चेहरा है लेकिन कुछ दिनों से अजित पवार पार्टी में खुद को ताकतवर बनाने के साथ विधायकों को अपनी ओर लाने में लगे थे। रोटी पलटकर वे पार्टी पर अब अपनी और अपने विश्वासपात्र लोगों की ही ताकत को बढ़ाएंगे। शरद पवार ने 55 सालों से राजनीति में लगातार अपने कद और महत्व को बनाए रखा है।
महाराष्ट्र की राजनीति उनके इर्द-गिर्द
शरद पवार की शख्सियत इतनी बड़ी है कि महाराष्ट्र की राजनीति उनके इर्द-गिर्द घूमती है। चाहे वे सत्ता में हों या फिर उससे बाहर लेकिन पवार की पावर पॉलिटिक्स हर पार्टी समझती है। पवार सूबे की सियासत के साथ क्रिकेट की सियासी पिच के भी धुरंधर हैं। मुंबई क्रिकेट काउंसिल के अध्यक्ष पद पर वे दस साल से भी ज्यादा समय तक बने रहे तो साल 2005 से 2008 तक भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड और साल 2010 से 2012 तक अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट काउंसिल के मुखिया भी रहे।
ऐसा रहा राजनीतिक सफर
पिछले 55 साल से लगातार प्रदेश की राजनीति में अंगद की तरह पैर जमाए शरद पवार राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर तीन बार शपथ ले चुके हैं। साल 2004 से लेकर 2014 तक वे मनमोहन सिंह की कैबिनेट में कृषि मंत्री रहे। इसके अलावा पवार केंद्र में रक्षा मंत्री के तौर पर भी काम कर चुके हैं। शरद पवार के राजनीतिक और व्यावहारिक आचरण की ही वजह से सत्ता पक्ष के साथ विपक्ष में उनके संबंध हमेशा अच्छे रहे। मौजूदा मोदी सरकार ने उन्हें साल 2017 में पद्मविभूषण से सम्मानित किया है, जो देश का दूसरा सबसे बड़ा सम्मानित सिविलियन पुरस्कार माना जाता है।
27 साल की उम्र में बने थे विधायक
शरद पवार की राजनीति की विशेषता शुरूआती दौर से ही सूझ-बूझ से भरी रही है। यही वजह रही कि साल 1967 में वे एमएलए चुने गए, जब उनकी उम्र महज 27 साल थी। शरद पवार लगातार उसके बाद बुलंदियों को छूते रहे और तत्कालीन दिग्गज नेता यशवंत राव चव्हाण उनके राजनीतिक संरक्षक के तौर पर उन्हें आगे बढ़ाते रहे।
इंदिरा से बगावत, नई पार्टी बनाई
शरद पवार का आत्म विश्वास इस कदर बढ़ चुका था कि इमरजेंसी के बाद इंदिरा गांधी से बगावत कर उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और साल 1978 में जनता पार्टी के साथ मिलकर महाराष्ट्र में सरकार का गठन किया और राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर पदभार ग्रहण किया। साल 1980 में इंदिरा सरकार की वापसी के बाद शरद पवार की सरकार बर्खास्त कर दी गई लेकिन शरद पवार ने साल 1983 में कांग्रेस पार्टी सोशलिस्ट का गठन कर प्रदेश की राजनीति में अपनी मजबूत पकड़ बरकरार रखी।
ना काहू से दोस्ती...
शरद पवार अपने सियासी जीवन में ना तो किसी राजनीतिक दल के दुश्मन रहे और ना दोस्त लेकिन समय और सुविधा के हिसाब से उन्होंने तुरंत समीकरण बिठाने में भी कोई कोताही नहीं की। उस साल हुए लोकसभा चुनाव में शरद पवार पहली बार बारामती से चुनाव जीते लेकिन साल 1985 में हुए विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी को मिली 54 सीटों पर जीत ने उन्हें वापस प्रदेश की राजनीति की ओर खींच लिया। शरद पवार ने लोकसभा से इस्तीफा देकर विधानसभा में विपक्ष का नेतृत्व किया लेकिन साल 1987 में वो वापस अपनी पुरानी पार्टी कांग्रेस में वापस आ गए और राजीव गांधी के नेतृत्व में आस्था जता कर उनके करीब हो गए। शरद पवार को साल 1988 में शंकर राव चव्हाण की जगह सीएम की कुर्सी मिली जबकि चव्हाण को साल 1988 में केन्द्र में वित्त मंत्री बनाया गया।
पीएम की रेस में था नाम
1990 के विधानसभा चुनाव में 288 सीटों में 141 पर कांग्रेस की जीत हो पाई थी लेकिन राजनीति के माहिर खिलाड़ी शरद पवार ने 12 निर्दलीय विधायक की मदद से सरकार बनाने में कामयाबी हासिल की. ऐसा कर वो तीसरी बार सीएम बनने में कामयाब रहे। लेकिन साल 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद शरद पवार का नाम उन तीन लोगों में आने लगा, जिन्हें कांग्रेस के अगले प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के तौर पर देखा जा रहा था। इन तीन नामों में नारायण दत्त तिवारी, पी वी नरसिम्हा राव और शरद पवार शामिल थे। नारायण दत्त तिवारी साल 1991 में हुए लोकसभा चुनाव में अप्रत्याशित हार की वजह से पीएम बनने से रह गए और ये मौका दूसरे सीनियर नेता पी वी नरसिम्हा राव को मिल गया जबकि शरद पवार को रक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली। लेकिन बाद में एक बार फिर शरद पवार को महाराष्ट्र की राजनीति के लिए वापस भेजा गया।
मुंबई ब्लास्ट से झेली आलोचना
6 मार्च 1993 को सुधाकर राव नाइक को हटा शरद पवार को सीएम बनाया गया गया लेकिन 12 मार्च 1993 को मुंबई में हुए सीरियल ब्लास्ट की वजह से शरद पवार सरकार पर जमकर राजनीतिक हमले हुए। इसका खामियाजा पार्टी को विधानसभा चुनाव में भुगतना पड़ा। बीजेपी-शिवसेना ने मुंबई बम ब्लास्ट के मुद्दे पर पवार सरकार पर निशाना साधते हुए साल 1995 में हुए विधानसभा चुनाव को जीत लिया। कांग्रेस को केवल 80 सीटें मिलीं।
विपक्ष के नेता भी रहे
साल 1998 के मध्यावधि लोकसभा चुनाव के बाद शरद पवार विपक्ष के नेता चुने गए लेकिन साल 1999 में जब 12वीं लोकसभा भंग हुई तो शरद पवार, पीए संगमा और तारिक अनवर ने विदेशी मूल के नेतृत्व के सवाल पर सोनिया गंधी पर सवाल उठाया और कांग्रेस से निष्कासन के बाद नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी का गठन किया। शरद पवार ने कांग्रेस से अलग होकर पार्टी जरूर बनाई लेकिन साल 1999 के महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में जनादेश न मिलने पर कांग्रेस से हाथ मिलाकर सरकार भी बना ली।
विवादों से भी घिरे रहे हैं पवार
स्टांप घोटाला हो या फिर जमीन आवंटन विवाद या फिर अपराधियों को बचाने से लेकर भ्रष्ट अधिकारियों से सांठगांठ। इन तमाम मुद्दों पर शरद पवार विपक्षियों द्वारा घेरे जाते रहे हैं। इतना ही नहीं, मुबई में 1993 में हुए सीरियल ब्लास्ट और दाऊद के साथ उनके कथित रिश्तों को लेकर विपक्षी दलों द्वारा खूब छींटाकशी हुई है। पूर्व आईएएस अधिकारी जीआर खैरनार द्वारा उनपर लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोप की वजह से साल 1993 में उनकी खूब किरकिरी हुई। यही वजह है कि साल 1995 में पवार जीत का परचम लहराने में नाकामयाब रहे।
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