आइये जानते हैं आज के दिन को क्यों कहते हैं नरकचौदस, रूप चतुर्दशी या काली चौदस
हमारे देश के पुरातन सनातन धर्म में नरक चतुर्दशी एक शुभ दिन है, जो सभी बुरी और नकारात्मक ऊर्जाओं को जीवन से दूर कर देता है। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष के 14वें दिन या चतुर्दशी तिथि को नरक चतुर्दशी मनाई जाती है। दीपावली से एक दिन पहले आने वाले इस त्योहार को छोटी दीपावली भी कहा जाता है।
पौराणिक मान्यताके अनुसार इसी चतुर्दशी पर भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर नमक राक्षस का वध किया था। अन्य मान्यता अनुसार कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के दिन सूर्योदय से पहले तिल का तेल मलकर स्नान करने से नरक से मुक्ति मिलती है। इसलिए इसे नरकाचौदस भी कहा जाता है। इसके साथ ही विधि-विधान से पूजा करने वाले व्यक्ति सभी पापों से मुक्त होकर स्वर्ग को प्राप्त होते हैं।
इस वर्ष (2024 ) नरक चतुर्दशी 30 अक्टूबर 2024 से प्रारंभ हो रही ।
चतुर्दशी तिथि प्रारम्भ - 30 अक्टूबर 2024 को 01:15 pm से
चतुर्दशी तिथि समाप्त - 31 अक्टूबर 2024 को 03:53 pm तक
नरक चतुर्दशी पूजा के नियम
नरक चौदस के दिन संध्या के समय पूजा करके दीपक प्रज्ज्वलित किये जाते हैं, और अकाल मृत्यु से मुक्ति और स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए भगवान से प्रार्थना की जाती है।
घर के लोग घर द्वार की सफाई के बाद दीपावली के एक दिन पहले अपने शरीर की सफाई करते हैं। उबटन के लिए तिल के तेल का प्रयोग किया जाता है। कहते हैं कि इस चतुर्दशी पर उबटन करके स्नान करके से व्यक्ति को रूप-गुण प्राप्त होता है इसीलिए इस दिन को रूप चौदस के नाम से भी जाना जाता है। उपरोक्त विधि के स्नान को अभ्यंग स्नान कहते हैं, ये बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि जो लोग इस दिन अभ्यंग स्नान करते हैं, वे नरक की यातना भोगने से बच सकते हैं।
हमारे देश के कई हिस्सों में इसी चतुर्दशी पर माता काली की पूजा की जाती है इसलिए इसे काली चौदस भी कहा जाता है। साथ ही इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार को भी पूजा जाता है।
नरक चतुर्दशी के दिन मृत्यु के देवता यमराज, भगवान हनुमान और भगवान श्रीकृष्ण की पूजा का विधान है। चूंकि दिवाली से जुड़े हर अनुष्ठान में माता लक्ष्मी, गणेश जी की पूजा होती है इसीलिए उन्हें भी इस पूजा में शामिल अवश्य करना चाहिए।
ऐसे करें नरक चतुर्दशी पर पूजा
- संध्या समय में पूजा की तैयारी शुरू करें।
- पूजा स्थल को साफ करके यहां आटे या चावल की मदद से एक स्वास्तिक बनाएं। ईशान कोण या पूर्व दिशा में चौकी की स्थापना करें।
जिस स्थान पर आप चौकी की स्थापना करेंगे, उसके दाएं तरफ एक घी का दीपक जलाएं।
- अब चौकी को स्थापित करके इस पर एक साफ लाल वस्त्र बिछाएं। इसे गंगाजल से शुद्ध करें।
- अब सभी भगवानों के आसन के स्वरूप में चौकी पर कुछ अक्षत डालें। इस चौकी पर माता लक्ष्मी, गणेश जी और श्रीकृष्ण भगवान के किसी भी स्वरूप को स्थापित करें।
- भगवान हनुमान जी की स्थापना भी इसी तरह से करें। बस ध्यान रखें, कि चौकी पर हनुमान जी ऐसे विराजित हो कि उनका मुख दक्षिण दिशा की ओर हो।
- यमराज जी की स्थापना में लिए चौकी पर बाएं तरफ, जो कि आपका दायां होगा, कुछ चावल आसन स्वरूप डालें, इस पर एक आटे का दीया बनाकर रखें औरऔर इसमें सरसो का तेल और चार बाती रखें। इस दीप को प्रज्वलित करें।
- अब 14 मिट्टी के दीपक प्रज्वलित करने के लिए पूजा की चौकी के पास रखें।
अब जल पात्र से तीन बार आचमन विधि करें और चौथी बार बाएं हाथ से दाएं हाथ में जल लेकर हाथ साफ करें। इसके बाद स्वस्तिवाचन मन्त्र का उच्चारण करें। अब प्रथम पूज्य श्रीगणेश, माता लक्ष्मी, भगवान कृष्ण, हनुमान जी और यमदीप पर गंगाजल छिड़कें। इसके बाद सभी देवों के लिए हल्दी, कुमकुम, रोली, चंदन, पुष्प आदि से पंचोपचार की क्रिया पूरी करें। चौकी पर विराजमान देवों को कलावा अर्पित करें। हनुमान जी के चरणों में भी चन्दन लगाएं।
धुप, अगरबत्ती जलाएं और दीपक प्रज्वलित करें। इसके बाद भोग के लिए मिठाई और गुड़-चना रखें।
- सभी देवों को प्रणाम करें और अपने परिवार की मंगल कामना और सुख समृद्धि के लिए प्रार्थना करें।
- यमराज जी के लिए जलाएं गए दीप को घर के बाहर रखें। और हाथ जोड़कर उनसे अच्छे स्वास्थ्य और और असमय मृत्यु से सुरक्षा की कामना करते हुए वापिस घर में आ जाएं। घर के सदस्यों को भोग अर्पित करें।
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