कैश कांड: जांच पूरी होने से पहले दस्तावेज़ सार्वजनिक नहीं होने चाहिए थे-कपिल सिब्बल

वरिष्ठ अधिवक्ता और सांसद कपिल सिब्बल ने कहा है कि दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश के घर पर कैश मिलने से जुड़े मामले में जांच पूरी होने से पहले दस्तावेज़ों को सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए था..

कैश कांड: जांच पूरी होने से पहले दस्तावेज़ सार्वजनिक नहीं होने चाहिए थे-कपिल सिब्बल
16-04-2025 - 01:11 PM
22-04-2026 - 05:53 PM

नयी दिल्ली। वरिष्ठ अधिवक्ता और सांसद कपिल सिब्बल ने कहा है कि दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश के घर पर कैश मिलने से जुड़े मामले में जांच पूरी होने से पहले दस्तावेज़ों को सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए था। उन्होंने कहा कि इस तरह की जल्दबाज़ी से न्यायपालिका के लिए यह मामला "जीरो-सम गेम" बन जाता है – चाहे नतीजा कुछ भी हो।

सिब्बल ने ThePrint को दिए एक साक्षात्कार में कहा, मैं पूरी तरह से ‘गैग ऑर्डर’ (मीडिया प्रतिबंध) के खिलाफ हूं, लेकिन यह मामला ऐसा था जहां गैग ऑर्डर होना चाहिए था। कहा जाना चाहिए था कि जब तक हमारी ‘इन-हाउस जांच प्रक्रिया’ पूरी नहीं होती, तब तक कुछ भी सार्वजनिक नहीं किया जाएगा। आखिर हम एक संस्था की बात कर रहे हैं।”

उन्होंने आगे कहा, जनता के सामने कुछ भी नहीं आना चाहिए था। आप ऐसे कुछ सार्वजनिक नहीं कर सकते—विशेषकर जब वह खुद न्यायपालिका से निकला हो—क्योंकि लोग तुरंत उसे सच मान लेते हैं। पहले इन-हाउस जांच होनी चाहिए थी, और अगर कुछ गलत पाया जाता, तब उसे सार्वजनिक किया जाता।”

घटना का संदर्भ
14 मार्च 2025 को दिल्ली हाईकोर्ट के जज यशवंत वर्मा के घर आग लगने की घटना के बाद, वहां की एक स्टोर रूम से भारी मात्रा में नकदी बरामद हुई थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 24 मार्च को कई दस्तावेज़, तस्वीरें और वीडियो अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड किए, जिससे यह मामला सार्वजनिक बहस का विषय बन गया।

सिब्बल ने कहा, अगर जांच में कुछ नहीं निकलता—और वह हमारे सबसे अच्छे जजों में से एक हैं; उनके खिलाफ कभी कोई नकारात्मक बात नहीं सुनी—तो भी जनता कहेगी कि आपने उन्हें बचा लिया, मामले को दबा दिया।” उन्होंने कहा, और अगर मामला आगे बढ़ता है, तो हर हारने वाला वादी कहेगा कि जज ने पैसे लिए थे। तो यह किसी के लिए भी जीत की स्थिति नहीं है।”

न्यायिक जवाबदेही और प्रणाली की ज़रूरत

जब उनसे पूछा गया कि इस प्रकार के मामलों में न्यायपालिका की जवाबदेही कैसे तय होनी चाहिए, तो उन्होंने कहा कि आवश्यकता है एक संस्थागत व्यवस्था की—ना कि केवल एक स्थिति आधारित प्रतिक्रिया की।

उन्होंने कहा, जब हम न्यायपालिका की बात करते हैं, तो हम किसी आम व्यक्ति की बात नहीं कर रहे। यह वही संस्था है जो आज भी संविधान को बचा सकती है। जब न्यायपालिका पर आरोप लगते हैं, तो सबसे पहले हमें संस्था की रक्षा करनी चाहिए जब तक कि हमारे पास ठोस प्रमाण न हों। किसी जज को बदनाम नहीं किया जाना चाहिए।”

सिब्बल ने सुझाव दिया कि ऐसी व्यवस्था बार एसोसिएशन से संवाद करके तैयार की जानी चाहिए। उन्होंने कहा, आपको एक मजबूत संस्थागत प्रणाली बनानी होगी, जिसमें बार के साथ बातचीत शामिल हो। यह एक सहयोगात्मक प्रक्रिया होगी क्योंकि हम भी ‘खराब सिक्कों’ से छुटकारा पाना चाहते हैं—एक खराब सिक्का पूरे संस्थान की छवि खराब कर सकता है। हम ऐसा नहीं चाहते, क्योंकि यही हमारी ज़िंदगी है।”

NJAC कोई समाधान नहीं – सिब्बल

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि नेशनल ज्यूडिशियल अपॉइंटमेंट्स कमीशन (NJAC) न्यायिक जवाबदेही का समाधान नहीं है।

2015 में सुप्रीम कोर्ट की एक संविधान पीठ ने NJAC को असंवैधानिक करार देते हुए कोलेजियम व्यवस्था को बरकरार रखा था।

सिब्बल ने कहा, “मैं बिल्कुल नहीं मानता कि NJAC कोई समाधान है। एक सरकार जो बाकी संस्थानों को खत्म कर सकती है… वह इस एकमात्र संस्था को भी खत्म कर देगी।”

जजों की नियुक्ति पर राय

उन्होंने यह भी जोड़ा, “सरकार को जजों की नियुक्ति प्रक्रिया में प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए, लेकिन नियंत्रण नहीं। इसलिए यह जरूरी है कि चयन प्रक्रिया व्यापक और संतुलित हो।”

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THE NEWS THIKANA, संपादकीय डेस्क यह द न्यूजठिकाना डॉट कॉम की संपादकीय डेस्क है। डेस्क के संपादकीय सदस्यों का प्रयास रहता है कि अपने पाठकों को निष्पक्षता और निर्भीकता के साथ विभिन्न विषयों के सच्चे, सटीक, विश्वसनीय व सामयिक समाचारों के अलावाआवश्यक उल्लेखनीय विचारों को भी सही समय पर अवगत कराएं।