कांग्रेस के लिए मुश्किल फैसला: शशि थरूर से बढ़ता मतभेद
कांग्रेस सांसद शशि थरूर द्वारा केंद्र सरकार के नामांकन को स्वीकार करते हुए अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करना, खासतौर पर पाकिस्तान के साथ संघर्ष और पहलगाम हमले को लेकर मोदी सरकार के बचाव में दिए गए उनके हालिया बयानों के बाद, पार्टी लाइन से हटने के रूप में देखा जा रहा है..
नयी दिल्ली। कांग्रेस सांसद शशि थरूर द्वारा केंद्र सरकार के नामांकन को स्वीकार करते हुए अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करना, खासतौर पर पाकिस्तान के साथ संघर्ष और पहलगाम हमले को लेकर मोदी सरकार के बचाव में दिए गए उनके हालिया बयानों के बाद, पार्टी लाइन से हटने के रूप में देखा जा रहा है। कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में भी इस पर असंतोष जताया गया था। यह कदम पार्टी के लिए एक सीधी चुनौती मानी जा रही है।
केरल चुनावों के बीच कांग्रेस की उलझन
थरूर को लेकर कांग्रेस की दुविधा ऐसे समय में सामने आई है जब पार्टी केरल विधानसभा उपचुनाव में वाम मोर्चा और भाजपा के बढ़ते प्रभाव से जूझ रही है। थरूर की लोकप्रियता और स्वतंत्र रवैया पार्टी नेतृत्व के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता है।
BJP का तंज: क्या कांग्रेस को जलन हो रही है?
बीजेपी आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने सवाल उठाया, “शशि थरूर की योग्यता, विदेश नीति पर गहरी समझ और UN में अनुभव से कौन इनकार कर सकता है? फिर कांग्रेस — खासकर राहुल गांधी — ने उन्हें खुद क्यों नहीं नामित किया? क्या ये असुरक्षा है? ईर्ष्या है? या फिर किसी ऐसे को बर्दाश्त न कर पाने की समस्या, जो 'हाई कमान' से ज़्यादा चमकता हो?”
कांग्रेस की प्रतिक्रिया और आरोप
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सरकार के प्रतिनिधिमंडल में नाम भेजने के तरीके को “अमानदारी के खिलाफ” और “शरारतपूर्ण” बताया। उन्होंने कहा, “लोकतंत्र में जब कोई सांसद आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल में जाता है, तो उसे पार्टी की सहमति लेनी चाहिए।”
हालांकि, थरूर के नामांकन स्वीकार करने से कांग्रेस की आपत्ति कमजोर पड़ गई। थरूर ने कहा, “यह राष्ट्रीय हित का विषय है और इसे दलगत राजनीति के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। मेरे लिए यह सम्मान की बात है।”
थरूर पूर्व में विदेश मामलों के राज्य मंत्री रह चुके हैं और संयुक्त राष्ट्र के वरिष्ठ अधिकारी भी रहे हैं। कांग्रेस ने ही उन्हें विदेश मामलों की स्थायी समिति का प्रमुख बनाने की सिफारिश की थी।
INDIA गठबंधन के सहयोगियों का रवैया
कांग्रेस की सहयोगी पार्टियों — DMK की कनिमोई और NCP की सुप्रिया सुले — ने भी सरकार के निमंत्रण को स्वीकार कर लिया है। अन्य प्रतिनिधिमंडलों का नेतृत्व रवि शंकर प्रसाद (BJP), संजय झा (JDU), श्रीकांत शिंदे (शिवसेना), और बैजयंत पांडा (BJP) कर रहे हैं।
सरकार का जवाब
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कांग्रेस को स्पष्ट किया कि “प्रतिनिधिमंडल में नाम तय करना दलगत राजनीति से जुड़ा नहीं है।”
सरकारी सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस को बताया गया कि यह राष्ट्रीय नीति और कूटनीति से जुड़ा विषय है, पार्टी प्राथमिकताओं से नहीं।
BJP का कांग्रेस पर पलटवार
अमित मालवीय ने कांग्रेस की प्रतिनिधि पसंद पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा, “कांग्रेस ने सैयद नसीर हुसैन को प्रतिनिधि बनाया, जिनके समर्थकों ने विधानसभा में 'पाकिस्तान ज़िंदाबाद' के नारे लगाए थे।”
उन्होंने गौरव गोगोई पर भी निशाना साधते हुए कहा, “उन्होंने पाकिस्तान में 15 दिन बिताए, और उनके प्रवेश व निकास का रिकॉर्ड अटारी बॉर्डर पर दर्ज है।”
यह विवाद राष्ट्रीय कूटनीति और दलगत सीमाओं के टकराव को उजागर करता है। कांग्रेस को अब यह तय करना होगा कि वह थरूर जैसे अनुभवी नेता को खुलकर समर्थन दे या पार्टी लाइन से अलग बयानबाज़ी को लेकर उन्हें संयम में लाने का प्रयास करे।
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