भारत से अब तक का सबसे भारी उपग्रह प्रक्षेपित करने जा रहा है इसरो

करीब तीन महीने बाद होने वाले अपने पहले प्रक्षेपण में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) रविवार शाम अपने सबसे बड़े रॉकेट LVM-3 का उपयोग कर एक संचार उपग्रह CMS-03 को अंतरिक्ष में भेजेगा..

भारत से अब तक का सबसे भारी उपग्रह प्रक्षेपित करने जा रहा है इसरो
02-11-2025 - 10:43 AM

बेंगलुरू। करीब तीन महीने बाद होने वाले अपने पहले प्रक्षेपण में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) रविवार शाम अपने सबसे बड़े रॉकेट LVM-3 का उपयोग कर एक संचार उपग्रह CMS-03 को अंतरिक्ष में भेजेगा।
यह पहली बार होगा जब इसरो भारत की धरती से 4,000 किलोग्राम से अधिक वजनी उपग्रह को जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (GTO) में स्थापित करेगा।

CMS-03 एक मल्टी-बैंड कम्युनिकेशन सैटेलाइट है, जिसका वजन 4,410 किलोग्राम है। इसे पृथ्वी की सतह से लगभग 29,970 किलोमीटर x 170 किलोमीटर की ट्रांसफर कक्षा में स्थापित किया जाएगा।
अब तक इसरो को अपने ऐसे भारी उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए विदेशी निजी अंतरिक्ष एजेंसियों की मदद लेनी पड़ती थी। यह लॉन्च LVM-3 रॉकेट की बढ़ती क्षमता का प्रतीक है — इसी रॉकेट का संशोधित संस्करण भविष्य में गगनयान मिशन के तहत मानवों को अंतरिक्ष में भेजने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा।

 LVM-3 की क्षमता

LVM-3, जिसे पहले GSLV मार्क-III (Geosynchronous Launch Vehicle Mk-III) कहा जाता था, ठोस (Solid), द्रव (Liquid) और क्रायोजेनिक (Cryogenic) ईंधनों का उपयोग करता है।
यह रॉकेट

  • 8,000 किलोग्राम तक का पेलोड लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) में (2,000 किमी तक की ऊंचाई तक)
  • और 4,000 किलोग्राम तक का पेलोड जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट (लगभग 36,000 किमी) तक ले जा सकता है।

इसरो ने प्रारंभ में PSLV रॉकेट को पोलर और लो-अर्थ ऑर्बिट के लिए, जबकि GSLV-II और GSLV Mk-III को जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट के लिए डिजाइन किया था।

2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच इस रॉकेट को अनुकूलित कर 72 OneWeb उपग्रहों को दो मिशनों में लो-अर्थ ऑर्बिट में भेजा गया था। इसके बाद इसका नाम LVM-3 रखा गया क्योंकि यह सिर्फ जियोसिंक्रोनस नहीं बल्कि अन्य कक्षाओं में भी उपग्रह भेजने में सक्षम साबित हुआ।

उस समय OneWeb, एक वैश्विक इंटरनेट सैटेलाइट कंपनी, अपने प्रक्षेपण के लिए प्रदाता ढूंढने में असमर्थ थी — रूस ने अपने प्रक्षेपण रोक दिए थे, जबकि यूरोपीय एरियन-5 रॉकेट रिटायर हो चुका था। इस मिशन के दौरान LVM-3 ने 5,700 किलोग्राम से अधिक पेलोड को 450 किमी की लो-अर्थ ऑर्बिट में सफलतापूर्वक पहुंचाया।

भारत के पहले के भारी उपग्रह जैसे —

  • GSAT-11 (5,854 किग्रा) और
  • GSAT-24 (4,181 किग्रा)
    को Ariane Space से लॉन्च किया गया था,
    जबकि GSAT-20 (4,700 किग्रा) को पिछले वर्ष Elon Musk की SpaceX द्वारा कक्षा में स्थापित किया गया था।

इस बार 4,410 किलोग्राम के CMS-03 उपग्रह को समायोजित करने के लिए इसरो ने GTO की ऊंचाई को थोड़ा कम किया है, यानी इसकी अधिकतम ऊंचाई 29,970 किमी रखी गई है। इसरो अब इस रॉकेट की क्षमता और बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है।

 रॉकेट में किए जा रहे सुधार

इसरो वर्तमान में इस लॉन्च व्हीकल की कैरींग क्षमता बढ़ाने पर काम कर रहा है, खासकर इसे भविष्य के मानव अंतरिक्ष मिशन (Gaganyaan) के लिए तैयार किया जा रहा है।

1. क्रायोजेनिक ऊपरी चरण (Cryogenic Upper Stage) में बदलाव

रॉकेट का तीसरा चरण यानी C25 क्रायोजेनिक इंजन वर्तमान में 28,000 किग्रा ईंधन के साथ 20 टन का थ्रस्ट उत्पन्न करता है।
नया C32 चरण 32,000 किग्रा ईंधन ले सकेगा और 22 टन का थ्रस्ट उत्पन्न करेगा — इससे रॉकेट की शक्ति और पेलोड क्षमता दोनों में वृद्धि होगी।

 2. दूसरा चरण ‘सेमी-क्रायोजेनिक’ बनाया जाएगा

इसरो दूसरे चरण में तरल ईंधन (liquid propellant) की जगह सेमी-क्रायोजेनिक इंजन का उपयोग करने की योजना बना रहा है। इसमें रिफाइंड केरोसीन और लिक्विड ऑक्सीजन का प्रयोग होगा।
यह परिवर्तन न केवल लागत को कम करेगा, बल्कि रॉकेट की क्षमता भी बढ़ाएगा।

नये इंजन के साथ यह रॉकेट लो-अर्थ ऑर्बिट में लगभग 10,000 किग्रा तक का पेलोड भेजने में सक्षम होगा (वर्तमान में 8,000 किग्रा तक सीमित है)।
इसी उन्नत संस्करण से भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (Bharatiya Antariksh Station) के पहले और हल्के मॉड्यूल को भेजा जाएगा।
इसके बाद के भारी मॉड्यूल्स के लिए एक नया रॉकेट — Lunar Module Launch Vehicle (LMLV)विकसित किया जा रहा है, जो 80,000 किग्रा तक का पेलोड ले जाने में सक्षम होगा।

अब तक के प्रक्षेपण और सफलताएँ

LVM-3 इसरो का सबसे भारी और सबसे सफल लॉन्च व्हीकल माना जाता है। इसकी अब तक की सभी सात उड़ानें सफल रही हैं और सभी उपग्रहों को निर्धारित कक्षा में स्थापित किया गया है।

इसी रॉकेट ने चंद्रयान-2 और चंद्रयान-3 को अंतरिक्ष में भेजा था, साथ ही GSAT-19 और GSAT-29 जैसे संचार उपग्रहों का भी प्रक्षेपण किया।

तुलना करें तो —

  • GSLV रॉकेट की 18 उड़ानों में से 4 असफल रही हैं।
  • जबकि PSLV, जिसे इसरो का कार्यघोड़ा कहा जाता है, उसकी 63 उड़ानों में से केवल 3 में विफलता दर्ज की गई है।
    सबसे हाल की असफलता मई 2025 में EOS-9 उपग्रह मिशन के दौरान हुई थी।

2014 में GSLV-Mk3 की पहली उड़ान में इसने एक क्रू मॉड्यूल (Crew Module) को भी अंतरिक्ष में भेजा था — यह भारत के लिए पहला ‘री-एंट्री टेस्ट’ था, जो भविष्य के मानव मिशनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इससे यह सुनिश्चित करने में मदद मिली कि वायुमंडल में प्रवेश के दौरान उत्पन्न भारी घर्षण और तापमान के बावजूद अंतरिक्ष यात्री सुरक्षित लौट सकें।

संक्षेप में:
CMS-03 का प्रक्षेपण भारत के अंतरिक्ष इतिहास में एक नया मील का पत्थर होगा।
यह न केवल इसरो की बढ़ती स्वदेशी प्रक्षेपण क्षमता को दर्शाता है, बल्कि भविष्य में मानव मिशन और अंतरिक्ष स्टेशन परियोजनाओं की दिशा में एक ठोस कदम भी है।

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THE NEWS THIKANA, संपादकीय डेस्क यह द न्यूजठिकाना डॉट कॉम की संपादकीय डेस्क है। डेस्क के संपादकीय सदस्यों का प्रयास रहता है कि अपने पाठकों को निष्पक्षता और निर्भीकता के साथ विभिन्न विषयों के सच्चे, सटीक, विश्वसनीय व सामयिक समाचारों के अलावाआवश्यक उल्लेखनीय विचारों को भी सही समय पर अवगत कराएं।