केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में कहा, आपराधिक रूप से दोषी नेताओं पर आजीवन प्रतिबंध अनुचित..!
इसी सप्ताह बुधवार को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में आपराधिक रूप से दोषी ठहराए गए नेताओं पर आजीवन प्रतिबंध की मांग वाली याचिका का विरोध किया। केंद्र ने कहा कि ऐसा प्रतिबंध लगाना पूरी तरह से संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है।
नयी दिल्ली। इसी सप्ताह बुधवार को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में आपराधिक रूप से दोषी ठहराए गए नेताओं पर आजीवन प्रतिबंध की मांग वाली याचिका का विरोध किया। केंद्र ने कहा कि ऐसा प्रतिबंध लगाना पूरी तरह से संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है।
क्या है केंद्र का पक्ष?
- केंद्र ने अदालत में दाखिल हलफनामे में कहा कि याचिका में की गई मांग संसद द्वारा बनाए गए कानून को फिर से लिखने के समान है और अदालत को संसद को किसी विशेष तरीके से कानून बनाने का निर्देश देने का अधिकार नहीं है।
- हलफनामे में कहा गया कि दंड की अवधि को सीमित करने से दंडात्मक प्रभाव बना रहता है और अत्यधिक कठोरता से बचा जा सकता है।
- केंद्र ने यह भी कहा कि सजा के प्रभाव को समय सीमा तक सीमित करना कोई असंवैधानिक प्रथा नहीं है, बल्कि यह कानून का स्थापित सिद्धांत है।
वर्तमान कानून क्या कहता है?
- जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8 (1) के तहत, दोषसिद्धि के दिन से छह वर्षों के लिए अयोग्यता लागू होती है।
- यदि दोषी नेता को जेल की सजा दी गई हो, तो रिहाई के बाद छह साल तक चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित किया जाता है।
केंद्र ने क्यों किया आजीवन प्रतिबंध का विरोध?
- केंद्र का कहना है कि संसद ने दंड के सिद्धांतों में उचित अनुपात और उचितता को ध्यान में रखते हुए यह सीमा तय की है।
- आजीवन प्रतिबंध लगाने का निर्णय पूरी तरह संसद के विवेकाधिकार में है।
- न्यायिक समीक्षा के तहत अदालत केवल प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित कर सकती है, लेकिन संसद के कानून को अपने तरीके से लागू करने के लिए बाध्य नहीं कर सकती।
याचिका में क्या मांग की गई है?
यह याचिका अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर की गई है, जिसमें मांग की गई है:
- आपराधिक मामलों में दोषी सांसदों और विधायकों पर आजीवन चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाया जाए।
- जनप्रतिनिधियों के खिलाफ आपराधिक मामलों का शीघ्र निपटारा किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट का रुख
- सुप्रीम कोर्ट ने 10 फरवरी को केंद्र और चुनाव आयोग से इस याचिका पर जवाब मांगा था।
- अदालत ने यह स्पष्ट किया कि वह इस मामले में कानून की संवैधानिक वैधता की जांच करेगी।
केंद्र सरकार ने साफ किया है कि दोषी नेताओं पर आजीवन प्रतिबंध लगाना संसद का विशेषाधिकार है और अदालत इस पर हस्तक्षेप नहीं कर सकती। अब सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर है, जो देश में राजनीति और चुनावी व्यवस्था को बड़ा मोड़ दे सकता है।
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