“आप आरोपी हैं”: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने ‘मोहम्मद’ दीपक कुमार की याचिका खारिज की, सोशल मीडिया पोस्ट पर लगाई रोक
Uttarakhand High Court ने ‘मोहम्मद’ दीपक कुमार द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने साथ ही दीपक और उनके सह-याचिकाकर्ता विजय रावत को मामले से संबंधित किसी भी प्रकार की पोस्ट या वीडियो सोशल मीडिया पर साझा..
देहरादून। Uttarakhand High Court ने ‘मोहम्मद’ दीपक कुमार द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने साथ ही दीपक और उनके सह-याचिकाकर्ता विजय रावत को मामले से संबंधित किसी भी प्रकार की पोस्ट या वीडियो सोशल मीडिया पर साझा करने से रोक दिया है।
न्यायमूर्ति Rakesh Thapliyal ने सुनवाई के दौरान कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता मामले को अनावश्यक रूप से सनसनीखेज बना रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट निर्देश दिया कि चूंकि दोनों याचिकाकर्ता जांच का सामना कर रहे आरोपी हैं, इसलिए उन्हें सोशल मीडिया पर कोई बयान देने से परहेज करना चाहिए।
मामला 26 जनवरी 2021 की एक घटना से जुड़ा है, जब दीपक कुमार ने कथित तौर पर कुछ लोगों का विरोध किया था, जो एक 70 वर्षीय मुस्लिम दुकानदार पर उसकी दुकान के नाम से “बाबा” शब्द हटाने का दबाव बना रहे थे। इस दौरान दीपक ने स्वयं को “मोहम्मद दीपक” बताया था। इसके पांच दिन बाद, 31 जनवरी को कथित रूप से Bajrang Dal के कुछ सदस्य दीपक के घर पहुंचे, हालांकि पुलिस ने हस्तक्षेप कर स्थिति को नियंत्रित कर लिया।
याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि पुलिस ने हमलावरों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की, जबकि उनके पास वीडियो साक्ष्य उपलब्ध थे। हालांकि, अदालत ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता स्वयं सोशल मीडिया पर सक्रिय रहकर मामले को प्रचारित कर रहे हैं, जो जांच प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है।
अदालत ने दीपक द्वारा मांगी गई अन्य राहतों जैसे पुलिस सुरक्षा, हमलावरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश और संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई को भी खारिज कर दिया। न्यायालय ने इन मांगों को मामले को “सनसनीखेज” बनाने का प्रयास बताया।
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि दीपक को पूर्व में 3 फरवरी से 13 मार्च तक पुलिस सुरक्षा प्रदान की जा चुकी है और केवल जांच का सामना करने के आधार पर स्थायी सुरक्षा का अधिकार नहीं बनता।
अदालत ने निर्देश दिया कि मामले की जांच निष्पक्ष और पारदर्शी ढंग से की जाए तथा याचिकाकर्ता जांच में पूरा सहयोग करें। साथ ही यह भी कहा गया कि चूंकि एफआईआर में लगाए गए आरोप सात वर्ष तक की सजा वाले हैं, इसलिए जांच Arnesh Kumar vs State of Bihar के दिशा-निर्देशों के अनुरूप की जानी चाहिए।
न्यायालय ने अंत में कहा कि कानून का पालन सभी नागरिकों का कर्तव्य है और जांच के दौरान अनावश्यक सार्वजनिक बयानबाजी से बचना आवश्यक है।
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