सुप्रीम कोर्ट में 'भूतिया याचिकाकर्ता' पर रहस्य गहराया, तीसरे वकील ने भी खुद को मामले से अलग किया
सुप्रीम कोर्ट में एक 'भूतिया याचिकाकर्ता' को लेकर रहस्य और गहराता जा रहा है, क्योंकि मंगलवार को तीसरे वकील ने, जिनका नाम इस याचिकाकर्ता से संबंधित आदेश पत्र में दर्ज था, अदालत को बताया कि उनका इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है..
नयी दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में एक 'भूतिया याचिकाकर्ता' को लेकर रहस्य और गहराता जा रहा है, क्योंकि मंगलवार को तीसरे वकील ने, जिनका नाम इस याचिकाकर्ता से संबंधित आदेश पत्र में दर्ज था, अदालत को बताया कि उनका इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है और उन्हें नहीं पता कि उनका नाम इसमें कैसे आ गया।
बार एसोसिएशनों ने वकीलों की भूमिका से इनकार करते हुए किसी बाहरी व्यक्ति की संलिप्तता की आशंका जताई है और इस पूरे मामले की पुलिस जांच और दस्तावेजों की फोरेंसिक जांच की मांग की है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने विचार करने की सहमति दी है।
इस संदिग्ध मामले में, एक याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से अपने पक्ष में आदेश हासिल कर लिया, जिसमें उसने एक 'भूतिया' प्रतिवादी (ghost opponent) को खड़ा किया, जिसने अदालत को बताया कि उसने ज़मीन विवाद में याचिकाकर्ता से समझौता कर लिया है। अदालत ने इस आधार पर मुजफ्फरपुर की निचली अदालत और पटना हाईकोर्ट के याचिकाकर्ता के खिलाफ दिए गए आदेशों को रद्द कर दिया।
हालांकि पांच महीने बाद असली प्रतिवादी सामने आया और अदालत को बताया कि उसने न तो याचिकाकर्ता से कोई समझौता किया है और न ही सुप्रीम कोर्ट में किसी वकील को प्रतिनिधित्व के लिए नियुक्त किया।
इस मामले में चार वकीलों के नाम आदेश पत्र में दर्ज थे, जिनमें से तीन जाने-माने वकील हैं लेकिन चौथे वकील का नाम किसी ने पहले नहीं सुना था। जांच में पता चला कि जिसने कथित तौर पर फर्जी पक्ष की ओर से पैरवी की, वह अब वकालत नहीं करता और वह तथा उसकी बेटी — जिनका नाम भी आदेश में था — इस मामले से पूरी तरह अनजान हैं।
इसके बाद अदालत ने तीसरे वकील को तलब किया।
न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और अतुल एस. चंदुरकर की पीठ के समक्ष पेश हुए अधिवक्ता रतन लाल ने अदालत को बताया कि उन्होंने न तो इस मामले में कुछ किया और न ही उनका इससे कोई संबंध है।
अब तक तीनों वकीलों ने मामले से अपने संबंध से इनकार कर दिया है और चौथा वकील अब तक नहीं मिला है। इस पर सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) और सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन (SCAORA) ने पीठ को बताया कि इस कृत्य में वकीलों की कोई भूमिका नहीं है।
SCAORA के अध्यक्ष विपिन नायर ने कहा कि इस मामले में जांच जरूरी है और यह भी अहम है कि जांच कौन करेगा। उन्होंने अदालत से कहा:
"किसी भी वकील या एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड (AOR) पर सीधे तौर पर आरोप नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता की ओर से कागजात में फर्जीवाड़ा किए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इसलिए पूरी जांच आवश्यक है।"
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि मामले की जांच के लिए पुलिस को लगाया जाना चाहिए। अदालत ने संक्षिप्त सुनवाई के बाद कहा कि वह सभी पहलुओं पर विचार कर आदेश पारित करेगी।
बता दें कि दिसंबर में सुप्रीम कोर्ट ने कथित 'समझौता' प्रस्तुत किए जाने के आधार पर आदेश पारित किया था और उस दिन की आदेश-पत्र में चार वकीलों के नाम दर्ज किए गए थे।
What's Your Reaction?