न राफेल, न F-35! सेना ने मांगा ₹1.12 लाख करोड़ का डिफेंस सिस्टम, मंजूर हुए सिर्फ ₹36,000 करोड़
ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत की रक्षा तैयारियाँ बुलेट ट्रेन जैसी रफ्तार से आगे बढ़ रही हैं। सरकार ने सैन्य आधुनिकीकरण में ₹3 लाख करोड़ से ज़्यादा का निवेश शुरू कर दिया है। मकसद है या तो उन्नत लड़ाकू विमान, पनडुब्बियाँ और मिसाइल प्रणालियाँ खरीदी जाएँ या उन्हें स्वदेशी रूप से विकसित...
नयी दिल्ली। ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत की रक्षा तैयारियाँ बुलेट ट्रेन जैसी रफ्तार से आगे बढ़ रही हैं। सरकार ने सैन्य आधुनिकीकरण में ₹3 लाख करोड़ से ज़्यादा का निवेश शुरू कर दिया है। मकसद है या तो उन्नत लड़ाकू विमान, पनडुब्बियाँ और मिसाइल प्रणालियाँ खरीदी जाएँ या उन्हें स्वदेशी रूप से विकसित किया जाए। एक-एक कर कई बड़े रक्षा सौदे मंजूर हो रहे हैं और गति थमने का नाम नहीं ले रही।
इसी महीने रक्षा मंत्रालय ने एक झटके में ₹1 लाख करोड़ से अधिक की सैन्य खरीद को मंजूरी दी। इनमें ₹44,000 करोड़ 12 माइन काउंटर मेज़र वेसल्स (MCMVs) के लिए और ₹36,000 करोड़ छह रेजिमेंट्स के क्विक रिएक्शन सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम (QRSAM) के लिए स्वीकृत किए गए हैं।
ये छह QRSAM रेजिमेंट्स भारतीय थलसेना और वायुसेना के बीच समान रूप से बाँटी जाएंगी।
लेकिन कहानी में मोड़ यह है कि यह केवल उसी माँग का छोटा-सा हिस्सा है जो सेना और वायुसेना ने की थी।
माँग थी 11 रेजिमेंट्स, मिलीं सिर्फ 3
भारतीय सेना ने 11 QRSAM रेजिमेंट्स की मांग की थी, लेकिन मंजूरी मिली केवल 3 रेजिमेंट्स की। वायुसेना की अलग मांग भी अधूरी रह गई।
यदि दोनों सेवाओं को उनकी पूरी मांग के अनुसार QRSAM मिलतीं, तो इसकी कुल लागत ₹1.12 लाख करोड़ तक पहुँचती। लेकिन सरकार ने फिलहाल ₹36,000 करोड़ में ही रुकने का फैसला लिया है।
'बेबी S-400' की एंट्री
QRSAM को अब 'बेबी S-400' भी कहा जा रहा है। भारत के पास फिलहाल रूस से आयातित S-400 वायु रक्षा प्रणाली की तीन रेजिमेंट्स पहले से ऑपरेशनल हैं, और दो और रेजिमेंट्स अगले साल तक आने की उम्मीद है।
लेकिन रक्षा विशेषज्ञ जानते हैं कि केवल S-400 और स्वदेशी आकाश मिसाइल सिस्टम भारत को अभेद्य किला नहीं बना सकते। खतरे का स्वरूप बदल चुका है।
चीन और पाकिस्तान दोनों भारत की तैयारी को बारीकी से देख रहे हैं और वे भी तैयारी कर रहे हैं।
ऑपरेशन सिंदूर की सीख: मल्टी-लेयर सुरक्षा जरूरी
ऑपरेशन सिंदूर में भारत की एयर डिफेंस ने खुद को साबित किया। लेकिन यह भी उजागर हुआ कि ड्रोन हमलों के रूप में नई चुनौतियाँ सामने हैं, जो पाकिस्तान ने तुर्की और चीन से खरीदे ड्रोन के ज़रिए भेजे। सैकड़ों ड्रोन भेजे गए हालांकि सभी को मार गिराया गया। लेकिन सबक साफ़ था —
“एयर डिफेंस को अब बहु-स्तरीय (multi-layered), लगातार सक्रिय और हर जगह मौजूद होना चाहिए।”
QRSAM क्या है और क्यों जरूरी है?
- निर्माता: DRDO (रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन)
- क्षमता: 30 किलोमीटर की सीमा के भीतर लड़ाकू विमान, ड्रोन और हेलीकॉप्टर को इंटरसेप्ट करने की ताकत
- तुलना
- S-400 की रेंज: 400 किमी
- आकाश मिसाइल की रेंज: 100-200 किमी
- QRSAM: छोटी दूरी, लेकिन बेहद तेज़ और सटीक
- उद्देश्य: सीमावर्ती और संवेदनशील इलाकों में त्वरित और क्षेत्रीय वायु सुरक्षा देना
- सबसे अहम बात: पूरी तरह भारतीय तकनीक से बना, कॉम्बैट-रेडी और आत्मनिर्भर भारत की पहचान।
क्या यह पर्याप्त है?
- एक QRSAM रेजिमेंट की लागत: ₹6,000 करोड़
- सेना के 11 रेजिमेंट्स की लागत: ₹66,000 करोड़
- वायुसेना की समान मांग मिलाकर कुल लागत: ₹1.12 लाख करोड़
महँगा है? ज़रूर लेकिन सवाल है..
“भारत के आसमान को 5वीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों, ड्रोन, क्रूज़ मिसाइल या इससे भी बड़े खतरों से पूरी तरह सुरक्षित करने की कीमत क्या हो सकती है?”
अगर पूरी तैनाती होती है, तो भारत की एयर डिफेंस केवल डिटरेंस (भय पैदा करना) नहीं, बल्कि डिनायल (दुश्मन के प्रवेश को असंभव बनाना) की स्थिति में आ जाएगी। यानी कोई भी वस्तु भारतीय वायुसीमा में घुस नहीं पाएगी चाहे वह फाइटर जेट हो या ड्रोन।
सेना की अपील: यह विलासिता नहीं, ज़रूरत है
ऑपरेशन सिंदूर में हमने आसमान की रक्षा की लेकिन सैन्य रणनीति कहती है.."सिर्फ रोकना (holding) काफी नहीं, जीतने (dominating) की क्षमता चाहिए।"
सेना और वायुसेना QRSAM को भविष्य की जंगों से बचाव के लिए जरूरी मानती हैं — खासकर ड्रोन स्वॉर्म्स, सुपरसोनिक जेट्स और लंबी दूरी की मिसाइलों के दौर में।
यदि सरकार बाकी 16 रेजिमेंट्स को भी मंजूरी देती है, तो यह स्पष्ट संदेश होगा कि भारत आने वाले खतरे के लिए पूरी तैयारी कर रहा है। और जब QRSAM भारत के आकाश को घेर लेगा तो परिंदों को भी उड़ने से पहले अनुमति लेनी होगी।
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