इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: विवाह शून्य घोषित होने पर पत्नी को भरण-पोषण नहीं मिलेगा
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम निर्णय में कहा है कि यदि किसी विवाह को अदालत द्वारा शून्य (null and void) घोषित कर दिया गया है, तो वह विवाह शुरुआत से ही अमान्य माना जाएगा और पति पर पत्नी को भरण-पोषण देने का..
लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम निर्णय में कहा है कि यदि किसी विवाह को अदालत द्वारा शून्य (null and void) घोषित कर दिया गया है, तो वह विवाह शुरुआत से ही अमान्य माना जाएगा और पति पर पत्नी को भरण-पोषण देने का कोई दायित्व नहीं रहेगा।
क्या कहा अदालत ने?
न्यायमूर्ति राजीव मिश्रा की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 11 के अंतर्गत जब कोई विवाह शून्य घोषित होता है, तो वह विवाह कानूनन कभी अस्तित्व में आया ही नहीं माना जाता। ऐसे में विवाह के नाम पर किसी भी प्रकार का अधिकार या दायित्व नहीं बनता।
मामले का पूरा घटनाक्रम
- एक दंपती का विवाह फरवरी 2015 में हुआ था।
- कुछ ही समय बाद संबंध बिगड़ गए और पत्नी ने पति पर मारपीट व उत्पीड़न सहित विभिन्न धाराओं में एफआईआर दर्ज करवाई।
- पति ने अग्रिम जमानत के लिए अदालत का रुख किया, जहां यह तथ्य सामने आया कि पत्नी पहले से शादीशुदा थी और उसने यह जानकारी छिपाई थी।
- इसके बाद पति ने परिवार न्यायालय में विवाह को शून्य घोषित करने की अर्जी दी।
- नवंबर 2021 में परिवार अदालत ने विवाह को शून्य घोषित कर दिया। पत्नी ने इसके खिलाफ अपील की, लेकिन बाद में उसे वापस ले लिया।
भरण-पोषण की मांग और विवाद
- इसके बावजूद पत्नी ने घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के अंतर्गत भरण-पोषण की मांग की।
- अगस्त 2022 में गाजियाबाद के सिविल जज ने धारा 23 के तहत पत्नी को ₹10,000 प्रति माह का अंतरिम भरण-पोषण देने का आदेश दिया।
- पति ने इस आदेश के खिलाफ अपील की, लेकिन अपर जिला न्यायाधीश ने भी सिविल जज के आदेश को बरकरार रखा।
- इसके बाद पति ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर की।
हाईकोर्ट का फैसला
- अदालत ने माना कि पत्नी का पूर्व में विवाह होना और उसे न छिपाना हिंदू कानून के अंतर्गत बहुपतित्व (polygamy) की श्रेणी में आता है, जो अवैध है।
- चूंकि विवाह को 2021 में शून्य घोषित किया जा चुका है, अतः विवाह की कोई कानूनी मान्यता नहीं रह जाती।
- इस आधार पर अदालत ने कहा, “चूंकि विवाह को शून्य घोषित कर दिया गया है, यह आदेश विवाह की तारीख से प्रभावी होगा। अतः दोनों के बीच कोई वैध ‘घरेलू संबंध’ नहीं रह जाता और पत्नी भरण-पोषण की हकदार नहीं बनती।”
नतीजा
- सिविल जज द्वारा दिया गया अंतरिम भरण-पोषण आदेश और अपर जिला न्यायाधीश द्वारा की गई अपील की खारिजगी — दोनों रद्द कर दिए गए।
- न्यायालय ने कहा कि “21.11.2021 से दोनों पक्षों के बीच घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 2(f) के अनुसार कोई संबंध नहीं रहा।”
- अंत में, दोनों पक्षों को अपने-अपने खर्च स्वयं वहन करने के लिए कहा गया।
कानूनी महत्व
यह निर्णय भविष्य के ऐसे मामलों के लिए मिसाल बन सकता है जहां विवाह की वैधता को लेकर विवाद हो और उसमें भरण-पोषण की मांग भी हो।
अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि शून्य विवाह (void marriage) की स्थिति में कोई भी पक्ष कानूनन पति-पत्नी नहीं माना जाएगा, और पत्नी को भरण-पोषण का अधिकार नहीं होगा।
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