RSS नेता ने संविधान की प्रस्तावना से 'समाजवादी' और 'पंथनिरपेक्ष' शब्द हटाने की मांग की, आपातकाल पर कांग्रेस से माफ़ी की भी मांग

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के महासचिव दत्तात्रेय होसबले ने गुरुवार को एक कार्यक्रम के दौरान भारत के संविधान की प्रस्तावना से 'समाजवादी' और 'पंथनिरपेक्ष' शब्दों को हटाने की जोरदार मांग ..

RSS नेता ने संविधान की प्रस्तावना से 'समाजवादी' और 'पंथनिरपेक्ष' शब्द हटाने की मांग की, आपातकाल पर कांग्रेस से माफ़ी की भी मांग
27-06-2025 - 09:24 AM

नयी दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के महासचिव दत्तात्रेय होसबले ने गुरुवार को एक कार्यक्रम के दौरान भारत के संविधान की प्रस्तावना से 'समाजवादी' और 'पंथनिरपेक्ष' शब्दों को हटाने की जोरदार मांग की। उन्होंने कहा कि ये शब्द 1975 में लगाए गए आपातकाल के दौरान कांग्रेस सरकार द्वारा जोड़े गए थे, जो भारतीय लोकतंत्र पर एक काला धब्बा था।

 होसबले का आरोप

"आपातकाल के दौरान हजारों लोगों को जेल में डाला गया, प्रताड़ित किया गया, और न्यायपालिका व मीडिया की स्वतंत्रता को दबाया गया।"
"जिन लोगों ने जबरन नसबंदी जैसे अमानवीय कदम उठाए, वे आज संविधान की प्रति लेकर घूम रहे हैं, लेकिन अब तक देश से माफ़ी नहीं मांगी। माफ़ी मांगो।"

उन्होंने कहा कि कांग्रेस को 50 साल पहले लागू किए गए आपातकाल के लिए देश से माफ़ी मांगनी चाहिए, क्योंकि यह उनके पूर्वजों का किया-धरा था।

 क्या है 'समाजवादी' और 'पंथनिरपेक्ष' शब्दों का विवाद?

  • 1976 में 42वां संविधान संशोधन लागू किया गया था, जिसके तहत संविधान की प्रस्तावना मेंसमाजवादी’, ‘पंथनिरपेक्ष’ और ‘अखंडता’ शब्द जोड़े गए थे।
  • इससे पहले भारत को सिर्फ एक "संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य" के रूप में वर्णित किया गया था।
  • संशोधन के बाद यह बदलकर "संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य" कर दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की हटाने की याचिकाएं (नवंबर 2024)

  • नवंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने उन याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिनमें संविधान की प्रस्तावना से 'समाजवादी' और 'पंथनिरपेक्ष' शब्दों को हटाने की मांग की गई थी।
  • ये याचिकाएं पूर्व राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी और अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर की गई थीं।
  • सबसे पहले यह मामला 2020 में बलराम सिंह द्वारा अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन के माध्यम से उठाया गया था।

तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने कहा, "प्रीएम्बल (प्रस्तावना) संविधान का हिस्सा है और संसद को अनुच्छेद 368 के तहत संशोधन करने का अधिकार है। संविधान की अंगीकरण तिथि (26 नवंबर 1949) संशोधन शक्ति को सीमित नहीं करती। इतने वर्षों बाद उस प्रक्रिया को रद्द नहीं किया जा सकता।"

 मामले का सार

मुद्दा

विवरण

 विवादित शब्द

समाजवादी, पंथनिरपेक्ष (42वें संशोधन से जोड़े गए)

 संशोधन वर्ष

1976 (आपातकाल के दौरान)

 SC का फैसला

संशोधन वैध, संसद को अधिकार

 RSS की मांग

शब्द हटाए जाएं, कांग्रेस माफी मांगे

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THE NEWS THIKANA, संपादकीय डेस्क यह द न्यूजठिकाना डॉट कॉम की संपादकीय डेस्क है। डेस्क के संपादकीय सदस्यों का प्रयास रहता है कि अपने पाठकों को निष्पक्षता और निर्भीकता के साथ विभिन्न विषयों के सच्चे, सटीक, विश्वसनीय व सामयिक समाचारों के अलावाआवश्यक उल्लेखनीय विचारों को भी सही समय पर अवगत कराएं।