सर्वोच्च न्यायालय ने निशिकांत दुबे के खिलाफ अवमानना याचिका खारिज की, कहा – "न्यायपालिका इतनी नाजुक नहीं कि ऐसी टिप्पणियों से मुरझा जाए"
सुप्रीम कोर्ट ने बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे द्वारा न्यायपालिका और मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना पर की गई तीखी टिप्पणियों को "गंभीर और गैर-जिम्मेदाराना" बताते हुए उनकी आलोचना की, लेकिन उनके खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने से इनकार कर दिया..
नयी दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे द्वारा न्यायपालिका और मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना पर की गई तीखी टिप्पणियों को "गंभीर और गैर-जिम्मेदाराना" बताते हुए उनकी आलोचना की, लेकिन उनके खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने से इनकार कर दिया।
मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति संजय कुमार की पीठ ने उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें दुबे के हालिया बयानों को लेकर उनके खिलाफ स्वतः संज्ञान लेकर अवमानना कार्यवाही शुरू करने की मांग की गई थी।
याचिका में यह भी मांग की गई थी कि गृह मंत्रालय के माध्यम से भारतीय न्याय संहिता 2023 (BNS) के तहत एफआईआर दर्ज की जाए। साथ ही, सभी मुख्य सचिवों को एक परामर्श जारी करने की मांग की गई थी, ताकि राजनीतिक दलों और उनके नेताओं द्वारा वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 से जुड़ी घृणा भाषणों और भड़काऊ टिप्पणियों पर रोक लगाई जा सके, क्योंकि यह मामला वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।
निशिकांत दुबे, जो वक्फ (संशोधन) विधेयक पर बनी संसद की संयुक्त समिति (JCP) का हिस्सा रहे हैं ने, सुप्रीम कोर्ट में इस अधिनियम को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान न्यायपालिका और CJI की कड़ी आलोचना की थी।
एक इंटरव्यू में दुबे ने कहा था कि “देश में जितने भी गृहयुद्ध हैं, उसके लिए मुख्य न्यायाधीश जिम्मेदार हैं।” साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि “सुप्रीम कोर्ट अपनी सीमाएं लांघ रहा है” और कहा कि अगर हर मामले में सुप्रीम कोर्ट जाना ही पड़ता है, तो “फिर संसद और विधानसभाओं को बंद ही कर देना चाहिए।”
कोर्ट की टिप्पणी
5 मई को दिए गए आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यद्यपि न्यायिक फैसलों की आलोचना का अधिकार सबको है, लेकिन दुबे की टिप्पणियां कोर्ट की गरिमा को ठेस पहुंचाने और न्यायपालिका की साख को गिराने की जानबूझकर की गई कोशिश प्रतीत होती हैं।
हालांकि कोर्ट ने स्वीकार किया कि ये टिप्पणियां अवमानना की श्रेणी में आ सकती हैं, फिर भी न्यायिक संयम और अवमानना के लिए जरूरी उच्च मानक का हवाला देते हुए कार्यवाही शुरू नहीं की गई।
कोर्ट ने टिप्पणी में कहा कि “हम दृढ़ विश्वास रखते हैं कि अदालतें इतनी नाजुक नहीं हैं कि इस प्रकार की हास्यास्पद टिप्पणियों से मुरझा जाएं।” “ऐसी बातों से अदालतों की प्रतिष्ठा जनता की नजरों में नहीं डगमगाती, भले ही यह स्पष्ट है कि जानबूझकर ऐसा करने का प्रयास किया गया है।”
घृणा भाषण पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
कोर्ट ने यह भी कहा कि “घृणा भाषण को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। यह लक्षित समूहों की गरिमा और आत्म-सम्मान को चोट पहुंचाता है, सामाजिक सौहार्द को बिगाड़ता है और एक समतावादी बहुसांस्कृतिक समाज में आवश्यक सहिष्णुता और खुलेपन को नष्ट करता है।”
क्यों इस पीठ ने खुद याचिका पर फैसला किया?
आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया कि आम तौर पर CJI खन्ना और न्यायमूर्ति संजय कुमार की पीठ इस याचिका पर विचार नहीं करती। लेकिन चूंकि वे वक्फ अधिनियम से संबंधित पूर्व मामले की सुनवाई पहले ही कर चुके थे और उन्होंने इस याचिका पर नोटिस जारी करने से इनकार कर दिया था, इसलिए उन्होंने खुद ही इस याचिका को सुनकर निपटा दिया।
What's Your Reaction?