पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा

सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ भाजपा नेता और कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा की उस याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया है, जिसमें उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के एक मामले को पुनर्जीवित करने के कर्नाटक हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई है।

पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा
12-04-2025 - 10:15 AM

नयी दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ भाजपा नेता और कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा की उस याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया है, जिसमें उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के एक मामले को पुनर्जीवित करने के कर्नाटक हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई है।

कर्नाटक हाईकोर्ट ने 5 जनवरी, 2021 को बेंगलुरु निवासी शिकायतकर्ता ए आलम पाशा की याचिका स्वीकार करते हुए उनकी शिकायत को पुनर्जीवित कर दिया था।

पाशा ने येदियुरप्पा, पूर्व उद्योग मंत्री मुरुगेश आर निरानी और कर्नाटक उद्योग मित्रा के पूर्व प्रबंध निदेशक शिवास्वामी केएस पर भ्रष्टाचार और आपराधिक साजिश के आरोप लगाए थे।

हाईकोर्ट ने कहा था कि पहले अभियोजन के लिए पूर्व स्वीकृति न होने के कारण शिकायत रद्द की गई थी, लेकिन जब आरोपी पद से हट चुके हैं, तो एक नई शिकायत दायर करने में कोई बाधा नहीं है।

हालाँकि, कोर्ट ने इस मामले में राज्य सरकार के पूर्व प्रमुख सचिव और सेवानिवृत्त IAS अधिकारी वी. पी. बालिगार के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही की अनुमति नहीं दी थी।

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई और उठे कानूनी सवाल

4 अप्रैल को जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने सुनवाई पूरी करते हुए कई महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्नों को चिन्हित किया है। इनमें मुख्य रूप से यह सवाल शामिल हैं कि क्या जब एक न्यायिक मजिस्ट्रेट धारा 156(3) सीआरपीसी के तहत जांच का आदेश देता है, तो क्या भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PC Act) की धारा 17A के अंतर्गत उपयुक्त सरकारी स्वीकृति की आवश्यकता बनी रहती है?

धारा 156(3) सीआरपीसी के अनुसार, एक न्यायिक मजिस्ट्रेट किसी शिकायत पर पुलिस जांच का आदेश दे सकता है, जिसमें प्रारंभिक जांच या FIR दर्ज करने का निर्देश भी शामिल हो सकता है।

धारा 17A भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अनुसार, कोई पुलिस अधिकारी किसी लोक सेवक द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में की गई सिफारिश या निर्णय से संबंधित अपराध की जांच तब तक नहीं कर सकता जब तक कि उसे पहले उपयुक्त प्राधिकरण से अनुमति न मिल जाए।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा उठाए गए सात कानूनी प्रश्नों में शामिल हैं:

  1. भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A के तहत स्वीकृति देने से पहले सरकार या उपयुक्त प्राधिकरण को किन तथ्यों पर विचार करना होता है?
  2. क्या धारा 17A के तहत विचार किए जाने वाले बिंदु मजिस्ट्रेट द्वारा धारा 156(3) के तहत आदेश देते समय अपनाए जाने वाले मानकों से मूलतः भिन्न हैं?
  3. क्या यह कहा जा सकता है कि धारा 17A के तहत आवश्यक विचार ऐसे हैं जो मजिस्ट्रेट के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं?
  4. क्या मजिस्ट्रेट द्वारा धारा 156(3) के तहत जांच का आदेश देने के बाद धारा 17A के अंतर्गत पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता समाप्त हो जाती है?
  5. क्या मजिस्ट्रेट के आदेश के बावजूद कोई पुलिस अधिकारी तब तक जांच शुरू नहीं कर सकता जब तक उसे धारा 17A के अनुसार स्वीकृति न मिल जाए?
  6. क्या मजिस्ट्रेट बिना पूर्व स्वीकृति के धारा 200 (निजी शिकायतकर्ता की परीक्षा) और 202 (अपराधिक मामले की स्थगन) के तहत कार्यवाही कर सकता है और क्या यह कार्य केवल पूर्व संज्ञान के चरण तक सीमित हैं?
  7. क्या इन सभी स्थितियों में मजिस्ट्रेट का आदेश और सरकारी स्वीकृति एक-दूसरे के पूरक हैं या परस्पर विरोधी?

याचिकाकर्ता से लिखित तर्क और कानूनों की मांग

शीर्ष अदालत ने वरिष्ठ भाजपा नेता के वकील से दो सप्ताह के भीतर लिखित दलीलें दाखिल करने को कहा है, जिनमें उपरोक्त कानूनी प्रश्नों सहित किसी भी अन्य प्रासंगिक मुद्दे पर चर्चा की जानी है।

शिकायत का मूल मामला

पाशा ने अपनी मूल शिकायत में आरोप लगाया था कि येदियुरप्पा और अन्य लोगों ने मिलकर दस्तावेजों की जालसाजी की, ताकि देवनहल्ली इंडस्ट्रियल एरिया में उन्हें आवंटित की गई 26 एकड़ औद्योगिक भूमि के लिए उच्च स्तरीय अनुमोदन समिति की मंजूरी को रद्द कराया जा सके।

यह शिकायत भारतीय दंड संहिता (IPC) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PC Act) की धाराओं के तहत थी और इसकी जांच लोकायुक्त पुलिस द्वारा की गई थी। लेकिन 2013 में कर्नाटक हाईकोर्ट ने धारा 19 PC Act के तहत अनिवार्य स्वीकृति के अभाव में शिकायत को खारिज कर दिया था।

बाद में, जब आरोपी पद से हट गए, तो पाशा ने 2014 में फिर से एक नई शिकायत दायर की और तर्क दिया कि अब पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के ए आर अंतुले मामले में ऐसा कहा गया है।

हालांकि, विशेष न्यायाधीश ने 2016 में यह दूसरी शिकायत भी पूर्व स्वीकृति के अभाव में खारिज कर दी थी।

इसके खिलाफ पाशा ने हाईकोर्ट में चुनौती दी, जहाँ उन्हें आंशिक रूप से अनुकूल फैसला मिला।

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THE NEWS THIKANA, संपादकीय डेस्क यह द न्यूजठिकाना डॉट कॉम की संपादकीय डेस्क है। डेस्क के संपादकीय सदस्यों का प्रयास रहता है कि अपने पाठकों को निष्पक्षता और निर्भीकता के साथ विभिन्न विषयों के सच्चे, सटीक, विश्वसनीय व सामयिक समाचारों के अलावाआवश्यक उल्लेखनीय विचारों को भी सही समय पर अवगत कराएं।