"शरीया अदालत की कानून में कोई मान्यता नहीं": सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि काज़ी की अदालत, दारुल कज़ा (काजियत), शरीया अदालत, चाहे वे किसी भी नाम या शैली से जानी जाएं, कानून में उन्हें कोई मान्यता प्राप्त नहीं है..
नयी दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि काज़ी की अदालत, दारुल कज़ा (काजियत), शरीया अदालत, चाहे वे किसी भी नाम या शैली से जानी जाएं, कानून में उन्हें कोई मान्यता प्राप्त नहीं है। यह फैसला अदालत ने भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत एक मुस्लिम महिला द्वारा दायर भरण-पोषण याचिका को स्वीकार करते हुए सुनाया।
न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की पीठ ने कहा कि ऐसे निकायों द्वारा किया गया कोई भी निर्णय या घोषणा किसी पर बाध्यकारी नहीं है और बलपूर्वक लागू नहीं की जा सकती।
पीठ ने कहा, "ऐसी कोई भी घोषणा या निर्णय केवल तभी कानूनी दृष्टि से मान्य मानी जा सकती है, जब संबंधित पक्ष स्वयं उसे स्वीकार करें या उस पर अमल करें, और वह निर्णय किसी अन्य वैधानिक कानून के विरोध में न हो। यहां तक कि तब भी, ऐसा निर्णय केवल उन्हीं पक्षों के बीच वैध होगा जिन्होंने उसे स्वीकार किया है, किसी तीसरे पक्ष पर वह लागू नहीं होगा।"
यह स्पष्टता अदालत ने "विश्व लोचन मदन बनाम भारत सरकार (2014)" के निर्णय का हवाला देते हुए दी। इस केस में एक मुस्लिम व्यक्ति ने अपनी पत्नी से तलाक पाने के लिए काज़ी की अदालत और दारुल कज़ा (काजियत) में याचिका दायर की थी।
यह पीठ शहजहां द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 3 अगस्त 2018 के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें झांसी के परिवार न्यायालय द्वारा 23 अप्रैल 2010 को धारा 125 CrPC के तहत महिला को भरण-पोषण से वंचित कर दिया गया था और केवल उसके दो बच्चों के लिए ₹2,500 प्रतिमाह मंजूर किए गए थे।
शादी 24 सितंबर 2002 को इस्लामिक रीति-रिवाज से हुई थी और यह दोनों की दूसरी शादी थी। महिला और राज्य सरकार के वकीलों की दलीलें सुनने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने नोट किया कि महिला का आरोप था कि पति ने उससे मोटरसाइकिल और ₹50,000 की मांग की और इस मांग को पूरा न करने पर उस पर क्रूरता की गई। इस पर परिवार न्यायालय ने यह कहते हुए महिला की याचिका खारिज कर दी थी कि "यह दोनों की दूसरी शादी थी इसलिए दहेज मांगने की संभावना नहीं है।"
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "परिवार न्यायालय का यह तर्क विधि की किसी मान्यता प्राप्त कसौटी पर खरा नहीं उतरता और यह केवल अनुमान और कल्पना पर आधारित है। न्यायालय को नैतिकता या आचार पर समाज को उपदेश देने का मंच नहीं बनना चाहिए — यह 'नगरथिनम बनाम राज्य' (2023) के निर्णय में स्पष्ट किया गया है।"
अदालत ने यह भी कहा कि दूसरी शादी अपने आप में दहेज की मांग को नकारने का आधार नहीं हो सकती। इसके साथ ही, अदालत ने परिवार न्यायालय द्वारा 2005 के समझौते को महिला के चरित्र और आचरण के खिलाफ मान लेने की आलोचना की।
पीठ ने कहा, "परिवार न्यायालय ने यह गलत मान लिया कि महिला ने समझौता पत्र में अपनी गलती स्वीकार की थी, जबकि दस्तावेज़ में ऐसा कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है। पति द्वारा 2005 में दायर तलाक की पहली याचिका इस समझौते के आधार पर खारिज की गई थी, जिसमें दोनों ने साथ रहने और एक-दूसरे को शिकायत का मौका न देने की बात की थी। अतः महिला की भरण-पोषण याचिका खारिज करने का आधार प्रथम दृष्टया अस्थिर है।"
भरण-पोषण की तिथि पर भी टिप्पणी
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भरण-पोषण की राशि याचिका दायर करने की तिथि से देय होगी, न कि आदेश की तिथि से।
पीठ ने कहा, "हालांकि CrPC की धारा 125(2) के तहत अदालत को आदेश की तिथि से भरण-पोषण निर्धारित करने का अधिकार है, लेकिन ऐसा तभी उचित होगा जब उसके पीछे तर्कसंगत कारण हों। वरना यह याचिकाकर्ता के लिए अन्यायपूर्ण हो सकता है। धारा 125 एक कल्याणकारी प्रावधान है, जिसका उद्देश्य पत्नी और बच्चों को दरिद्रता और भटकाव से बचाना है।"
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पति बीएसएफ में आरक्षिक (कॉन्स्टेबल) था और याचिका दायर होने (2008-09) के समय उसकी आय ₹15,000 थी। यह स्थिति लगभग 16 साल पुरानी है और इस बीच परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं।
इस आधार पर अदालत ने महिला को ₹4,000 प्रति माह का भरण-पोषण देने का आदेश दिया, जो याचिका दायर करने की तिथि से देय होगा। इसके साथ ही, बच्चों को दिया गया भरण-पोषण भी याचिका की तिथि से लागू होगा। चूंकि बेटी अब बालिग हो चुकी है, इसलिए उसके लिए भरण-पोषण केवल उसकी बालिगता तक ही देय होगा।
अदालत ने पति को निर्देश दिया कि वह चार महीने के भीतर यह राशि (पहले से भुगतान की गई राशि को समायोजित करते हुए) परिवार न्यायालय में जमा करे।
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