चीन और वैश्विक मीडिया ने पीएम मोदी के मालदीव दौरे पर क्या कहा..?
26 जुलाई, 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मालदीव की आज़ादी की 60वीं वर्षगांठ के समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। इस समारोह में उनकी उपस्थिति न केवल भारत और मालदीव में बल्कि पूरी दुनिया में सुर्खियों में..
नयी दिल्ली। 26 जुलाई, 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मालदीव की आज़ादी की 60वीं वर्षगांठ के समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। इस समारोह में उनकी उपस्थिति न केवल भारत और मालदीव में बल्कि पूरी दुनिया में सुर्खियों में रही।
यह दौरा कई कारणों से खास रहा। मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुज्जू ने अपने 2023 के चुनाव अभियान की बुनियाद "इंडिया आउट" नारे पर रखी थी। सत्ता में आने के बाद उन्होंने भारत से दूरी बनाने के कई स्पष्ट संकेत दिए। इसके साथ ही उन्होंने चीन से रिश्ते मज़बूत करने की दिशा में तेज़ी से कदम उठाए। उनके शुरुआती कार्यकाल में ही उन्होंने मालदीव में तैनात भारतीय सैन्यकर्मियों को वापस भेजने का निर्णय लिया, जिसे नई दिल्ली ने बीजिंग की ओर झुकाव के रूप में देखा।
अब वही नेता देश के सबसे बड़े आधिकारिक कार्यक्रम में भारतीय प्रधानमंत्री को मुख्य अतिथि बनाकर आमंत्रित कर रहे हैं। यह प्रतीकात्मकता बहुत कुछ कहती है। यह क्षण विदेशी राजधानियों में बारीकी से देखा गया, खासकर तब जब चीन हिंद महासागर क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
चीनी सरकारी मीडिया की प्रतिक्रिया
बीजिंग का ग्लोबल टाइम्स, जो चीन की सरकारी मीडिया है, ने इस दौरे को लेकर भारतीय मीडिया के रुख की आलोचना करते हुए एक टिप्पणी प्रकाशित की। अखबार ने कहा कि भारतीय मीडिया के कुछ वर्गों ने इस यात्रा को चीन के लिए रणनीतिक झटका और भारत की कूटनीतिक जीत के रूप में प्रस्तुत किया।
ग्लोबल टाइम्स के विश्लेषण के अनुसार, भारतीय मीडिया शून्य-योग (zero-sum) वाली सोच में फंसा हुआ है, यानी भारत की हर उपलब्धि को चीन की हार माना जाता है। इसने त्सिंगहुआ विश्वविद्यालय के नेशनल स्ट्रैटेजी इंस्टीट्यूट के निदेशक कियान फेंग के हवाले से कहा कि मालदीव स्वाभाविक रूप से अपने पड़ोसियों के साथ रिश्तों को प्राथमिकता देता है, लेकिन चीन की बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव (BRI) जैसी वैश्विक परियोजनाओं से भी जुड़ा है। उन्होंने कहा, “ये दोनों रास्ते एक-दूसरे के विरोध में नहीं हैं।”
सिंगापुर और अमेरिका की मीडिया का नजरिया
सिंगापुर के चैनल न्यूज एशिया ने इस यात्रा को “भारत के मोदी ने मालदीव के साथ संबंधों को नया आकार दिया” शीर्षक से कवर किया। रिपोर्ट में बताया गया कि मोदी की यात्रा के दौरान नयी अवसंरचना परियोजनाएं, आर्थिक सहयोग और दोनों देशों के बीच फिर से गर्मजोशी दिखी।
प्रधानमंत्री मोदी ने रक्षा मंत्रालय की एक नई इमारत का उद्घाटन किया और भारत द्वारा वित्तपोषित परियोजनाओं को शुरू किया। साथ ही आर्थिक सहायता की भी घोषणा की गई।
चैनल न्यूज एशिया के अनुसार, नई दिल्ली ने इस दौरे को इस रूप में देखा कि मालदीव पूरी तरह से चीन के प्रभाव में नहीं जाएगा। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि मुज्जू के शुरुआती निर्णयों जैसे भारतीय सैन्यकर्मियों की वापसी को लेकर भारत में चिंता थी।
वॉशिंगटन पोस्ट ने भी इसी सोच को दोहराया। अपनी विस्तृत रिपोर्ट में अखबार ने इसे “रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण” यात्रा बताया और कहा कि यह भारत के उन बड़े प्रयासों का हिस्सा है जिनके तहत वह हिंद महासागर की समुद्री मार्गों में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है। अखबार ने भारत द्वारा घोषित 565 मिलियन डॉलर की ऋण सहायता का उल्लेख किया जिससे विकास परियोजनाएं चलाई जाएंगी। रिपोर्ट में कहा गया कि यह दौरा दोनों देशों के संबंधों को सामान्य करने की दिशा में एक अहम कदम हो सकता है।
ब्रिटेन का विश्लेषण
ब्रिटेन के अखबार द इंडिपेंडेंट ने इस यात्रा को हाल के कूटनीतिक तनावों की पृष्ठभूमि में देखा। रिपोर्ट में लिखा गया कि भारत द्वारा लक्षद्वीप को पर्यटन केंद्र के रूप में प्रचारित करने से मालदीव में कुछ लोगों ने यह आशंका जताई कि भारत अपने पर्यटकों को मालदीव की बजाय लक्षद्वीप भेजने की योजना बना रहा है। इस मुद्दे पर भारत के कुछ सेलिब्रिटीज़ ने मालदीव के बहिष्कार की अपील तक की थी।
रिपोर्ट में यह भी जोड़ा गया कि राष्ट्रपति मुज्जू ने पहले चीन का दौरा किया और फिर भारत आए, जिसे नई दिल्ली ने गंभीरता से लिया। चीन दौरे के बाद मुज्जू ने यह घोषणा की थी कि वह भारत से दवाइयों और खाद्य पदार्थों जैसी ज़रूरी चीज़ों पर निर्भरता कम करेंगे — यह भारत के लिए चिंता का कारण बना।
हालांकि स्थितियाँ तब बदलने लगीं जब मुज्जू ने इस वर्ष की शुरुआत में मोदी के शपथग्रहण समारोह में भाग लिया। उसी दौरे ने दोनों देशों के रिश्तों में गर्मजोशी की भूमिका निभाई, जो अब इस यात्रा के रूप में सामने आई।
भारत-मालदीव संबंधों का नया चरण
पाकिस्तान के अखबार एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने लिखा कि मोदी की यात्रा का समापन स्पष्टता और आपसी भरोसे के साथ हुआ। रिपोर्ट में राष्ट्रपति मुज्जू के उस बयान को उद्धृत किया गया जिसमें उन्होंने इसे दोनों देशों के रिश्तों का “निर्णायक क्षण” बताया। उन्होंने सोशल मीडिया पर इस दौरे के अंत में साझा किया कि भारत और मालदीव के लोगों के बीच रिश्ते और बहु-क्षेत्रीय सहयोग बेहद अहम हैं। इसके जवाब में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत मालदीव की जनता की आकांक्षाओं में उसके साथ खड़ा रहेगा।
जर्मनी की रणनीतिक दृष्टि
जर्मनी के डॉयचे वेले (DW) ने इस यात्रा को रणनीतिक नजरिए से देखा। रिपोर्ट में कहा गया कि मालदीव हिंद महासागर में महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर स्थित है। अपने पर्यटन वाले स्वरूप के बावजूद, रिपोर्ट ने मालदीव को “एक भू-राजनीतिक हॉटस्पॉट” बताया जो 1,192 द्वीपों में फैला है।
DW ने बताया कि किस तरह यह भौगोलिक स्थिति मालदीव को भारत और चीन के बीच बढ़ते टकराव का केंद्र बिंदु बना रही है। रिपोर्ट में कहा गया कि यह क्षेत्र अब केवल पर्यटन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि समुद्री रणनीति और राजनीतिक प्रभाव का युद्धक्षेत्र बन चुका है।
विशेषज्ञों की राय
ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) के आदित्य शिवमूर्ति के अनुसार, मालदीव की विदेश नीति की दिशा शुरू में चीन की ओर झुकी हुई थी। उन्होंने बताया कि 2023 में "इंडिया आउट" का नारा पूरे देश की राजनीति में हावी रहा और भारत की उपस्थिति बहुत कम कर दी गई।
लेकिन 2024 तक स्थिति बदलने लगी। मालदीव की आंतरिक अर्थव्यवस्था बिगड़ने लगी, संसद में समीकरण बदले, और चीन द्वारा किए गए वादे पूरे नहीं हुए। इन घटनाक्रमों ने राष्ट्रपति मुज्जू को अपनी विदेश नीति पर पुनर्विचार करने को मजबूर किया।
शिवमूर्ति ने कहा कि भारत ने इस स्थिति का जवाब परिपक्वता से दिया। भारत ने किसी तरह की टकराव की नीति नहीं अपनाई और कूटनीतिक संपर्क व सहायता पर फोकस किया। इसके बदले में मालदीव की नेतृत्व टीम ने भारत की अहम भूमिका को स्वास्थ्य, विकास और अवसंरचना जैसे क्षेत्रों में फिर से स्वीकार किया।
ORF की रिपोर्ट के मुताबिक, अब दोनों देश अपनी विदेश नीति को आंतरिक राजनीति से अलग रखने की कोशिश कर रहे हैं। जहां मालदीव की डेमोक्रेटिक पार्टी को पारंपरिक रूप से भारत समर्थक माना जाता है, वहीं मौजूदा शासक पार्टी PNC को चीन समर्थक समझा जाता है। लेकिन राष्ट्रपति मुज्जू अब इस ध्रुवीकरण से परे जाकर संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने भारत की चिंताओं को समझा है, और भारत ने भी सहयोग का हाथ बढ़ाया है।
शिवमूर्ति के अनुसार, यह यात्रा केवल प्रतीकात्मक नहीं थी — यह नव-संतुलन (recalibration) की शुरुआत थी। यह यात्रा केवल सुर्खियों के लिए नहीं, बल्कि इस बात का संकेत थी कि इस क्षेत्र में प्रतिद्वंद्वियों की मौजूदगी के बावजूद समझदारी, कूटनीति और साझा हित अब भी संभव हैं।
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