आस्था के बैंगन..!

<p><em>नये साहब किचन गार्डन में वानस्पतिक मुआयना कर रहे थे। एक मातहत भी वहीं दिशा निर्देश ले रहा था। तभी साहब का ध्यान पौधों पर लटकते बैंगनों पर गया। हँसते हुए बोले-&quot; ये बैंगन यहाँ किसने उगा दिए?&quot; मातहत तो क्या पता था कि साहब बैंगनवादी नहीं है ।बोला -&quot;सर पिछले साहब ने उगवा दिए थे।&quot; साहब बोले -&quot;बैंगन भी कोई सब्जी है !ना रूप में,न&nbsp;&nbsp;रंग में। कोई अच्छी सी सब्जी लगवा दो इनके बदले ।मातहत ने कहा -&quot;जी सर, बैंगन तो सब्जी का अंतिम विकल्प है। मैं माली से बोल दूँगा ।&quot;तभी एक और मातहत भी वहाँ आ गया ।पहले मातहत ने कहा-&quot; सर !बैंगन के बदले मटर लगवा दें ?मौसम के पहले ही स्वाद दी जाएगी ।साहब बोले-&quot; हाँ, लंबे-लंबे काले कलूटे बैंगन तो बड़े अटपटे लगते हैं ।&quot;मातहत बोला-&quot; सर, बड़ा बकवास रंग है। फिर स्वाद में कटहल जैसा मजा कहाँ है ?&quot; मातहत को पता था कि साहब उत्तरप्रदेश से आए हैं। कटहल का नाम आते ही साहब की बाँछें खिल गईं।बोले-&quot; कटहल की तो बात ही और है। कटहल और बैंगन का क्या मुकाबला?&quot;</em></p>

  आस्था के बैंगन..!
27-05-2023 - 12:43 PM
21-04-2026 - 12:04 PM

तभी साहब ने पूछ लिया -"बाय द वे ,बैंगन तो पाँचेक रुपए पाव का होगा?" मातहत ने कहा-" सर, इन दिनों सब्जियों के भाव पर न जाइए ।बैंगन जैसी बेकार सब्जी भी दस रुपए पाव है।" तभी साहब को कुछ गोल मटोल बैंगन दिख गए ।दस रुपए पाव के भाव ने रासायनिक खमीर उठा दिया ।बोले-" ये लंबे लंबे बैंगन तो बेकार लगते हैं। मगर पौधे पर लटकते हुए यह गोल-गोल बैंगन अच्छे लग रहे हैं । मातहत साहब के मन की बात ताड़ गया ।दस रुपए पाव ने बैंगन आस्था के संकेत दे दिए थे ।यों साहब लोगों के स्वाद और सौंदर्यबोध में ऊँची कीमतें ही खमीर उठाती हैं । तभी मातहत बोला -"सर ,ये गोल गोल बैंगन वाकई कमाल के हैं। बेहद सुंदर। अगर बैंगन का पौधा सेब के पेड़ जैसा ऊँचा होता तो न्यूटन सेब के बजाय धरती पर टपकते हुए गोल बैंगनों से ही गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत की खोज कर लेता।" साहब तो चमत्कृत हो गए बोले-" क्या बात है ! तुम तो बहुत समझदार मालूम पड़ते हो !इस पोस्ट पर काम करते कितने बरस हो गए ?" मातहत ने कहा -"सर यही कोई सात साल ।"साहब ने पूछा -"फिर तो प्रमोशन ड्यू होगा ?"मातहत बिनबोले ही उठी हुई पलकों के साथ पौधे पर लटकते हुए बैंगन की तरह खड़ा रहा। साहब समझ गए और प्रसन्न होते हुए अंदर चले गए।

यह भी पढ़ें

आँगन और पार-द्वार का व्यंग्य (newsthikana.com)
                तभी बाद में आए मातहत ने कहा -"यार ! तुम भी गजब के हो। अब बैंगन तो बैंगन होता है। लंबा हो या गोल। बैंगनों  के भी कोई  गोल या लंबे सिद्धांत होते हैं ,जो तुम बैंगन को लेकर...!" बीच ही में टोकते हुए पहले मातहत ने कहा-" तू चुप कर यार। बैंगन बुद्धि से ही बैंगनबुद्धि को समझा जा सकता है । दूसरे मातहत ने फिर कहा-" मगर साहब के कहने पर तुमने बैंगन को बेकार बता दिया। मगर लंबे के बजाय गोल बैंगन की तारीफ करने पर तुमने भी गोल बैंगन को समर्थन दे दिया।" पहले मातहत ने फिर कहा-" यार तू इस बात को नहीं समझ पाएगा ।तू अभी कुछ साल बैंगन का अनुभव कर। फिर बैंगनबुद्धि बढ़ जाएगी, तो खुद ब खुद समझ जाएगा।" मगर पहले मातहत को दूसरा लगातार छेदे दे जा रहा था ।बोला-" मगर बेचारे न्यूटन को सेब के बजाय बैंगन पर क्यों टिका। रहा है?" पहले मातहत ने  झिड़कते हुए कहा-" यार तू चुप भी कर। अच्छा बता,  यह बैंगन थोड़े ही प्रमोशन करेगा ।नौकरी देंगे तो साहब और प्रमोशन देंगे तो साहब। अब तू ही बता कि मैं साहब की तरफदारी करुँ या बैंगन की ? बैंगन थोड़े ही प्रोमोशन देगा।"मातहत साथी बोला-" यार बात तो पते की कर रहे हो। मुझे तो यह बैंगनबुद्धि पल्ले ही नहीं पड़ रही थी। पर बड़े भाई यह तो बताओ कि लंबे बैंगन के विरोध और गोल बैंगन के समर्थन का राज क्या है?" पहला मातहत बोला -"यार, एक बार थाली में रखकर देख ले।ये साले लंबे बैंगन घुड़कने का नाम ही न लेंगे। मगर गोल बैंगन झट से घुड़क जाएँगे ।" "ओ. हो. हो.. यह मतलब है थाली के बैंगन का!  भई वाह!" दूसरा मातहत चकित सा था।  पहले मातहत ने कहा -"अभी बैंगन कच्चा है ।अनुभव से समझ जाएगा कि कब कैसे घुड़कना है ?"
            आखिरकार साहब ने गोल बैंगनों को निमंत्रित कर डाला। दस रुपए पाव ने भुर्ते का स्वाद रच दिया था। बोले-" भई ,बैंगन तो वाकई अच्छा है।" मातहत ने कहा-" सर, ये बैंगन फायदा भी कुछ कम नहीं करते।" साहब के बढ़ते बैंगनी आकर्षण को ताड़कर मातहत ने हर दिशा से बैंगन को समझ लिया ।कभी वैद्यजी से पूछ कर, तो कभी बैंगन विशेषज्ञ से रूबरू होकर। तपाक से बोला-" सर ये बैंगन बहुबीजी होते हैं । बीज कभी पेट में नहीं टिकते। कब्जियत तो दूर कर देते हैं ।"साहब ने कहा-" अरे भाई, मुझे तो कॉन्स्टिपेशन की शिकायत है। यह तो पते की बात कह दी ।"मातहत उत्साहित होकर बोला-" और सर इनमें विटामिन ई ज्यादा होता है ।आँखों के लिए बेहद फायदेमंद हैं। बात सुनते ही शाकाहारी अफसर की आँखों में चमक आ गई।बोले- तभी तो बैंगन पंडित लगते हो। पर बार-बार बैंगन खाने से जी उचट जाता होगा?" मातहत ने कहा -"सर, जैसे दिन के सूरज से पराबैंगनी  किरणें फूटती हैं, वैसे ही अधिक बैंगन खाने से भी नुकसान होता है। अति तो हर चीज की बुरी होती है।" मगर बैंगन जैसी सर्वहारा सब्जी के बढ़े हुए मूल्य के कारण साहब में जो अचानक सौंदर्य बोध आया था ,वह कम होने का नाम ही नहीं ले रहा था। बोले -"पर इस की प्रिपेरेशन में वैरायटी तो बनती ही होंगी? ताकि स्वाद बदलता जाए।" मातहत तपाक से बोला-" क्यों नहीं सर, बैंगन के पकौड़े स्वादिष्ट होते हैं। आलू और बैंगन में कोई अवसरवादी गठबंधन नहीं है। नेचुरल कंट्रास्ट है । भरवाँ बैंगन ,रसेदार बैंगन वगैरह वगैरह....।"
         साहब बैंगनवादी हो चले थे । फिर तो  बैंगन किचनगार्डन का  स्थायी स्तंभ बन गया अन्य सब्जियों के साथ। अध्यादेश जारी हो गया - "बैंगन न काटा जाए ।"यों मातहत तो स्थायी बैंगनवादी था। मगर दोनों के बैंगनवाद में अंतर था। साहब का बैंगनवाद किफ़ायती
 स्वाद-सौंदर्यवादी । और  मातहत का थाली ही में घुड़कने का सौंदर्य।

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow

THE NEWS THIKANA, संपादकीय डेस्क यह द न्यूजठिकाना डॉट कॉम की संपादकीय डेस्क है। डेस्क के संपादकीय सदस्यों का प्रयास रहता है कि अपने पाठकों को निष्पक्षता और निर्भीकता के साथ विभिन्न विषयों के सच्चे, सटीक, विश्वसनीय व सामयिक समाचारों के अलावाआवश्यक उल्लेखनीय विचारों को भी सही समय पर अवगत कराएं।