अजमेर दरगाह में अब सिर्फ लाइसेंस प्राप्त खादिमों को ही मिल सकेगी सेवा की अनुमति.. 75 साल बाद शुरू हुई प्रक्रिया, परंपरा पर खतरा बताकर विरोध तेज
ख्वाजा गरीब नवाज़ की विश्वप्रसिद्ध अजमेर दरगाह में अब केवल लाइसेंस प्राप्त खादिम ही ज़ियारत कराने और तीर्थयात्रियों की सहायता करने के पात्र होंगे। केंद्र सरकार के निर्देश पर दरगाह कमेटी ने 75 वर्षों में पहली बार खादिमों के लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया शुरू..
जयपुर। ख्वाजा गरीब नवाज़ की विश्वप्रसिद्ध अजमेर दरगाह में अब केवल लाइसेंस प्राप्त खादिम ही ज़ियारत कराने और तीर्थयात्रियों की सहायता करने के पात्र होंगे। केंद्र सरकार के निर्देश पर दरगाह कमेटी ने 75 वर्षों में पहली बार खादिमों के लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया शुरू की है।
सोमवार को सरकार द्वारा नियुक्त दरगाह नाज़िम मोहम्मद बिलाल खान ने आधिकारिक विज्ञापन जारी करते हुए बताया कि लाइसेंस प्राप्त खादिम बनने के लिए आवेदन 5 जनवरी 2026 तक स्वीकार किए जाएंगे। लेकिन, इस फैसले ने व्यापक विरोध को जन्म दिया है। दरगाह की अंजुमन कमेटी ने इसे परंपरा पर हमला बताते हुए चेतावनी दी है कि 10,000 खादिम परिवार और देश-विदेश के करोड़ों अनुयायी इस कदम के खिलाफ प्रदर्शन करेंगे। दरगाह परिसर में सीसीटीवी लगाने को लेकर भी पुराने मतभेद फिर उभर आए हैं।
नाज़िम ने लाइसेंसिंग प्रणाली शुरू करने से पहले परामर्श करने की कोशिश की थी। 24 और 27 नवंबर को दो बैठकों का आयोजन किया गया, लेकिन खादिम प्रतिनिधि इनमें शामिल नहीं हुए। इसके बाद कमेटी ने एकतरफा तरीके से आवेदन प्रक्रिया शुरू कर दी।
अजमेर शरीफ दरगाह के खादिम सय्यद वंश से आने वाले वंशानुगत संरक्षक हैं, जो सूफी संत मोइनुद्दीन chishti की दरगाह की देखरेख मध्यकाल से करते आए हैं। उनका मुख्य कार्य ज़ियारत के लिए आने वाले श्रद्धालुओं की सहायता और मार्गदर्शन करना है।
यह फैसला 16 दिसंबर से शुरू होने वाले उर्स से ठीक पहले भारी तनाव का कारण बन गया है। प्रमुख खादिम संगठन अंजुमन यादगार-ए-सुफियान ने इस कदम का कड़ा विरोध किया है। इसके सचिव सैयद सरवर चिश्ती ने प्रेस वार्ता में कहा,
“यह हमारा सदियों पुराना पुश्तैनी और धार्मिक अधिकार है। मुग़ल काल से अब तक खादिम बिना किसी लाइसेंस के अपनी सेवाएँ देते आए हैं। दरगाह कमेटी यह अधिकार छीन नहीं सकती।”
उन्होंने बड़े आंदोलन की चेतावनी देते हुए कहा, “अगर कमेटी ने यह प्रक्रिया जारी रखी, तो 10,000 खादिम परिवार दरगाह परिसर में इकट्ठे होंगे। ख्वाजा साहब के करोड़ों मुरीद हमारे साथ खड़े होंगे। यह बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।”
चिश्ती ने कहा कि दरगाह कमेटी लगातार खादिम समुदाय की भावनाएं आहत कर रही है, जिसका उदाहरण सीसीटीवी विवाद है। उनके अनुसार अल्पसंख्यक मामलों का मंत्रालय दरगाह के रखरखाव पर खर्च नहीं करता, जबकि सरकार द्वारा तैनात कर्मचारियों का वेतन दरगाह ही वहन करती है। उन्होंने नाज़िम की नियुक्ति पर भी सवाल उठाए और कमेटी को “निरस्त” तथा उसके आदेशों को “मनमाना” बताया।
उन्होंने कहा, “हम इस निर्णय को रद्द कराने की कोशिश करेंगे। ऐसे एकतरफा आदेश टिक नहीं पाएंगे।”
दरगाह परिसर में इस समय कमेटी और खादिम समुदाय के बीच तनाव चरम पर है और मामला कभी भी बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है। दरगाह में शांति बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बन गई है।
दूसरी ओर, दरगाह नाज़िम मोहम्मद बिलाल खान ने दावा किया कि लाइसेंसिंग प्रक्रिया पूरी तरह कानूनी और प्रशासनिक नियमों के अनुरूप है।
उन्होंने कहा, “यह पूरी तरह केंद्र सरकार के नियमों और अदालती आदेशों के अनुसार किया जा रहा है। किसी के हित को नुकसान नहीं पहुँचाया जा रहा।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह प्रणाली केवल दरगाह से जुड़े सय्यदज़दगान और शेख़ज़दगान समुदाय के खादिमों पर लागू होगी। लाइसेंसिंग ढांचा सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के आदेशों, केंद्र व राज्य सरकारों के निर्देशों, ज़िला स्तर की रिपोर्टों और दरगाह सुरक्षा ऑडिट के आधार पर लागू किया जा रहा है।
दरगाह ख्वाजा साहब अधिनियम, 1955 की धारा 11(एफ़) में खादिमों के कर्तव्यों, पहचान मानकों, प्रक्रिया, सुविधाओं और ज़ायरीन के कल्याण से संबंधित प्रावधान हैं—और यही इस पहल का आधार हैं।
ध्यान देने योग्य है कि 1956 में दरगाह कमेटी के गठन के बाद से अब तक तीन प्रशासक और 37 नाज़िम अपना कार्यकाल पूरा कर चुके हैं, लेकिन अब तक किसी ने भी लाइसेंस प्रणाली लागू नहीं की थी।
What's Your Reaction?