चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से कहा, अदालतें मतदाता सूची संशोधन की समयसीमा तय नहीं कर सकतीं
चुनाव आयोग (ECI) ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि उसे न्यायालय द्वारा यह निर्देशित नहीं किया जा सकता कि पूरे देश में विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) निश्चित अंतराल पर कराए जाएँ। आयोग का कहना है कि ऐसी नीतिगत और प्रशासनिक निर्णय लेने का अधिकार केवल उसके संवैधानिक एवं वैधानिक अधिकार-क्षेत्र में..
नयी दिल्ली। चुनाव आयोग (ECI) ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि उसे न्यायालय द्वारा यह निर्देशित नहीं किया जा सकता कि पूरे देश में विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) निश्चित अंतराल पर कराए जाएँ। आयोग का कहना है कि ऐसी नीतिगत और प्रशासनिक निर्णय लेने का अधिकार केवल उसके संवैधानिक एवं वैधानिक अधिकार-क्षेत्र में आता है।
शुक्रवार देर रात दाखिल हलफ़नामे में आयोग ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 324, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 तथा मतदाता सूची नियम, 1960 के प्रावधानों के तहत मतदाता सूची तैयार करने और संशोधित करने का एकमात्र अधिकार आयोग को है।
हलफ़नामे में कहा गया—“संशोधन नीति पर आयोग को पूर्ण विवेकाधिकार प्राप्त है। यदि अदालत विशेष गहन पुनरीक्षण को नियमित अंतराल पर कराने का आदेश देती है, तो यह आयोग की व्यापक शक्तियों में दख़ल होगा।”
यह जवाब अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की उस जनहित याचिका पर दिया गया है, जिसमें उन्होंने माँग की है कि संसद, विधानसभा और स्थानीय निकाय चुनावों से पहले पूरे देश में विशेष पुनरीक्षण अनिवार्य रूप से कराया जाए, ताकि केवल भारतीय नागरिक ही राजनीतिक फैसले लें और “ग़ैरक़ानूनी विदेशी घुसपैठिए” मतदाता सूची में शामिल न हों।
इस बीच, बिहार में आयोग द्वारा इस वर्ष जून में शुरू किए गए विशेष गहन पुनरीक्षण ने बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। वर्ष के अंत में राज्य में विधानसभा चुनाव होने हैं और विपक्षी इंडिया गठबंधन ने इस प्रक्रिया को मतदाता सूची को प्रभावित करने वाला बताया है। वहीं आयोग का कहना है कि राजनीतिक दलों को “आंदोलन करने के बजाय वास्तविक मतदाताओं की मदद करनी चाहिए।”
याचिका पर 8 सितंबर को सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने आदेश दिया कि बिहार में चल रहे पुनरीक्षण में आधार कार्ड को 12वें वैध दस्तावेज़ के रूप में स्वीकार किया जाए। पहले कई शिकायतें आई थीं कि चुनाव अधिकारी आधार को मान्यता नहीं दे रहे। अदालत ने कहा कि भले ही आधार नागरिकता सिद्ध नहीं करता, परंतु यह पहचान और निवास का वैध प्रमाण है।
ईसीआई ने अपने अधिकार स्पष्ट करते हुए कहा कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21 में मतदाता सूची के संशोधन का प्रावधान है, लेकिन किसी निश्चित अंतराल का उल्लेख नहीं है। “संशोधन कराना बाध्यता है, परंतु समय-सीमा तय नहीं है।” कानून के अनुसार आयोग अपनी विवेकानुसार सारांश या गहन पुनरीक्षण कर सकता है और आवश्यकता पड़ने पर किसी भी निर्वाचन क्षेत्र में विशेष पुनरीक्षण करा सकता है।
आयोग ने यह भी बताया कि 24 जून 2025 को वह पहले ही विशेष गहन पुनरीक्षण का निर्णय ले चुका है, जिसकी योग्यता तिथि 1 जनवरी 2026 तय की गई है। सभी राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को पूर्व-पुनरीक्षण गतिविधियाँ शुरू करने के निर्देश दिए जा चुके हैं और 10 सितंबर 2025 को नई दिल्ली में सम्मेलन बुलाकर तैयारियों की समीक्षा भी की गई।
उपाध्याय की याचिका में कहा गया है कि बड़े पैमाने पर घुसपैठ, जनसांख्यिकीय बदलाव और फर्जी प्रविष्टियों ने कई राज्यों की मतदाता सूचियों को विकृत कर दिया है, विशेषकर सीमावर्ती इलाकों में। उनका दावा है कि स्वतंत्रता के बाद से लगभग 200 ज़िले और 1,500 तहसीलें इस बदलाव से प्रभावित हुई हैं।
याचिका में चेतावनी दी गई, “जनसांख्यिकी ही नियति है और कई जिलों की नियति अब उन लोगों द्वारा तय की जा रही है जो भारतीय नहीं हैं।” इसमें आरोप लगाया गया है कि फर्जी और डुप्लीकेट प्रविष्टियाँ चुनाव नतीजों को प्रभावित कर सकती हैं, ख़ासकर उन क्षेत्रों में जहाँ जीत-हार का अंतर कम होता है।
उन्होंने 1997 में असम में हुए मतदाता सत्यापन अभियान का हवाला दिया, जिसमें “डी-वोटर्स” (संदिग्ध मतदाता) की पहचान कर उनके मामलों को विदेशी न्यायाधिकरणों को भेजा गया था। याचिका में बिहार, पश्चिम बंगाल, झारखंड और अन्य राज्यों में भी इसी तरह की प्रक्रिया लागू करने की माँग की गई है। उपाध्याय का अनुमान है कि बिहार की प्रत्येक विधानसभा सीट में 8,000–10,000 तक अवैध या डुप्लीकेट प्रविष्टियाँ हो सकती हैं।
याचिका में पूरे देश में नियमित अंतराल पर अनिवार्य विशेष गहन पुनरीक्षण, फर्जी दस्तावेज़ बनाने वालों के ख़िलाफ़ कार्रवाई और स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए अन्य निर्देशों की माँग की गई है।
आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि वह पहले से ही मतदाता सूचियों की शुद्धता और अखंडता बनाए रखने की ज़िम्मेदारी निभा रहा है। लेकिन, संशोधन की प्रकृति और आवृत्ति तय करना उसका अधिकार है। हलफ़नामे के अंत में कहा गया, “उपरोक्त कारणों से यह याचिका ख़ारिज की जानी चाहिए।”
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