दिल्ली हाई कोर्ट ने लैंड-फॉर-जॉब्स मामले में लालू यादव की याचिका खारिज करचे हुए कहा, ‘मेरिट रहित’
दिल्ली उच्च न्यायालय ने मंगलवार को लालू प्रसाद यादव की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने कथित “लैंड-फॉर-जॉब्स” मामले में दर्ज केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की एफआईआर को रद्द करने की मांग की थी..
नयी दिल्ली। दिल्ली उच्च न्यायालय ने मंगलवार को लालू प्रसाद यादव की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने कथित “लैंड-फॉर-जॉब्स” मामले में दर्ज केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की एफआईआर को रद्द करने की मांग की थी। अदालत ने याचिका को “मेरिट रहित” (devoid of merit) बताते हुए खारिज कर दिया।
यह आदेश न्यायमूर्ति रविंदर दुदेजा ने पारित किया, जिससे इस मामले की जांच और संबंधित कानूनी कार्यवाही जारी रहने का रास्ता साफ हो गया।
याचिका में 18 मई 2022 को दर्ज एफआईआर, साथ ही 2022, 2023 और 2024 में दाखिल तीन चार्जशीट्स और उन आदेशों को चुनौती दी गई थी, जिनके तहत अदालत ने संज्ञान लिया था। हालांकि, अदालत ने यादव द्वारा उठाए गए सभी आधारों को खारिज करते हुए कहा कि इस चरण पर हस्तक्षेप करने का कोई कानूनी आधार नहीं है।
लालू यादव की ओर से दलील दी गई थी कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A के तहत पूर्व स्वीकृति के बिना पूरी कार्यवाही अवैध है। उनके वकील, वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि कथित घटनाएं 2004 से 2009 के बीच उनके रेल मंत्री कार्यकाल के दौरान हुईं, इसलिए वे उनके आधिकारिक कर्तव्यों का हिस्सा थीं और जांच से पहले मंजूरी लेना अनिवार्य था।
वहीं, सीबीआई की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने इसका विरोध करते हुए कहा कि ऐसी किसी मंजूरी की आवश्यकता नहीं है। उनका कहना था कि नियुक्तियों से जुड़े निर्णय सीधे मंत्री द्वारा नहीं, बल्कि जनरल मैनेजर स्तर पर लिए जाते थे, इसलिए धारा 17A के तहत संरक्षण लागू नहीं होता।
इससे पहले हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनी थीं और लिखित तर्क दाखिल करने के लिए समय दिया था, जिसके बाद यह फैसला सुनाया गया।
यह मामला भारतीय रेल के पश्चिम मध्य जोन (जबलपुर, मध्य प्रदेश) में ग्रुप-डी पदों पर कथित अनियमित नियुक्तियों से जुड़ा है। सीबीआई का आरोप है कि नौकरियां जमीन के बदले दी गईं, जिसमें जमीन के टुकड़े यादव के परिवार के सदस्यों या उनके सहयोगियों के नाम पर ट्रांसफर किए गए।
एफआईआर में लालू यादव के अलावा उनकी पत्नी, दो बेटियां, कुछ अज्ञात सरकारी अधिकारी और निजी व्यक्ति भी आरोपी के रूप में नामित हैं।
अपनी याचिका में यादव ने यह भी कहा था कि एफआईआर कथित घटनाओं के करीब 14 साल बाद दर्ज की गई, जबकि पहले की जांचें बंद कर दी गई थीं और सक्षम अदालत में रिपोर्ट भी दाखिल की जा चुकी थी। उनका तर्क था कि इन क्लोजर रिपोर्ट्स का खुलासा किए बिना मामले को फिर से खोलना प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
याचिका में यह भी दावा किया गया कि जांच राजनीतिक रूप से प्रेरित है और निष्पक्ष जांच के उनके अधिकार का उल्लंघन करती है। साथ ही, उन्होंने दोहराया कि धारा 17A के तहत मंजूरी के अभाव में पूरी कार्यवाही शुरू से ही शून्य (void) है।
हालांकि, इन सभी दलीलों को खारिज करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि याचिका में कोई दम नहीं है और मामले की सुनवाई आगे जारी रहेगी।
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