दिलीप से अल्ला रक्खा रहमान तक: एक जीवन बदल देने वाली घटना, जिसने एआर रहमान के परिवार को इस्लाम अपनाने की राह दिखाई
जीवनी ‘ओरु कनविन इसै’ (Oru Kanavin Isai) के अध्याय 7 में एआर रहमान के जीवन के सबसे निर्णायक दौरों में से एक का वर्णन है..उनकी आस्था की तलाश, आध्यात्मिक परिवर्तन और अंततः उनके पूरे परिवार का इस्लाम धर्म अपनाना। इस अध्याय में रहमान की बहन के चमत्कारी रूप से स्वस्थ होने की घटना का विस्तार से ज़िक्र है, जिसने संगीतकार की आस्था और विश्वास..
जीवनी ‘ओरु कनविन इसै’ (Oru Kanavin Isai) के अध्याय 7 में एआर रहमान के जीवन के सबसे निर्णायक दौरों में से एक का वर्णन है, उनकी आस्था की तलाश, आध्यात्मिक परिवर्तन और अंततः उनके पूरे परिवार का इस्लाम धर्म अपनाना। इस अध्याय में रहमान की बहन के चमत्कारी रूप से स्वस्थ होने की घटना का विस्तार से ज़िक्र है, जिसने संगीतकार की आस्था और विश्वास प्रणाली पर गहरा प्रभाव डाला।
1988: करियर की उड़ान और घर में अचानक संकट
साल था 1988। उस समय दिलीप नाम से पहचाने जाने वाले 21 वर्षीय रहमान अपने शुरुआती करियर के शिखर पर थे। वे एक साथ फ़िल्म संगीत, विज्ञापन जिंगल्स और लोकप्रिय बैंड्स के साथ अंतरराष्ट्रीय दौरों में व्यस्त थे। इसी पेशेवर रफ्तार के बीच घर में एक बड़ा संकट आ खड़ा हुआ—उनकी बहन को अचानक पेट में तेज़ और असहनीय दर्द होने लगा।
परिवार के लिए यह डर और भी गहरा था, क्योंकि इससे पहले वे रहमान के पिता आर.के. शेखर में भी ऐसे ही लक्षण देख चुके थे। पिता की बीमारी अंततः उनकी मृत्यु का कारण बनी थी। बहन के इलाज के लिए कई डॉक्टरों से परामर्श लिया गया, अस्पताल बदले गए—वेल्लोर CMC से लेकर चेन्नई के विजय अस्पताल तक—लेकिन हालत बिगड़ती ही चली गई।
पिता की मौत की यादें और आस्था पर सवाल
उन दिनों को याद करते हुए रहमान ने कहा, “मेरे पिता की पीड़ा की तस्वीरें मुझे लगातार सताती रहती थीं। हमने उन्हें नौ अलग-अलग अस्पतालों में भर्ती कराया था… कई ईसाई पादरी आते थे और उनके लिए प्रार्थना करते थे। कई हिंदू पुजारी भी आते और आशीर्वाद देते थे। लेकिन कुछ भी काम नहीं आया। आखिर में कुछ इस्लामी पीर भी आए… लेकिन पिता हमें हमेशा के लिए छोड़कर चले गए।”
इस नुकसान ने रहमान को गहरे अविश्वास के दौर में धकेल दिया। कम उम्र में पिता की मौत देखकर वे ईश्वर के अस्तित्व पर सवाल उठाने लगे। जब उनकी बहन भी लगभग उन्हीं लक्षणों से जूझने लगीं, तो उनका भ्रम और बढ़ गया। वे सोचने लगे कि क्या यह सब महज़ संयोग है या किसी अज्ञात शक्ति की बड़ी योजना।
‘यह किसी चमत्कार से कम नहीं था’: निर्णायक मोड़
रहमान ने स्वीकार किया कि एक समय ऐसा भी आया जब वे स्वयं को नास्तिक मानने लगे थे।
उन्होंने कहा, “किशोरावस्था के कुछ दिनों में मुझे लगता था कि ईश्वर नाम की कोई चीज़ नहीं है… ईश्वर के अस्तित्व से इनकार करने के बावजूद मेरे भीतर एक खालीपन था।”
वे आगे कहते हैं, “एक दौर में मुझे एहसास हुआ कि दुनिया किसी नियंत्रक शक्ति के बिना चल ही नहीं सकती। तभी मेरी बहन पर वह बीमारी हमला कर बैठी… लेकिन किसी ने मेरी बहन को ठीक कर दिया। यह किसी चमत्कार से कम नहीं था।”
परिवार के अनुसार, वह व्यक्ति थे शेख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी साहब, जिन्हें पीर क़ादरी के नाम से भी जाना जाता है। पीर क़ादरी की दुआ के बाद रहमान की बहन अप्रत्याशित रूप से स्वस्थ हो गईं। इस घटना ने युवा रहमान के मन पर गहरी छाप छोड़ी और उन्होंने इसे ईश्वरीय कृपा के रूप में देखा।
पीर क़ादरी का प्रभाव और धीरे-धीरे आया आध्यात्मिक बदलाव
इस घटना के बाद पीर क़ादरी परिवार के बेहद करीबी मार्गदर्शक और शुभचिंतक बन गए। उसी दौरान रहमान पूरी तरह संगीत में डूबे हुए थे—कर्नाटक और हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत से लेकर पश्चिमी शास्त्रीय संगीत तक का गहन अध्ययन कर रहे थे। बाद में उन्होंने लंदन के ट्रिनिटी कॉलेज से पश्चिमी शास्त्रीय संगीत में स्नातक की डिग्री भी हासिल की।
धर्म उस समय उनकी प्राथमिकता नहीं था, लेकिन वे कभी-कभार पीर क़ादरी के प्रवचन सुनते थे। उनकी एक बात रहमान के मन में बस गई, “ईश्वर एक ही है। उसकी ओर की गई हर प्रार्थना आत्मा को शुद्ध करती है।” इस विचार में उन्हें शांति मिली, हालांकि उस समय उन्होंने धर्म परिवर्तन के बारे में नहीं सोचा था।
बार-बार आने वाला सपना और जीवन बदलने वाला फैसला
लेकिन एक और घटना निर्णायक साबित हुई। रहमान ने याद किया, “मैं मलेशिया में रिकॉर्डिंग के लिए गया हुआ था। एक दिन सपने में एक बुज़ुर्ग व्यक्ति आए। उन्होंने मुझसे इस्लाम अपनाने को कहा।”
शुरुआत में उन्होंने इसे साधारण सपना समझकर नज़रअंदाज़ कर दिया, लेकिन जब वही सपना बार-बार आने लगा तो वे बेचैन हो उठे। उन्होंने अपनी मां से इस बारे में बात की। मां का मानना था कि ईश्वरीय संकेतों को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए।
इसके बाद परिवार ने मस्जिदों में जाना शुरू किया और इमामों से बातचीत की। रहमान के शब्दों में, “कुछ ही दिनों के भीतर हमारे पूरे परिवार ने इस्लाम धर्म अपना लिया।”
दिलीप से एआर रहमान तक
पीर क़ादरी रहमान के पहले इस्लामी गुरु बने और उन्होंने उनके घर में बने पंचथान स्टूडियो के स्थान का चयन भी किया। पीर क़ादरी के निधन के बाद रहमान ने महबूब आलम, मुहम्मद यूसुफ़ भाई और बाद में कुडप्पा मलिक जैसे मार्गदर्शकों के सान्निध्य में अपनी आध्यात्मिक यात्रा जारी रखी।
उस दौर में फ़िल्म इंडस्ट्री की परंपराओं से हटकर रहमान ने हिंदू या ईसाई स्क्रीन नाम रखने का विकल्प नहीं चुना। धर्म परिवर्तन के बाद उनका नाम पहले अब्दुल रहमान रखा गया। बाद में दिग्गज संगीतकार नौशाद ने उन्हें ‘अल्ला रक्खा रहमान’ नाम सुझाया, जिसका अर्थ है—“अल्लाह की कृपा से सुरक्षित”। आगे चलकर वे एआर रहमान के नाम से मशहूर हुए और ‘रोज़ा’ की ऐतिहासिक सफलता के बाद यह नाम पूरे देश में गूंज उठा।
‘नमाज़ मेरे लिए पुनर्जन्म जैसी है’: आस्था पर रहमान
हालांकि इंडस्ट्री में शुरुआत में उनके परिवार के धर्म परिवर्तन को लेकर संदेह और सवाल उठे लेकिन रहमान के काम ने हर आलोचना का जवाब दे दिया। अपनी आस्था पर बात करते हुए उन्होंने एक बार कहा था, “हर नमाज़ मेरे लिए मृत्यु जैसी होती है। ऐसा लगता है जैसे नमाज़ के दौरान मैं मर जाता हूं और फिर नए सिरे से जन्म लेता हूं। मेरा मन और शरीर पूरी तरह तरोताज़ा हो जाते हैं।”
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