सीईसी और सीईओ के खिलाफ शिकायतों पर चुनाव आयोग ने ‘साजिश’ का आरोप लगाया, लेकिन एसआईआर की ‘तमाशे में तब्दील’ होती प्रक्रिया पर गहराया सवाल
भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार और पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) मनोज अग्रवाल के खिलाफ दर्ज कराई गई पुलिस शिकायतों को आयोग के अधिकारियों को डराने-धमकाने का प्रयास करार दिया है। ये शिकायतें विशेष गहन पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन—एसआईआर) प्रक्रिया के तहत सुनवाई नोटिस मिलने के बाद मतदाताओं की मौत के मामलों..
नयी दिल्ली। भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार और पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) मनोज अग्रवाल के खिलाफ दर्ज कराई गई पुलिस शिकायतों को आयोग के अधिकारियों को डराने-धमकाने का प्रयास करार दिया है। ये शिकायतें विशेष गहन पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन—एसआईआर) प्रक्रिया के तहत सुनवाई नोटिस मिलने के बाद मतदाताओं की मौत के मामलों से जुड़ी हैं।
असामान्य रूप से तीखी भाषा का इस्तेमाल करते हुए पश्चिम बंगाल के सीईओ मनोज अग्रवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा, “इन सिलसिलेवार और मनगढ़ंत शिकायतों के पीछे की साजिश को उजागर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी। कानून का शासन और सत्य की जीत होगी।”
इस पोस्ट और उससे जुड़े थ्रेड में, जिसमें गृह मंत्रालय और कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) को टैग किया गया है, सीईओ अग्रवाल ने कहा, “विभिन्न प्रेस विज्ञप्तियों से इस कार्यालय के संज्ञान में आया है कि भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त और पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के खिलाफ पुलिस में दो शिकायतें दर्ज कराई गई हैं।” उन्होंने आगे कहा, “इनमें लगाए गए आरोप पूर्वनियोजित, निराधार और वर्ष 2026 की एसआईआर प्रक्रिया के तहत वैधानिक दायित्वों का निर्वहन कर रहे अधिकारियों को दबाव में लेने का एक भद्दा प्रयास प्रतीत होते हैं।”
मौतों को लेकर दर्ज एफआईआर संबंधी खबरों को दबाव बनाने की रणनीति बताते हुए सीईओ ने कहा, “चुनाव तंत्र को डराकर झुकाने और प्रक्रिया को पटरी से उतारने के लिए बनाई गई ऐसी डराने-धमकाने की रणनीतियां निश्चित रूप से विफल होंगी।”
उन्होंने यह भी कहा, “राज्य में चुनाव तंत्र पूरी दृढ़ता और ईमानदारी के साथ, केवल और पूरी तरह जनहित में काम करने के लिए प्रतिबद्ध है।”
अखबारों की रिपोर्टों में चुनाव आयोग के अधिकारियों के हवाले से कहा गया है कि “सीईसी के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती। कानून इस बारे में स्पष्ट है। अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते समय किसी आपराधिक कृत्य के लिए किसी सीईओ को भी दोषी नहीं ठहराया जा सकता। पुलिस द्वारा दर्ज की गई किसी भी एफआईआर के कानूनी परिणाम होंगे।”
चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े विवादित कानून में, ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति से पहले जोड़ा गया एक प्रावधान, सीईसी या चुनाव आयुक्तों के खिलाफ किसी भी कानूनी कार्रवाई पर रोक लगाता है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 16, पद पर रहते हुए लिए गए निर्णयों के लिए किसी भी कानूनी कार्रवाई से उन्हें प्रतिरक्षा प्रदान करती है।
इस बीच, पश्चिम बंगाल और अन्य उन राज्यों में जहां बहुत कम समय-सीमा में एसआईआर कराई जा रही है, बूथ लेवल अधिकारियों (बीएलओ) में भारी चिंता देखी गई है। इसके चलते स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ा है और मौतों की भी खबरें आई हैं। इसके परिणामस्वरूप ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी करने की समय-सीमाएं आगे बढ़ानी पड़ी हैं।
ये शिकायतें दो बुजुर्ग मतदाताओं के परिवारों द्वारा दर्ज कराई गई हैं, जिनकी सोमवार (29 दिसंबर) को एसआईआर प्रक्रिया के तहत सुनवाई नोटिस मिलने के बाद मौत हो गई थी।
‘द टेलीग्राफ’ की रिपोर्ट के अनुसार, पुरुलिया में कनई माझी ने आरोप लगाया कि उनके पिता दुर्जन माझी (82) को नोटिस मिलने के बाद गहरा मानसिक तनाव हुआ। नोटिस में कहा गया था कि उनका नाम 2002 की भौतिक बंगाल एसआईआर मतदाता सूची में तो है, लेकिन चुनाव आयोग की वेबसाइट पर अपलोड की गई 2002 की एसआईआर सूची में नहीं है। दुर्जन माझी ने सुनवाई से कुछ ही घंटे पहले आत्महत्या कर ली।
हावड़ा में 64 वर्षीय जमात अली शेख के बेटे ने आरोप लगाया कि सीईसी और राज्य के सीईओ ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग करते हुए उनके पिता—जो एक वैध मतदाता थे—को सुनवाई नोटिस जारी किया। उनका कहना है कि इस मानसिक दबाव के कारण ही उनके पिता की मौत हुई।
चुनाव आयोग लगातार नियमों में बदलाव करता रहा है। ताजा उदाहरण 27 दिसंबर को पश्चिम बंगाल में जारी एक अधिसूचना है, जिसमें आयोग ने “तकनीकी गड़बड़ी” का हवाला दिया। इसमें कहा गया कि 2002 की भौतिक एसआईआर सूची में जिन 1.3 लाख मतदाताओं के नाम हैं, लेकिन तकनीकी कारणों से ऑनलाइन डेटाबेस में नहीं दिख रहे, उन्हें सुनवाई के लिए उपस्थित होने की आवश्यकता नहीं होगी।
उत्तर प्रदेश के अयोध्या में यह खबरें सामने आई हैं कि करीब 15,000 साधुओं को अपने माता-पिता के नाम बताने में परेशानी हो सकती है, ताकि आयोग उनकी वंशावली का पता लगा सके। ऐसे में संभावना है कि चुनाव आयोग उन्हें भी कोई रियायत दे।
नियमों और प्रक्रियाओं में बार-बार की गई इन गड़बड़ियों के चलते चुनाव आयोग को बीच रास्ते में ही नियम बदलने पड़े हैं, जिस पर कड़ी निगरानी और आलोचना हो रही है। ‘द हिंदू’ के एक संपादकीय में इस पूरी कवायद को धीरे-धीरे “तमाशे में तब्दील होने” वाला करार दिया गया है।
संपादकीय में कहा गया, “ड्राफ्ट मतदाता सूचियों में कई तरह की असंगतियां और विसंगतियां हैं, जिनमें से अनेक को ‘द हिंदू’ की डेटा-आधारित जांचों ने उजागर किया है। अस्थायी आंकड़ों के अनुसार 6.5 करोड़ से अधिक नामों को हटाया जाना कार्यप्रणाली की खामियों और इस अभ्यास के खराब क्रियान्वयन की ओर इशारा करता है। उत्तर प्रदेश में अस्थायी आंकड़े बताते हैं कि 2.89 करोड़ नाम हटाए गए हैं, जो संभवतः यह समझाता है कि चुनाव आयोग ने ड्राफ्ट सूची के प्रकाशन को 6 जनवरी तक क्यों टाल दिया। तमिलनाडु और गुजरात जैसे अपेक्षाकृत शहरी और शुद्ध प्रवासन वाले राज्यों में क्रमशः 97 लाख और 73.7 लाख मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट सूचियों से हटा दिए गए। बाद में दोनों राज्यों में लाखों नामों को गुस्से में और समझ से परे तरीके से ‘नए जोड़’ के रूप में शामिल किया गया, जो एक और प्रक्रियागत खामी को दर्शाता है और यह संकेत देता है कि गणना चरण को लापरवाही में पूरा किया गया।”
‘द वायर’ ने 30 दिसंबर को दबाव के चलते एक स्कूल प्रधानाध्यापक द्वारा आत्महत्या की खबर दी थी। इसके अलावा, पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा जिले के कई बीएलओ ने बताया कि ड्राफ्ट मतदाता सूची के प्रकाशन और सुनवाइयों की तैयारियों ने उनके स्वास्थ्य पर भारी असर डाला है।
संवैधानिक आचरण समूह (कांस्टीट्यूशनल कंडक्ट ग्रुप) के सदस्यों ने पत्र लिखकर कहा है कि पश्चिम बंगाल में चल रही एसआईआर प्रक्रिया के तहत “स्वतः संज्ञान लेकर, प्रणाली-आधारित तरीके से मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट सूची से हटाए गए, जिससे निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों की वैधानिक भूमिका को दरकिनार कर दिया गया।”
‘द रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ की जांच में सामने आया कि सुप्रीम कोर्ट को यह बताने के आठ दिन बाद कि उसकी डी-डुप्लिकेशन सॉफ्टवेयर प्रणाली दोषपूर्ण है, “चुनाव आयोग ने अचानक 12 राज्यों में इसे फिर से सक्रिय कर दिया। लेकिन इसके सुरक्षित उपयोग के लिए स्थापित प्रोटोकॉल को खत्म कर दिया गया। साथ ही, बिना किसी लिखित प्रोटोकॉल के एक दूसरा, दस्तावेजीकृत न किया गया एल्गोरिद्म भी लागू कर दिया गया।”
ताजा समय-सीमा बदलाव के तहत उत्तर प्रदेश में अब ड्राफ्ट मतदाता सूची 6 जनवरी को ही जारी होगी, जबकि अंतिम सूची इसके बाद आने की संभावना है।
तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी, जो बुधवार (31 दिसंबर) को चुनाव आयोग से मिले पार्टी प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा थे, ने कहा कि आयोग ने उनकी आशंकाओं को दूर नहीं किया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बैठक के दौरान मुख्य निर्वाचन आयुक्त का रवैया “आक्रामक” था।
अभिषेक बनर्जी ने कहा, “जब हमने बात शुरू की तो वह (सीईसी) अपना आपा खोने लगे… मैंने कहा कि आप नामित हैं, मैं निर्वाचित हूं… अगर उनमें हिम्मत है तो वह फुटेज जारी करें।”
What's Your Reaction?