केंद्र सरकार आगामी जुलाई मध्य में शुरू होने वाले संसद के मानसून सत्र में इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश करने जा रही है। सरकारी सूत्रों ने मंगलवार को पुष्टि की कि यह प्रस्ताव इसी सत्र में पेश किया जाएगा।
केंद्र सरकार आगामी जुलाई मध्य में शुरू होने वाले संसद के मानसून सत्र में इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश करने जा रही है..
नयी दिल्ली। केंद्र सरकार आगामी जुलाई मध्य में शुरू होने वाले संसद के मानसून सत्र में इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश करने जा रही है। सरकारी सूत्रों ने मंगलवार को पुष्टि की कि यह प्रस्ताव इसी सत्र में पेश किया जाएगा।
यह कदम 14 मार्च 2025 को दिल्ली स्थित जस्टिस वर्मा के आधिकारिक आवास पर आग लगने के बाद वहां भारी मात्रा में नकदी मिलने और उसके बाद गठित सुप्रीम कोर्ट की जांच समिति की रिपोर्ट के आधार पर उठाया गया है। रिपोर्ट में जस्टिस वर्मा पर लगे आरोपों को गंभीर कदाचार माना गया है।
अब तक की प्रमुख घटनाएं:
- 14 मार्च 2025: दिल्ली में जस्टिस वर्मा के आवास पर आग लगने के बाद दमकलकर्मियों को भंडारगृह से करीब डेढ़ फीट ऊंचाई तक जली हुई नकदी मिली थी।
- 22 मार्च 2025: तत्कालीन भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की, जिसमें जस्टिस शील नागु, जी.एस. संधवालय और अनु शिवरामन शामिल थे।
- 4 मई 2025: समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि जस्टिस वर्मा नकदी के स्रोत का कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सके और यह आचरण महाभियोग के योग्य है।
- रिपोर्ट के बावजूद जस्टिस वर्मा ने इस्तीफा देने से इनकार किया। इसके बाद उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट स्थानांतरित कर दिया गया।
सरकार की तैयारी और राजनीतिक सहमति
केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू सभी राजनीतिक दलों से चर्चा कर रहे हैं ताकि इस अभूतपूर्व प्रस्ताव पर सर्वदलीय सहमति बनाई जा सके। अगर प्रस्ताव पारित होता है, तो यह भारत में किसी हाईकोर्ट जज के खिलाफ पहला महाभियोग होगा।
भारतीय संविधान और 'न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968' के तहत:
- महाभियोग प्रस्ताव लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों या राज्यसभा में 50 सांसदों के समर्थन से पेश किया जा सकता है।
- इसके बाद प्रस्ताव को दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से पारित करना अनिवार्य है।
सूत्रों के मुताबिक, चूंकि सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित समिति पहले ही जांच कर चुकी है, इसलिए अलग से संसदीय समिति गठित करने की जरूरत नहीं है।
प्रतिक्रियाएं और बहस
- इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने इस कदम का स्वागत करते हुए न्यायपालिका में जनता के विश्वास को बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया है।
- यह मामला न्यायिक जवाबदेही और कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के बीच संतुलन पर देशव्यापी बहस छेड़ चुका है।
- उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कहा, “न्यायिक स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं है कि जवाबदेही से छूट मिल जाए। क़ानूनी प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए।”
न्यायमूर्ति वर्मा की प्रतिक्रिया
जस्टिस यशवंत वर्मा ने सभी आरोपों को षड्यंत्र बताते हुए खारिज किया है और अब तक इस्तीफा देने से इनकार किया है। सरकार द्वारा महाभियोग प्रस्ताव लाना इसी जिद और सर्वोच्च न्यायालय की सिफारिशों की अवहेलना के बाद मजबूरी में उठाया गया कदम माना जा रहा है।
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