"भारत कभी तानाशाही के आगे नहीं झुकता: आपातकाल पर अमित शाह का बयान"
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मंगलवार को कहा कि 50 साल पहले लगाए गए आपातकाल ने लोकतंत्र की नींव को हिला कर रख दिया था, लेकिन भारत ने उस काले अध्याय को पार कर लिया क्योंकि यह राष्ट्र कभी तानाशाही के आगे नहीं झुकता..
नयी दिल्ली। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मंगलवार को कहा कि 50 साल पहले लगाए गए आपातकाल ने लोकतंत्र की नींव को हिला कर रख दिया था, लेकिन भारत ने उस काले अध्याय को पार कर लिया क्योंकि यह राष्ट्र कभी तानाशाही के आगे नहीं झुकता।
शाह ने इस मौके पर विपक्ष, खासकर कांग्रेस पार्टी पर तीखा हमला करते हुए कहा कि जो लोग आज संविधान की मर्यादा की बात करते हैं, उन्हें यह जवाब देना चाहिए कि आपातकाल के समय वे संविधान के रक्षक थे या भक्षक।
शाह ने कहा, “उस सुबह को याद कीजिए जब इंदिरा गांधी ने ऑल इंडिया रेडियो पर आपातकाल की घोषणा की थी। क्या संसद से इसकी सलाह ली गई थी? क्या विपक्षी नेताओं और जनता को विश्वास में लिया गया था?... जो लोग आज लोकतंत्र की रक्षा की बातें करते हैं, उन्हें बताना चाहिए कि तब वे संविधान के ‘रक्षक’ थे या ‘भक्षक’।”
शाह यह बात श्यामा प्रसाद मुखर्जी फाउंडेशन द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में बोल रहे थे, जो आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ पर आयोजित किया गया था। उन्होंने कहा कि आपातकाल को एक वाक्य में परिभाषित नहीं किया जा सकता — यह स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी त्रासदी थी।
कांग्रेस पर हमला
शाह ने कहा कि कांग्रेस सरकार ने सत्ता बचाने के लिए आपातकाल लगाया और यह दावा किया गया कि यह देश की रक्षा के लिए किया गया है, लेकिन वास्तविक उद्देश्य सत्ता की रक्षा करना था।
उन्होंने कहा, “25 जून, 1975 की वह रात सबसे लंबी भी थी और सबसे छोटी भी। सबसे लंबी इसलिए क्योंकि लोकतंत्र की सुबह 21 महीने बाद आई, और सबसे छोटी इसलिए क्योंकि जिस संविधान ने दो साल, 11 महीने और 18 दिन में नागरिक अधिकार बनाए थे, उन्हें एक झटके में छीन लिया गया।”
आपातकाल का प्रभाव
25 जून, 1975 को लगाए गए आपातकाल में नागरिक स्वतंत्रताएं छीन ली गईं, विपक्षी नेताओं, छात्रों और आम नागरिकों को बड़े पैमाने पर गिरफ्तार किया गया, जो इंदिरा गांधी के फैसले का विरोध कर रहे थे। मीडिया पर भी कड़े प्रतिबंध लगाए गए और प्रेस की स्वतंत्रता को सीमित कर दिया गया।
शाह ने युवाओं से अपील की कि वे आपातकाल के इतिहास और कारणों को समझें, ताकि यह स्मृति धुंधली न हो जाए। शाह ने कहा, “आज आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ है। जब किसी राष्ट्रीय घटना को 50 साल बीत जाते हैं, तो उसकी स्मृति सामाजिक जीवन में धुंधली होने लगती है। अगर आपातकाल जैसी घटना की स्मृति धुंधली हो गई, जिसने लोकतंत्र की नींव को हिला दिया था, तो यह किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए बड़ा खतरा है।”
जनता पार्टी, आरएसएस और समाजवादियों की भूमिका
जब विपक्षी दल, खासकर कांग्रेस, भाजपा-नीत एनडीए सरकार पर संविधान की अनदेखी का आरोप लगाते हैं, शाह ने याद दिलाया कि जनसंघ, आरएसएस और समाजवादी नेताओं को लोकतंत्र की बहाली के लिए जेल भेजा गया था। शाह मे कहा, “दुनिया ने इस धरती पर लोकतंत्र का जन्म देखा है। भारत लोकतंत्र की जननी है... मैं दावे से कहता हूँ कि उस समय जीवित कोई भी नागरिक आपातकाल को पसंद नहीं करता था, सिवाय तानाशाह और उसके चंद सहयोगियों के.., जिन्होंने इससे फायदा उठाया।”
आपातकाल का फैसला और संविधान में बदलाव
शाह ने यह भी आरोप लगाया कि कैबिनेट मंत्रियों को भी आपातकाल लगाने के फैसले की जानकारी नहीं दी गई थी। “बाद में मंत्रियों ने स्वीकार किया कि कैबिनेट बैठक के एजेंडा की जानकारी तक उन्हें नहीं दी गई थी।”
शाह ने उस समय संविधान में किए गए व्यापक संशोधनों की भी आलोचना की, जिन्हें उन्होंने "मिनी संविधान" कहा।
उन्होंने कहा, “संविधान की प्रस्तावना से लेकर मूल ढांचे तक में बड़े बदलाव किए गए। न्यायपालिका को निर्देशों का पालन करने वाला बना दिया गया, और लोकतांत्रिक अधिकार निलंबित कर दिए गए। यह देश इसे कभी नहीं भूल सकता। इसलिए हमने यह तय किया कि इस दिन को 'संविधान हत्या दिवस' के रूप में मनाया जाए, ताकि लोग याद रखें कि जब लोकतांत्रिक सरकारें तानाशाह बनती हैं, तो देश को कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है।”
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