जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ जांच पूरी, लोकसभा पैनल ने कार्यवाही समाप्त की
लोकसभा द्वारा गठित जांच समिति ने जस्टिस यशवंत वर्मा के आधिकारिक आवास से कथित रूप से बरामद बेहिसाब नकदी के मामले की जांच मंगलवार को औपचारिक रूप से पूरी कर ली। जस्टिस वर्मा के इस महीने की शुरुआत में इस्तीफा देने के बाद संसदीय जांच को समाप्त..
नयी दिल्ली। लोकसभा द्वारा गठित जांच समिति ने जस्टिस यशवंत वर्मा के आधिकारिक आवास से कथित रूप से बरामद बेहिसाब नकदी के मामले की जांच मंगलवार को औपचारिक रूप से पूरी कर ली। जस्टिस वर्मा के इस महीने की शुरुआत में इस्तीफा देने के बाद संसदीय जांच को समाप्त कर दिया गया।
तीन सदस्यीय समिति, जिसकी अध्यक्षता जस्टिस अरविंद कुमार कर रहे थे, ने यह निर्णय लिया कि 9 अप्रैल को जस्टिस वर्मा के इस्तीफे के मद्देनज़र अब आगे किसी कार्यवाही की आवश्यकता नहीं है। समिति अपनी रिपोर्ट लोकसभा को सौंपेगी।
समिति ने केंद्र सरकार के उस जवाब को भी रिकॉर्ड पर लिया, जिसमें जस्टिस वर्मा द्वारा जांच प्रक्रिया पर लगाए गए पक्षपात और प्रक्रियात्मक त्रुटियों के आरोपों को खारिज किया गया है। सरकार ने समिति की कार्यवाही का बचाव किया।
यह मामला जजेस (इन्क्वायरी) एक्ट, 1968 के तहत शुरू हुआ था, जब अगस्त 2025 में लोकसभा में जस्टिस वर्मा को पद से हटाने के लिए प्रस्ताव स्वीकार किया गया था।
समिति में जस्टिस अरविंद कुमार के अलावा श्रीकृष्ण चंद्रशेखर और वरिष्ठ अधिवक्ता बी वी आचार्य शामिल थे। समिति ने बंद कमरे (इन-कैमरा) में कई दौर की सुनवाई की और कम से कम नौ गवाहों से पूछताछ की थी। यह प्रक्रिया बचाव पक्ष की सुनवाई के चरण में पहुंचने ही वाली थी कि जस्टिस वर्मा ने इस्तीफा दे दिया।
जस्टिस वर्मा ने 9 अप्रैल को द्रौपदी मुर्मू को अपना इस्तीफा सौंपा और उसी दिन न्यायमूर्ति सूर्यकांत को भी इसकी जानकारी दी। उन्होंने इस्तीफा “गहरे दुख” के साथ दिया, हालांकि कारण स्पष्ट नहीं किया। यह इस्तीफा उस समय आया जब 10 से 14 अप्रैल के बीच उन्हें अपने बचाव में दलीलें पेश करनी थीं।
इस्तीफे के बाद महाभियोग की प्रक्रिया स्वतः रुक गई, क्योंकि यह केवल पद पर कार्यरत न्यायाधीशों पर ही लागू होती है। हालांकि, अब तक समिति ने औपचारिक रूप से कार्यवाही समाप्त नहीं की थी।
यह मामला मार्च 2025 में सामने आया था, जब दिल्ली में जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास पर आग लगने के बाद कथित रूप से जली हुई बेहिसाब नकदी बरामद हुई थी। उस समय वे दिल्ली उच्च न्यायालय में न्यायाधीश थे।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की आंतरिक जांच में उनके स्पष्टीकरण को संतोषजनक नहीं माना गया और तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने कार्रवाई की सिफारिश की। इसके चलते जुलाई 2025 में संसद के दोनों सदनों में उन्हें हटाने के प्रस्ताव लाए गए थे। हालांकि लोकसभा ने प्रस्ताव स्वीकार कर जांच शुरू की, जबकि राज्यसभा ने प्रक्रियागत खामियों का हवाला देते हुए प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया।
जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस वर्मा की कानूनी चुनौती को खारिज करते हुए जांच जारी रखने की अनुमति दी थी। अदालत ने कहा था कि न्यायाधीशों को मिले संवैधानिक संरक्षण का इस्तेमाल हटाने की प्रक्रिया को “पंगु” बनाने के लिए नहीं किया जा सकता।
जस्टिस वर्मा ने अपने इस्तीफे के दिन ही समिति को 13 पन्नों का पत्र भेजकर जांच को “शुरुआत से ही अन्यायपूर्ण” बताया और कहा कि उन्हें उचित बचाव का अवसर नहीं दिया गया। केंद्र सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए जांच की निष्पक्षता का बचाव किया।
अब कार्यवाही औपचारिक रूप से समाप्त होने के साथ महाभियोग की प्रक्रिया बिना किसी अंतिम निष्कर्ष के खत्म हो गई है, क्योंकि संविधान के तहत पद छोड़ चुके न्यायाधीश के खिलाफ यह प्रक्रिया जारी नहीं रह सकती।
हालांकि, संसदीय प्रक्रिया समाप्त होने का मतलब यह नहीं है कि आपराधिक कार्यवाही नहीं हो सकती। जस्टिस वर्मा के पद छोड़ने के बाद अब उनके खिलाफ अभियोजन के लिए पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं है। यदि पर्याप्त सबूत मिलते हैं, तो जांच एजेंसियां सामान्य आपराधिक कानून के तहत आगे की कार्रवाई कर सकती हैं।
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