नंदीग्राम सहकारी चुनाव नतीजे: क्या बंगाल में बीजेपी की ओर मतदाताओं के रुझान का बड़ा संकेत या ममता की ताकत के सामने एक अपवाद?

नंदीग्राम कोऑपरेटिव एग्रीकल्चरल डेवलपमेंट कमेटी के हालिया चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने सभी नौ सीटें जीत लीं, जबकि सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का खाता भी नहीं खुल सका। यह वही विधानसभा क्षेत्र है, जहां से पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी ने 2021 के विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज ..

नंदीग्राम सहकारी चुनाव नतीजे: क्या बंगाल में बीजेपी की ओर मतदाताओं के रुझान का बड़ा संकेत या ममता की ताकत के सामने एक अपवाद?
07-01-2026 - 11:05 AM

कोलकाता। नंदीग्राम कोऑपरेटिव एग्रीकल्चरल डेवलपमेंट कमेटी के हालिया चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने सभी नौ सीटें जीत लीं, जबकि सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का खाता भी नहीं खुल सका। यह वही विधानसभा क्षेत्र है, जहां से पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी ने 2021 के विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज की थी। आगामी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों से पहले बीजेपी इस परिणाम को एक बड़ी राजनीतिक उपलब्धि के रूप में देख रही है।

2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल में बीजेपी का वोट शेयर 40 प्रतिशत से अधिक रहा, जो टीएमसी से लगभग तीन प्रतिशत कम था। वहीं 2016 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर करीब 16 प्रतिशत था, जो 2021 में बढ़कर 38 प्रतिशत तक पहुंच गया। बीजेपी विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को फर्जी मतदाताओं को हटाने और निष्पक्ष चुनाव की दिशा में एक अवसर के रूप में देख रही है और इसी आधार पर बड़ा उलटफेर करने की उम्मीद जता रही है।

हालांकि, विशेषज्ञों की राय इससे अलग है। रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विश्वनाथ चक्रवर्ती का कहना है कि एसआईआर की प्रक्रिया बीजेपी के बजाय मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और टीएमसी के पक्ष में जा सकती है।

उन्होंने कहा, यह बेहद सूक्ष्म स्तर का परिणाम है और इसे किसी व्यापक राजनीतिक रुझान से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। जहां तक बीजेपी का सवाल है, पार्टी अब भी पश्चिम बंगाल में मजबूत संगठन और चेहरा-आधारित नेतृत्व की कमी से जूझ रही है। एसआईआर की प्रक्रिया में भी बीजेपी बैकफुट पर नजर आती है। एसआईआर के कारण मतदाताओं को जिन विभिन्न समस्याओं का सामना करना पड़ा है, उन मुद्दों को ममता बनर्जी और टीएमसी उठाकर मतदाताओं से सीधे संवाद कर रही हैं। इससे उन्हें सहानुभूति और सकारात्मक माहौल मिल रहा है।”

प्रोफेसर चक्रवर्ती ने आगे कहा, अधिकांश इलाकों में टीएमसी सभी मतदाताओं को सूची में बनाए रखने में सफल रही है, जिनमें मृत मतदाता और घुसपैठिए भी शामिल हैं। एसआईआर के बाद जिस शुद्ध मतदाता सूची की उम्मीद थी, वह सामने नहीं आ रही है। चुनाव आयोग इसमें विफल रहा है। एसआईआर की प्रक्रिया के दौरान जिन नामों को हटाया जाना था, टीएमसी ने उन्हें सूची में बनाए रखने में कामयाबी हासिल की है।”

वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर संगीत रागी का मानना है कि बीजेपी ने भले ही बंगाल में अपना वोट शेयर बढ़ाया है लेकिन कुछ शर्तों के पूरा होने पर ही वह टीएमसी को सत्ता से बाहर कर सकती है।

उन्होंने कहा, एसआईआर के बाद 58 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं और यह सभी फर्जी मतदाता थे, यह एक स्थापित तथ्य है। इसके अलावा करीब 1.25 करोड़ मतदाता संदेहास्पद सूची में हैं, क्योंकि उनके दस्तावेजों से नागरिकता को लेकर संदेह पैदा हुआ है। चुनाव आयोग ऐसे लोगों की पहचान कर रहा है, जिन्हें हम ‘घुसपैठिए’ कहते हैं। पहले बंगाल में स्थानीय प्रशासन की मदद से फॉर्म भरकर, बैकडेट एंट्री कर दस्तावेज तैयार कर दिए जाते थे। अब इन्हीं दस्तावेजों की जांच चुनाव आयोग कर रहा है।”

प्रोफेसर रागी ने यह भी कहा कि अगर भविष्य में 25 से 30 लाख और मतदाताओं के नाम सूची से हटते हैं, तो राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह बदल सकता है।

उन्होंने कहा, अगर 2019 लोकसभा चुनाव, 2024 के आम चुनाव और इनके बीच हुए बंगाल विधानसभा चुनाव—इन तीनों को साथ रखकर देखें, तो एक दिलचस्प तथ्य सामने आता है, जिस पर कम चर्चा होती है। 2019 या 2024 के लोकसभा चुनावों के आधार पर बीजेपी को 143 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त मिली थी। विधानसभा सीटों में बीजेपी धीरे-धीरे अंतर कम कर रही है। बीजेपी और टीएमसी के बीच का फासला उतना बड़ा नहीं है, जितना आम तौर पर माना जाता है।”

प्रोफेसर रागी के अनुसार, बंगाली हिंदू मतदाता बीजेपी की जीत में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
बीजेपी को मुस्लिम वोट नहीं मिलता और पार्टी यह बात खुद भी मानती है। बीजेपी को जो 38 या 41 प्रतिशत वोट मिलते हैं, वे मूलतः हिंदू वोट हैं, जो कुल मतों का करीब 31 प्रतिशत बनते हैं। यानी बंगाल में हिंदू मतदाता ध्रुवीकृत हैं। बांग्लादेश से जुड़े हालात के बाद इस चुनाव में हिंदुओं के बीजेपी के पक्ष में और अधिक ध्रुवीकरण की संभावना है। इसके अलावा मतुआ समुदाय के मतदाता भी अहम हैं, जिनकी नागरिकता प्रक्रिया को तेज करने की कोशिश बीजेपी ने की है,” उन्होंने कहा।

विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि कई हिंदू मतदाता टीएमसी से भयभीत हैं, क्योंकि पार्टी पर बल प्रयोग और ‘मसल पावर’ की राजनीति का आरोप लगता रहा है, जो उसे वामपंथी दौर से विरासत में मिली है। ऐसे में कई मतदाता बीजेपी को एक विकल्प के रूप में देख रहे हैं।

प्रोफेसर रागी ने कहा, अगर चुनाव के दौरान सिर्फ नाम मात्र के लिए अर्धसैनिक बल तैनात किए जाते हैं, तो इसका कोई खास फायदा नहीं होगा। आदर्श स्थिति यह होती कि राज्य सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगाया जाता और उसके बाद निष्पक्ष चुनाव कराए जाते। अन्यथा बंदूक संस्कृति और मसल पावर हावी रहेंगे। हालांकि यह फिलहाल दूर की संभावना है। बीजेपी को चाहिए कि अधिक से अधिक अर्धसैनिक बलों की तैनाती कराए और सभी बूथों की जिम्मेदारी अर्धसैनिक बलों को सौंपी जाए। चुनाव में स्थानीय पुलिस की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए।”

गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में इस साल मार्च के आसपास विधानसभा चुनाव होने की संभावना है। मुकाबला बेहद अहम माना जा रहा है, जहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लगातार चौथी बार सत्ता में वापसी की कोशिश करेंगी, वहीं बीजेपी राज्य में अपना पहला मुख्यमंत्री बनाने के लक्ष्य के साथ मैदान में उतरेगी।

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THE NEWS THIKANA, संपादकीय डेस्क यह द न्यूजठिकाना डॉट कॉम की संपादकीय डेस्क है। डेस्क के संपादकीय सदस्यों का प्रयास रहता है कि अपने पाठकों को निष्पक्षता और निर्भीकता के साथ विभिन्न विषयों के सच्चे, सटीक, विश्वसनीय व सामयिक समाचारों के अलावाआवश्यक उल्लेखनीय विचारों को भी सही समय पर अवगत कराएं।