यूएपीए में जमानत को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मतभेद खुलकर सामने आया, बड़ी बेंच से समाधान की मांग
Supreme Court of India में शुक्रवार को एक असाधारण स्थिति देखने को मिली, जब गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम यानी Unlawful Activities (Prevention) Act के तहत जमानत देने के नियमों को लेकर दो समकक्ष पीठों के बीच मतभेद खुलकर सामने आ..
Supreme Court of India में शुक्रवार को एक असाधारण स्थिति देखने को मिली, जब गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम यानी Unlawful Activities (Prevention) Act के तहत जमानत देने के नियमों को लेकर दो समकक्ष पीठों के बीच मतभेद खुलकर सामने आ गया। एक पीठ ने औपचारिक रूप से मुख्य न्यायाधीश Surya Kant से इस मुद्दे पर बड़ी पीठ गठित करने का अनुरोध किया, ताकि कानून की “अधिकारिक व्याख्या” हो सके।
न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति पी.बी. वराले की पीठ दिल्ली दंगों के आरोपी तस्लीम अहमद और खालिद सैफी की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इस दौरान पीठ ने यह बड़ा सवाल सीजेआई को भेजा कि सुप्रीम कोर्ट के चर्चित तीन-न्यायाधीशों वाले फैसले Union of India बनाम KA Najeeb (2021) को यूएपीए मामलों में लंबे समय तक जेल और मुकदमे में देरी की परिस्थितियों में किस तरह लागू किया जाना चाहिए।
यह घटनाक्रम कुछ दिन पहले आई दूसरी दो-न्यायाधीशों वाली पीठ की टिप्पणी के बाद सामने आया। न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने जनवरी 2026 में आए उस फैसले की आलोचना की थी, जिसे न्यायमूर्ति अरविंद कुमार ने उमर खालिद और शरजील इमाम से जुड़े दिल्ली दंगा साजिश मामले में लिखा था। उस पीठ का मानना था कि फैसले में यूएपीए के तहत जमानत के अधिकार को अत्यधिक सीमित तरीके से समझा गया।
बड़ी संवैधानिक बहस की ओर बढ़ा मामला
शुक्रवार का आदेश अब इस न्यायिक मतभेद को औपचारिक संस्थागत संदर्भ में बदल चुका है। इससे अब बड़ी पीठ के समक्ष यह महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उठेगा कि आतंकवाद विरोधी मामलों में राष्ट्रीय सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
न्यायमूर्ति कुमार की पीठ ने कहा कि समान शक्ति वाली किसी पीठ को दूसरी समकक्ष पीठ के फैसले को “कड़ी टिप्पणियों” के जरिए कमजोर नहीं करना चाहिए। यदि किसी फैसले पर संदेह हो तो उचित तरीका यह है कि मामला बड़ी पीठ को भेजा जाए।
पीठ ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का जवाब दूसरी समान शक्ति वाली पीठ की प्रतिकूल टिप्पणियों से नहीं दिया जाना चाहिए। न्यायिक अनुशासन इससे उच्च संस्थागत प्रक्रिया की मांग करता है।”
अदालत ने आगे कहा, “यदि कोई समकक्ष पीठ किसी पूर्व फैसले को लेकर संदेह रखती है, खासकर तब जब मामला तीन-न्यायाधीशों वाली बाध्यकारी पीठ के फैसले से जुड़ा हो, तो उचित तरीका यह है कि मामला भारत के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जाए ताकि उपयुक्त बड़ी पीठ गठित की जा सके।”
‘KA Najeeb’ फैसले की नई व्याख्या पर बहस
पीठ ने कहा कि KA Najeeb फैसले को ऐसा गणितीय फॉर्मूला नहीं माना जा सकता, जिसके तहत लंबे समय तक जेल में रहने वाले हर आरोपी को स्वतः जमानत मिल जाए।
अदालत के अनुसार, जनवरी 2026 के दिल्ली दंगा मामले के फैसले में KA Najeeb को कमजोर नहीं किया गया था, बल्कि उसे एक “सिद्धांतगत सुरक्षा कवच” की तरह लागू किया गया था, जहां प्रत्येक आरोपी की भूमिका का अलग-अलग मूल्यांकन किया गया।
पीठ ने यह भी उल्लेख किया कि उसी मामले में पांच आरोपियों — जिनमें गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर और शिफा-उर-रहमान शामिल थे — को जमानत दी गई थी, जबकि उमर खालिद और शरजील इमाम को उनकी कथित भूमिकाओं के आधार पर राहत नहीं मिली थी।
अदालत ने दो अतिवादी स्थितियों से किया आगाह
पीठ ने कहा कि अदालतों को दो चरम स्थितियों से बचना होगा..
- पहली, जहां केवल लंबी कैद को ही जमानत का स्वतः आधार मान लिया जाए, चाहे राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्न हों।
- दूसरी, जहां यूएपीए की कठोर शर्तें संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को पूरी तरह दबा दें।
अदालत ने कहा:
“असल सवाल यह है कि जब संसद ने राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों में जमानत पर कड़े प्रतिबंध लगाए हैं, तब अनुच्छेद 21 को किस प्रकार लागू किया जाए।”
तस्लीम अहमद और खालिद सैफी को अंतरिम जमानत
साथ ही अदालत ने दिल्ली दंगा बड़ी साजिश मामले में तस्लीम अहमद और खालिद सैफी को छह महीने की अंतरिम जमानत दे दी। हालांकि उनके ऊपर कुछ शर्तें लगाई गईं, जिनमें मीडिया से बातचीत न करना और मामले पर सार्वजनिक टिप्पणी से बचना शामिल है।
पहले भी उठी थी न्यायिक अनुशासन की बात
इस सप्ताह की शुरुआत में न्यायमूर्ति नागरत्ना और न्यायमूर्ति भुइयां की पीठ ने जम्मू-कश्मीर निवासी सैयद इफ्तिखार अंद्राबी को नार्को-टेरर मामले में जमानत देते हुए कहा था कि “जमानत नियम है और जेल अपवाद”, चाहे मामला यूएपीए के तहत ही क्यों न हो।
उस फैसले में यह भी कहा गया था कि छोटी पीठें KA Najeeb में दिए गए संवैधानिक सुरक्षा सिद्धांतों को धीरे-धीरे कमजोर करती दिखाई दे रही हैं, बिना उससे स्पष्ट असहमति जताए।
अब सुप्रीम कोर्ट में यह मामला एक बड़ी संवैधानिक बहस का रूप ले चुका है, जिसका असर भविष्य में यूएपीए के तहत जमानत मामलों की सुनवाई पर व्यापक रूप से पड़ सकता है।
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