भारत–बांग्लादेश रिश्तों को एक और झटका? 38 हजार करोड़ रुपये का ‘बैराज’ कैसे जल वार्ता को उलझा सकता है..
भारत और बांग्लादेश के बीच फरक्का जल संधि इस साल नवीनीकरण के लिए आने वाली है, लेकिन रिपोर्टों के मुताबिक इस पर बातचीत फिलहाल धीमी और अनिश्चित स्थिति में फंसी हुई है। 1996 में 30 वर्षों की अवधि के लिए हस्ताक्षरित यह समझौता हर साल जनवरी से मई के बीच फरक्का बैराज पर गंगा जल के बंटवारे को ..
भारत और बांग्लादेश के बीच फरक्का जल संधि इस साल नवीनीकरण के लिए आने वाली है, लेकिन रिपोर्टों के मुताबिक इस पर बातचीत फिलहाल धीमी और अनिश्चित स्थिति में फंसी हुई है। 1996 में 30 वर्षों की अवधि के लिए हस्ताक्षरित यह समझौता हर साल जनवरी से मई के बीच फरक्का बैराज पर गंगा जल के बंटवारे को नियंत्रित करता है। हालांकि, दोनों देशों के रिश्तों में आई खटास, जलवायु परिवर्तन का दबाव और घरेलू प्राथमिकताओं की टकराहट के चलते किसी ठोस प्रगति के आसार फिलहाल कम नजर आ रहे हैं।
एक ओर बांग्लादेश लगातार शुष्क मौसम में सुनिश्चित जल प्रवाह की मांग कर रहा है, वहीं भारत अपनी जरूरतों के हिसाब से समझौते में संशोधन चाहता है—खासतौर पर पश्चिम बंगाल की जल आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए। पश्चिम बंगाल सरकार पहले ही चेतावनी दे चुकी है कि जल बंटवारे में किसी भी बदलाव से उत्तर बंगाल की पेयजल और सिंचाई जरूरतों पर असर नहीं पड़ना चाहिए। नतीजतन, स्थिति गतिरोध में फंसी हुई है, जिससे ढाका में बेचैनी और नई दिल्ली में शांत चिंता बढ़ रही है।
इसी पृष्ठभूमि में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है, जो दोनों पड़ोसी देशों के बीच जल कूटनीति की दिशा बदल सकता है।
पद्मा बैराज परियोजना को आगे बढ़ा रहा बांग्लादेश
एनडीटीवी की एक रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेश जल विकास बोर्ड (BWDB) ने लंबे समय से अटकी पद्मा बैराज परियोजना को लागू करने की तैयारियां शुरू कर दी हैं। इस परियोजना की अनुमानित लागत 50,443.64 करोड़ टका बताई जा रही है। पद्मा नदी, भारत से बांग्लादेश में प्रवेश करने के बाद गंगा का ही विस्तार है, जिससे यह परियोजना रणनीतिक और राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील हो जाती है।
बांग्लादेश का तर्क है कि फरक्का बैराज के चालू होने के बाद से देश के दक्षिण-पश्चिमी हिस्सों में जल प्रवाह में भारी गिरावट आई है। BWDB द्वारा साझा किए गए आधिकारिक दस्तावेजों में, जिनका हवाला एनडीटीवी ने दिया है, कहा गया है कि पद्मा बैराज के जरिए मानसून के दौरान अतिरिक्त पानी को संग्रहित किया जा सकेगा और दक्षिण-पश्चिम व उत्तर-पश्चिम क्षेत्रों को साल भर जल आपूर्ति सुनिश्चित की जा सकेगी। रिपोर्टों के मुताबिक, बांग्लादेश की करीब 37 प्रतिशत आबादी पद्मा नदी प्रणाली पर निर्भर है।
प्रस्तावित बैराज, जो फरक्का से लगभग 180 किलोमीटर नीचे कुस्टिया जिले के पांग्शा इलाके में बनने की संभावना है, को किसी सौदेबाजी के हथियार की बजाय एक अनिवार्य आवश्यकता के रूप में पेश किया जा रहा है। मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने फिलहाल इस परियोजना के लिए घरेलू संसाधनों से वित्तपोषण का फैसला किया है, हालांकि भविष्य में विदेशी फंडिंग के विकल्प खुले रखे गए हैं।
राजनीति, बाढ़ और बयानबाज़ी
इस बीच, बांग्लादेश की राजनीति में पानी एक बार फिर बड़ा मुद्दा बन गया है। सिलहट में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के प्रमुख तारिक रहमान ने लंबित नदी विवादों को राष्ट्रीय संप्रभुता से जोड़ दिया।
उन्होंने कहा, “हमने राष्ट्रपति जियाउर रहमान के समय देखा था कि पूरे बांग्लादेश में नहरें बनाई गई थीं। उन नहरों के निर्माण से किसानों को सिंचाई की सुविधा मिली और लोगों की जल समस्याएं भी हल हुईं।”
उन्होंने आगे कहा, “अगर अल्लाह की इच्छा से 12 फरवरी को वोट के जरिए बीएनपी सत्ता में आती है, तो हम फिर से नहर निर्माण कार्यक्रम शुरू करेंगे। हम नहरें बनाएंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि हमारी नदियों में पानी रहे… न दिल्ली, न पिंडी, न कोई और देश—बांग्लादेश सबसे पहले।”
2024 की बाढ़ और भारत की प्रतिक्रिया
साल 2024 में बांग्लादेश के 11 जिलों में आई भीषण बाढ़ के दौरान भी तनाव बढ़ गया था। रिपोर्टों में दावा किया गया था कि फरक्का बैराज के गेट खोले जाने से बाढ़ की स्थिति और गंभीर हो गई। इस पर भारत ने कड़ी प्रतिक्रिया दी थी।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा था, “गलतफहमियां फैलाने के लिए फर्जी वीडियो, अफवाहें और डर का माहौल बनाया गया है। तथ्यों के आधार पर इसका मजबूती से जवाब दिया जाना चाहिए।”
कुल मिलाकर, फरक्का जल संधि के नवीनीकरण की अनिश्चितता और बांग्लादेश की पद्मा बैराज परियोजना ने भारत–बांग्लादेश जल संबंधों को एक बार फिर जटिल मोड़ पर ला खड़ा किया है।
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