अनुच्छेद 143(1) फिर चर्चा में: क्या राष्ट्रपति मुर्मू के सवाल तमिलनाडु विधेयकों पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पलट सकते हैं?
तमिलनाडु सरकार द्वारा राज्यपाल के पास लंबित पड़े विधेयकों और उनकी स्वीकृति से इनकार को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर ऐतिहासिक निर्णय आने के एक महीने बाद, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अनुच्छेद 143(1) के तहत सर्वोच्च न्यायालय से राय मांगी है..
नयी दिल्ली। तमिलनाडु सरकार द्वारा राज्यपाल के पास लंबित पड़े विधेयकों और उनकी स्वीकृति से इनकार को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर ऐतिहासिक निर्णय आने के एक महीने बाद, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अनुच्छेद 143(1) के तहत सर्वोच्च न्यायालय से राय मांगी है।
राष्ट्रपति द्वारा संविधान के महत्वपूर्ण प्रश्नों पर सुप्रीम कोर्ट से सलाह लेना भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में एक दुर्लभ और महत्वपूर्ण क्षण के रूप में देखा जा रहा है।
अनुच्छेद 143(1) क्या है?
अनुच्छेद 143(1) के अनुसार, राष्ट्रपति भारत के सर्वोच्च न्यायालय से कानूनी और सार्वजनिक महत्व के किसी भी प्रश्न पर राय मांग सकते हैं। इस राय के लिए संविधान पीठ (Constitution Bench) का गठन किया जाता है।
राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए संदर्भ की शुरुआत अनुच्छेद 200 और 201 के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए होती है। इसमें कहा गया है कि इन प्रावधानों में राज्यपाल या राष्ट्रपति के विधेयकों पर कार्यवाही के लिए कोई समय-सीमा तय नहीं की गई है।
क्या सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रपति के संदर्भ का उत्तर देने के लिए बाध्य है?
नहीं। सुप्रीम कोर्ट अनिवार्य रूप से राष्ट्रपति को सलाह देने के लिए बाध्य नहीं है।
1964 के विशेष संदर्भ संख्या 1 में तय किया गया था कि “अगर अदालत यह महसूस करती है कि प्रश्न की प्रकृति या अन्य प्रासंगिक परिस्थितियों को देखते हुए राय नहीं दी जानी चाहिए, तो वह मना कर सकती है।”
अब तक केवल एक बार सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति के संदर्भ का उत्तर देने से इनकार किया है — यह था अयोध्या-बाबरी मस्जिद विवाद (विशेष संदर्भ 1, 1993)।
क्या सुप्रीम कोर्ट अपने ही पूर्व निर्णय की पुनरावृत्ति कर सकता है?
नहीं। जो कानूनी मुद्दा पहले ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा न्यायिक क्षमता में सुलझाया जा चुका हो, उसे दोबारा अनुच्छेद 143 के तहत पुनः विचार के लिए नहीं लाया जा सकता।
कावेरी जल विवाद (1992) में यह स्पष्ट किया गया कि अदालत अपनी ही पूर्ववर्ती निर्णयों पर सलाहकार क्षमता में पुनर्विचार नहीं कर सकती।
इसके अलावा, यदि संदर्भित प्रश्न पूरी तरह से राजनीतिक या सामाजिक-आर्थिक हैं और उनका संविधान से प्रत्यक्ष संबंध नहीं है, तो अदालत राय देने से इनकार कर सकती है — जैसा कि इस्माइल फारुकी मामला (1995) में हुआ था।
राष्ट्रपति मुर्मू ने क्या सवाल उठाए हैं?
राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट को पत्र भेजकर निम्नलिखित संवैधानिक प्रश्नों पर राय मांगी है:
- क्या राज्यपाल, अनुच्छेद 200 के तहत विधेयक प्रस्तुत होने पर मंत्रिपरिषद की सलाह मानने को बाध्य हैं?
- क्या राज्यपाल द्वारा इस प्रक्रिया में उपयोग की गई विवेकाधीन शक्ति न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है?
राष्ट्रपति ने यह भी पूछा कि जब संविधान में कोई समय-सीमा या प्रक्रिया निर्धारित नहीं है, तो क्या न्यायालय इनकी व्याख्या करके समय-सीमा लागू कर सकता है?
राष्ट्रपति ने अनुच्छेद 361 का हवाला भी दिया, जो राष्ट्रपति और राज्यपाल को उनके पद पर लिए गए निर्णयों के लिए न्यायिक जांच से प्रतिरक्षा प्रदान करता है।
तमिलनाडु मामला क्या है?
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ (न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन) ने अनुच्छेद 142 के तहत विशेष अधिकारों का प्रयोग करते हुए तमिलनाडु सरकार और राज्यपाल आरएन रवि के बीच चल रहे गतिरोध में हस्तक्षेप किया था।
- राज्यपाल ने 10 विधेयकों को मंजूरी देने से इनकार किया था।
- अदालत ने इसे "गैरकानूनी और मनमाना" बताया।
- पीठ ने राज्यपाल द्वारा उपयोग किए गए "पॉकेट वीटो" की भी आलोचना की।
इस घटना ने कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच की सीमाओं को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं।
राजनीतिक प्रतिक्रिया
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ने गैर-भाजपा शासित आठ राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर राष्ट्रपति द्वारा सुप्रीम कोर्ट से मांगी गई राय के विरोध में एकजुट होने की अपील की है।
उन्होंने पूछा, "क्या भाजपा अपने राज्यपालों के अड़चनों को वैधता देना चाहती है? क्या केंद्र सरकार गैर-भाजपा राज्यों की विधायिकाओं को निष्क्रिय करना चाहती है?"
राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 143(1) का प्रयोग कर सुप्रीम कोर्ट से राय मांगना न केवल एक महत्वपूर्ण संवैधानिक घटना है, बल्कि यह भारत में संविधानिक शक्तियों के संतुलन पर भी गहन विचार का अवसर है।
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