भाजपा स्वतंत्र, नियुक्तियों में आरएसएस की कोई भूमिका नहीं: मोहन भागवत
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने गुरुवार को स्पष्ट किया कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) एक स्वतंत्र संगठन है और पार्टी अध्यक्ष जैसे पदों की नियुक्ति में संघ की कोई भूमिका नहीं होती। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने कभी यह सुझाव नहीं दिया कि नेता या जनप्रतिनिधि 75 वर्ष की उम्र में सेवानिवृत्त..
नयी दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने गुरुवार को स्पष्ट किया कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) एक स्वतंत्र संगठन है और पार्टी अध्यक्ष जैसे पदों की नियुक्ति में संघ की कोई भूमिका नहीं होती। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने कभी यह सुझाव नहीं दिया कि नेता या जनप्रतिनिधि 75 वर्ष की उम्र में सेवानिवृत्त हों।
भागवत ने यह टिप्पणी आरएसएस के तीन दिवसीय जनसंपर्क कार्यक्रम के अंतिम दिन पूछे गए सवालों के जवाब में दी। इस दौरान उन्होंने संघ के अतीत, भविष्य और समसामयिक मुद्दों पर संगठन की स्थिति स्पष्ट की। उनके जवाबों से भाजपा और उसकी वैचारिक मातृसंस्था आरएसएस के संबंधों पर भी रोशनी पड़ी।
सरकार की नीतियों में कोई हस्तक्षेप नहीं
भागवत ने दोहराया कि भाजपा और केंद्र सरकार घरेलू और अंतरराष्ट्रीय नीतियों में पूरी तरह स्वतंत्र हैं। उन्होंने कहा, “हम सरकार को यह नहीं बताते कि ट्रंप से कैसे निपटना है; वे जानते हैं क्या करना है और हम उसका समर्थन करेंगे। हमें राष्ट्र के लिए जीना-मरना सीखना होगा, उद्यमिता को बढ़ावा देकर आत्मनिर्भर और विकसित भारत बनाना होगा।”
सेवानिवृत्ति पर दिए गए बयान की सफाई
भागवत का यह स्पष्टीकरण अहम है क्योंकि जुलाई में दिए गए उनके बयान को इस रूप में देखा गया था कि वे या फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (दोनों सितंबर में 75 वर्ष के होंगे) सेवानिवृत्त होने का संकेत दे रहे हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया, “मैंने कभी नहीं कहा कि मैं रिटायर हो जाऊंगा या किसी को रिटायर होना चाहिए। मेरा बयान ग़लत समझा गया। मैं तो केवल मोरोपंत पिंगले का अनुभव बता रहा था।”
उन्होंने बताया कि जब पिंगले 75 वर्ष के हुए तो उन्हें सम्मानस्वरूप शाल ओढ़ाई गई और पिंगले ने कहा कि यह प्रतीकात्मक संदेश था कि अब उन्हें किनारे हो जाना चाहिए।
भाजपा और अन्य संगठनों से संबंध
भागवत ने कहा कि न केवल भाजपा, बल्कि संघ अपने किसी भी सहयोगी संगठन या शाखा पर निर्णय थोपता नहीं है। उन्होंने कहा, “हम आचार, विचार और संस्कार पर चर्चा करते हैं, लेकिन किसी पर अपने विचार थोपते नहीं। यह मानना गलत है कि हम सब तय करते हैं। मैं 50 साल से शाखा चला रहा हूँ, वे राज्य चला रहे हैं, वे अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं। हम सुझाव दे सकते हैं, पर निर्णय उनका होता है।”
भाजपा अध्यक्ष की नियुक्ति में हो रही देरी का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा, “अगर हमने तय किया होता तो इतना समय लगता क्या?…वे तय करें, हमें कोई लेना-देना नहीं है।”
उन्होंने कहा कि आरएसएस और भाजपा या अन्य सहयोगी संगठनों के बीच मतभेद (मतभेद) हो सकते हैं, लेकिन मनभेद नहीं हैं।
“हर सरकार के साथ हमारा तालमेल अच्छा है। व्यवस्था में आंतरिक विरोधाभास हो सकते हैं, लेकिन झगड़ा कहीं नहीं है। श्रमिक संगठनों और MSME संगठनों के बीच सरकार से टकराव स्वाभाविक है, क्योंकि उनके विचार अलग हो सकते हैं। ये समाधान खोजने के तरीके हैं।”
स्वच्छ राजनीति का समर्थन
भागवत ने साफ राजनीति का समर्थन करते हुए केंद्र सरकार के उस प्रस्तावित विधेयक का स्वागत किया, जिसके तहत प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री जैसे निर्वाचित प्रतिनिधियों को गंभीर अपराध में 30 दिन तक जमानत न मिलने पर पद से हटाया जा सकता है।
उन्होंने कहा, “राजनीति स्वच्छ होनी चाहिए। संसद निर्णय करेगी, लेकिन परिणाम ऐसा होना चाहिए कि जनता को विश्वास रहे कि हमारा नेतृत्व ईमानदार और स्वच्छ है।”
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