सबरीमाला सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी, मंदिरों में बहिष्कार हिंदू धर्म के लिए ठीक नहीं
Supreme Court of India ने सबरीमाला मामले की सुनवाई के दौरान गुरुवार को कहा कि मंदिरों में अन्य वर्गों या संप्रदायों को प्रवेश से बाहर रखना समाज को बांट सकता है और इससे हिंदू धर्म पर नकारात्मक असर पड़ सकता..
Supreme Court of India ने सबरीमाला मामले की सुनवाई के दौरान गुरुवार को कहा कि मंदिरों में अन्य वर्गों या संप्रदायों को प्रवेश से बाहर रखना समाज को बांट सकता है और इससे हिंदू धर्म पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
नौ-न्यायाधीशों की पीठ के सामने सुनवाई के तीसरे दिन न्यायमूर्ति B V Nagarathna ने स्पष्ट किया कि वह सीधे तौर पर Sabarimala Temple विवाद पर टिप्पणी नहीं कर रहीं लेकिन सिद्धांत रूप में कहा, “अगर आप कहते हैं कि केवल मेरा ही वर्ग मंदिर में आए और अन्य कोई नहीं, तो यह हिंदू धर्म के लिए अच्छा नहीं है।”
संविधान के अनुच्छेदों पर बहस
वरिष्ठ अधिवक्ता C S Vaidyanathan, जो केरल के धार्मिक संगठनों और Nair Service Society की ओर से पेश हुए, ने दलील दी कि..
- संविधान का अनुच्छेद 26(b) धार्मिक संप्रदायों को अपने मामलों का प्रबंधन करने का अधिकार देता है
- यह अधिकार अनुच्छेद 25(2)(b) से ऊपर होना चाहिए
अनुच्छेद 25(2)(b) राज्य को धार्मिक सुधार के लिए कानून बनाने और सभी हिंदुओं के लिए सार्वजनिक धार्मिक संस्थानों को खोलने की अनुमति देता है।
कोर्ट की चिंता: समाज में विभाजन
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि यदि मंदिरों में केवल एक खास समुदाय को ही प्रवेश दिया जाएगा, तो इससे समाज में विभाजन होगा।
पीठ के एक अन्य न्यायाधीश Aravind Kumar ने भी कहा, “हम समाज को बांट देंगे, धर्म को नुकसान नहीं होना चाहिए।”
राज्य की भूमिका पर सवाल
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि..
- राज्य अनुच्छेद 25(2)(b) के तहत हस्तक्षेप कर सकता है
- यह प्रावधान ऐतिहासिक संदर्भ में समझा जाना चाहिए
वहीं न्यायमूर्ति Joymalya Bagchi ने कहा कि अनुच्छेद 25 को अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता के उन्मूलन) के साथ पढ़ा जाना चाहिए।
CJI की टिप्पणी
मुख्य न्यायाधीश Surya Kant ने कहा कि..
- यह तर्क संविधान की भाषा के विपरीत हो सकता है
- अनुच्छेद 26 भी “नैतिकता” के अधीन है, जिसमें अनुच्छेद 17 का सिद्धांत शामिल है
निजी बनाम सार्वजनिक मंदिर
बहस के दौरान वकील ने यह भी कहा कि कुछ निजी मंदिर और पारिवारिक पूजा स्थल होते हैं, जहां केवल परिवार के सदस्य ही जाते हैं। इस पर न्यायमूर्ति नागरत्ना ने स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणी ऐसे निजी मंदिरों के लिए नहीं थी।
आगे की सुनवाई
इस महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दे पर सुनवाई 15 अप्रैल को फिर से शुरू होगी। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां यह संकेत देती हैं कि धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक समानता के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि समाज की एकता और सभी के लिए समान पहुंच हिंदू धर्म के व्यापक हित में है।
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