बिहार में ‘महागठबंधन’ में दरार: चुनाव से पहले कांग्रेस-आरजेडी में बढ़ी तनातनी

बिहार की राजनीति में कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के बीच तनाव अब खुलकर सामने आ गया है। दोनों दलों के बीच यह खींचतान पहले से ही तय मानी जा रही थी क्योंकि गठबंधन में ताकत का असंतुलन लंबे समय से मौजूद है। नई पीढ़ी के नेताओं के बीच अब पुरानी व्यवस्था से असंतोष बढ़ा..

बिहार में ‘महागठबंधन’ में दरार: चुनाव से पहले कांग्रेस-आरजेडी में बढ़ी तनातनी
30-10-2025 - 10:44 AM

पटना। बिहार की राजनीति में कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के बीच तनाव अब खुलकर सामने आ गया है। दोनों दलों के बीच यह खींचतान पहले से ही तय मानी जा रही थी क्योंकि गठबंधन में ताकत का असंतुलन लंबे समय से मौजूद है। नई पीढ़ी के नेताओं के बीच अब पुरानी व्यवस्था से असंतोष बढ़ा है। आरजेडी प्रमुख तेजस्वी यादव अपनी पारंपरिक मुस्लिम-यादव वोटबैंक से आगे बढ़ना चाहते हैं, जबकि कांग्रेस नेता राहुल गांधी अब क्षेत्रीय सहयोगी के ‘छोटे भाई’ की भूमिका में नहीं रहना चाहते। नतीजा यह हुआ है कि चुनावी मौसम में गठबंधन की एकता में दरार पड़ गई है।

राहुल गांधी और तेजस्वी यादव के बीच वैसी निजी समझ नहीं है जैसी सोनिया गांधी और लालू प्रसाद यादव के बीच थी। दोनों ‘वंशज’ नेताओं में कहीं न कहीं राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता भी दिखती है। असली टकराव, दरअसल, हितों का है — आरजेडी के टिकट वितरण से यह साफ है कि तेजस्वी यादव अब ओबीसी वर्ग के साथ-साथ सवर्णों और दलितों को भी साधने की कोशिश में हैं, जो कांग्रेस के पारंपरिक वोटर रहे हैं।

ऊपरी तौर पर यह टकराव टिकट बंटवारे और प्रचार रणनीति में दिखा। कांग्रेस चाहती थी कि राष्ट्रीय स्तर पर राहुल गांधी की छवि को गठबंधन का चेहरा बनाया जाए, लेकिन आरजेडी खेमे को यह मंजूर नहीं था। यही नहीं, तेजस्वी को ‘महागठबंधन’ का सीएम चेहरा घोषित करने में भी देरी हुई। जब आरजेडी ने कांग्रेस को 61 सीटों से ज्यादा देने से इनकार किया, तो मतभेद खुलकर सामने आ गए।

तेजस्वी का तर्क था कि 2020 के चुनाव में कांग्रेस की कमजोर प्रदर्शन ने गठबंधन की हार में बड़ी भूमिका निभाई थी। ऊपर से कांग्रेस अब न केंद्र में सत्तारूढ़ है, न किसी राज्य में मजबूत विपक्ष के रूप में है और बीजेपी से सीधी लड़ाई लड़ने में भी असफल रही है।

कांग्रेस का हाल यह है कि उसकी पुनर्जीवन रणनीति सिर्फ नारों, यात्राओं और तीखे बयानों तक सीमित है। कार्यकर्ता स्लोगन पर जुटते हैं, जबकि राहुल गांधी हज़ारों किलोमीटर की ‘यात्राएं’ निकालते हैं, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात। उनकी यात्राओं से व्यक्तिगत छवि भले सुधरी हो, पर उन्होंने कोई ठोस सामाजिक आंदोलन नहीं खड़ा किया।

कांग्रेस का नया नारा “वोट चोर, गद्दी छोड़” भी ज्यादा असर नहीं डाल रहा है — यह 2019 के “चौकीदार चोर है” नारे की याद दिलाता है, जिसने उल्टा बीजेपी को फायदा पहुंचाया था। इसके मुकाबले आरजेडी का नारा “बिहार के युवाओं की जय है, इस बार तेजस्वी तय है” युवाओं में लोकप्रिय हो रहा है।

गठबंधन के भीतर तनाव तब और बढ़ गया जब आरजेडी ने राहुल गांधी के करीबी और बिहार प्रभारी कृष्ण अल्लावरु पर आपसी समन्वय बिगाड़ने का आरोप लगाया। हालात इतने बिगड़े कि सीनियर कांग्रेस नेता अशोक गहलोत को दखल देना पड़ा। लेकिन नतीजा यह हुआ कि कई सीटों पर दोनों दलों के बीच ‘फ्रेंडली फाइट’ की नौबत आ गई।

इसी बीच झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने भी बिहार चुनाव से किनारा कर लिया और कांग्रेस-आरजेडी पर विश्वासघात का आरोप लगाया। यह कदम झारखंड में गठबंधन के भविष्य पर भी सवाल खड़ा करता है, जहां फिलहाल झामुमो सत्ता में है और कांग्रेस उसकी सहयोगी है।

कुल मिलाकर, कांग्रेस एक गहरे संकट में है। वह आरजेडी से अलग होकर मजबूत नहीं हो सकती, लेकिन आरजेडी के साथ रहकर स्वतंत्र पहचान भी नहीं बना सकती। वहीं, झारखंड में वह झामुमो की जूनियर पार्टनर बनी हुई है।

स्पष्ट है कि कांग्रेस को अपनी चुनावी रणनीति पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। यात्राएं, नारेबाजी और तात्कालिक गठबंधन अब कारगर नहीं हैं। अगर महागठबंधन की जीत होती भी है, तो फायदा आरजेडी को होगा, जबकि कांग्रेस एक ‘निर्भर सहयोगी’ बनकर रह जाएगी।

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THE NEWS THIKANA, संपादकीय डेस्क यह द न्यूजठिकाना डॉट कॉम की संपादकीय डेस्क है। डेस्क के संपादकीय सदस्यों का प्रयास रहता है कि अपने पाठकों को निष्पक्षता और निर्भीकता के साथ विभिन्न विषयों के सच्चे, सटीक, विश्वसनीय व सामयिक समाचारों के अलावाआवश्यक उल्लेखनीय विचारों को भी सही समय पर अवगत कराएं।