तेज, छोटे और घातक: ईरान का ‘मच्छर बेड़ा’ हॉर्मुज़ में अमेरिकी नौसेना के लिए चुनौती
, Strait of Hormuz में अमेरिकी नाकेबंदी के बीच ईरान छोटे और तेज़ हमलावर नौकाओं के बेड़े जिन्हें “मच्छर बोट” कहा जाता है के जरिए अपनी ताकत दिखा रहा है और समुद्री यातायात को खतरे में डाल रहा है। हालिया अमेरिकी और इजरायली हमलों में ईरान के बड़े युद्धपोतों को भारी नुकसान हुआ है, लेकिन..
The New York Times की एक रिपोर्ट के अनुसार, Strait of Hormuz में अमेरिकी नाकेबंदी के बीच ईरान छोटे और तेज़ हमलावर नौकाओं के बेड़े जिन्हें “मच्छर बोट” कहा जाता है के जरिए अपनी ताकत दिखा रहा है और समुद्री यातायात को खतरे में डाल रहा है। हालिया अमेरिकी और इजरायली हमलों में ईरान के बड़े युद्धपोतों को भारी नुकसान हुआ है लेकिन इसके बावजूद यह छोटी नौकाओं का बेड़ा सक्रिय बना हुआ है।
हमलों में क्षतिग्रस्त या डूबे ईरानी युद्धपोत अब पर्शियन गल्फ के तटीय नौसैनिक ठिकानों पर पड़े हैं। इसके बावजूद Islamic Revolutionary Guards Corps Navy द्वारा संचालित एक ‘छाया बेड़ा’ अभी भी बड़ा खतरा बना हुआ है। यह बेड़ा छोटी, फुर्तीली नौकाओं से बना है, जिन्हें हिट-एंड-रन हमलों के लिए तैयार किया गया है और यह ईरान की असममित (asymmetric) नौसैनिक रणनीति की रीढ़ है।
इन नौकाओं के साथ-साथ उनसे या तटीय छिपे ठिकानों से दागे गए मिसाइल और ड्रोन ने हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में व्यावसायिक जहाजों की आवाजाही को बाधित किया है। ईरान ने पहले लेबनान में युद्धविराम तक इस महत्वपूर्ण मार्ग को बंद रखने की चेतावनी दी थी। हालांकि बाद में अधिकारियों के बयान अलग-अलग रहे, लेकिन अंततः ईरानी सेना ने कहा कि जलडमरूमध्य “पहले की स्थिति” में लौट आया है और उस पर उसका सख्त नियंत्रण है।
Islamic Revolutionary Guards Corps Navy, ईरान की नियमित नौसेना से अलग काम करती है और गुरिल्ला शैली की असममित युद्ध नीति अपनाती है। पारंपरिक नौसैनिक लड़ाइयों के बजाय यह छोटी और मुश्किल से पकड़ी जाने वाली नौकाओं के जरिए अचानक हमलों पर निर्भर करती है। विश्लेषकों के मुताबिक, मोबाइल जमीन आधारित सिस्टम से छोड़े गए ड्रोन कई समुद्री हमलों के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं, जिनमें संघर्ष के दौरान कम से कम 20 जहाज निशाना बने।
भारी नुकसान के बावजूद—जिसमें इसकी लगभग आधी तेज हमलावर नौकाएं शामिल हैं—आईआरजीसी नौसेना के पास अब भी सैकड़ों या हजारों की संख्या में फैला हुआ बेड़ा मौजूद है। इनमें से कई नौकाएं ईरान के तट पर बने किलेबंद ठिकानों और भूमिगत अड्डों में छिपी रहती हैं, जिससे उन्हें तेजी से तैनात किया जा सकता है।
यह रणनीति Iran-Iraq War के दौरान मिले अनुभवों से विकसित हुई। अमेरिका जैसी शक्तिशाली नौसेना से सीधे मुकाबले में कमजोरी देखने के बाद ईरान ने टकराव के बजाय बाधा उत्पन्न करने और परेशान करने की नीति अपनाई। वर्तमान में आईआरजीसी नौसेना में करीब 50,000 कर्मी हैं और यह खाड़ी के कई क्षेत्रों में सक्रिय है, जिनमें द्वीपों पर बने ठिकाने भी शामिल हैं।
शुरुआत में ईरान ने साधारण नौकाओं को मशीन गन और रॉकेट-प्रोपेल्ड ग्रेनेड से लैस कर इस्तेमाल किया था, लेकिन अब इसकी क्षमता काफी बढ़ चुकी है। आज इसके पास हाई-स्पीड बोट, छोटे पनडुब्बी और समुद्री ड्रोन मौजूद हैं। कुछ नौकाएं 100 नॉट्स से अधिक की रफ्तार हासिल कर सकती हैं, जिससे वे तेजी से हमला कर बच निकलने में सक्षम हैं।
जहां अमेरिकी युद्धपोत इन खतरों से निपटने के लिए उन्नत हथियारों से लैस हैं, वहीं व्यावसायिक जहाज काफी कमजोर स्थिति में हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान ने अभी तक बड़े पैमाने पर “स्वार्म अटैक” (एक साथ कई नौकाओं का हमला) का परीक्षण नहीं किया है, लेकिन इसकी संभावना चिंता का विषय बनी हुई है, खासकर संकरे और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में।
क्षेत्र में तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई है। अमेरिकी नौसेना, जो ईरानी शिपिंग पर नाकेबंदी लागू कर रही है, ज्यादातर जलडमरूमध्य से दूर ओमान की खाड़ी और अरब सागर में तैनात है। वहीं, ईरान ने चेतावनी दी है कि वह अपने ऑपरेशन को रेड सी जैसे अन्य महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों तक भी बढ़ा सकता है।
आईआरजीसी नौसेना का अमेरिका के साथ टकराव का लंबा इतिहास रहा है, जिसमें अमेरिकी युद्धपोतों के करीब तेज रफ्तार से पहुंचना और 2016 में अमेरिकी नौसैनिकों को पकड़ना शामिल है। अब ड्रोन युद्ध के जुड़ने से खतरा और बढ़ गया है, क्योंकि कम लागत वाले ये सिस्टम महंगे सैन्य लक्ष्यों को भी गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं।
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