राज्यपालों की शक्तियां और न्यायिक सीमाएं: राष्ट्रपति के रेफरेंस पर संविधान पीठ में सुनवाई करेगा सुप्रीम कोर्ट
भारत के राष्ट्रपति ने एक दुर्लभ और महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट को एक राष्ट्रपति रेफरेंस (Presidential Reference) भेजा है, जिसमें राज्यपालों की शक्तियों और सर्वोच्च न्यायालय की स्वयं की सीमाओं को लेकर कुछ अहम कानूनी सवालों पर स्पष्टता..
नयी दिल्ली। भारत के राष्ट्रपति ने एक दुर्लभ और महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट को एक राष्ट्रपति रेफरेंस (Presidential Reference) भेजा है, जिसमें राज्यपालों की शक्तियों और सर्वोच्च न्यायालय की स्वयं की सीमाओं को लेकर कुछ अहम कानूनी सवालों पर स्पष्टता मांगी गई है। अब इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ करेगी, जिसकी अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई करेंगे।
यह रेफरेंस विशेष रूप से 8 अप्रैल 2025 को सुप्रीम कोर्ट की एक दो-न्यायाधीशीय पीठ द्वारा दिए गए उस आदेश को चुनौती देता है, जो राज्यपालों की शक्तियों से जुड़ा था। राष्ट्रपति का कहना है कि यह आदेश न्यायपालिका की “स्पष्ट अतिरेक” (clear overreach) का उदाहरण है। इसके तहत सुप्रीम कोर्ट से 14 जटिल कानूनी प्रश्नों पर विचार के लिए संविधान पीठ गठित करने का औपचारिक आग्रह किया गया है।
राष्ट्रपति की चिंता का मूल बिंदु सुप्रीम कोर्ट द्वारा संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग है। यह अनुच्छेद न्यायालय को किसी भी मामले में "पूर्ण न्याय" के लिए आवश्यक कोई भी आदेश पारित करने का अधिकार देता है। राष्ट्रपति का रेफरेंस विशेष रूप से यह प्रश्न उठाता है कि जब संविधान खुद किसी कार्यवाही के लिए समय-सीमा निर्धारित नहीं करता, तो क्या सुप्रीम कोर्ट किसी कार्य के लिए समयसीमा (timeline) तय कर सकता है — खासकर राज्यपाल या राष्ट्रपति द्वारा विधेयकों को स्वीकृति देने जैसे मामलों में?
राष्ट्रपति ने यह भी सवाल उठाया है कि क्या सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत अपने आदेशों के माध्यम से राष्ट्रपति और राज्यपाल की संवैधानिक शक्तियों का स्थानापन्न (substitute) बन सकता है? यह एक गंभीर चिंता है जो कार्यपालिका और विधायिका के क्षेत्र में न्यायपालिका के संभावित हस्तक्षेप की ओर इशारा करती है, और भारतीय संविधान में निहित शक्तियों के पृथक्करण (separation of powers) की अवधारणा को चुनौती देती है।
अब सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ इस रेफरेंस की सुनवाई में इन मौलिक संवैधानिक सिद्धांतों पर गहन मंथन करेगी। इस सुनवाई को भारतीय संवैधानिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है।
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