“अगर लंबित विधेयकों को मंज़ूरी दे सकते हैं, तो अन्य गवर्नर शक्तियों का इस्तेमाल क्यों नहीं?” — सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक अहम टिप्पणी की जब तमिलनाडु सरकार की ओर से यह दलील दी गई कि अदालत को गवर्नरों द्वारा लंबे समय तक लंबित रखे गए विधेयकों पर “स्वीकृति मानी हुई” (Deemed Assent) मान लेना..
नयी दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक अहम टिप्पणी की जब तमिलनाडु सरकार की ओर से यह दलील दी गई कि अदालत को गवर्नरों द्वारा लंबे समय तक लंबित रखे गए विधेयकों पर “स्वीकृति मानी हुई” (Deemed Assent) मान लेना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ के स्थान पर अब सीजेआई बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली पाँच-न्यायाधीशीय पीठ ने सवाल उठाया कि “अगर हम यह कर सकते हैं, तो क्यों न गवर्नर के स्थान पर विधेयक लौटाने या राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखने जैसी शक्तियों का भी इस्तेमाल करें?”
याचिकाकर्ता की दलीलें
- तमिलनाडु की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा..
- गवर्नर द्वारा बिना कारण बताए विधेयकों को लंबे समय तक रोकना संवैधानिक ढांचे का विकृतिकरण है।
- ऐसा करने से जनता की सर्वोच्चता और जनप्रतिनिधियों की मंशा कमजोर होती है।
- अदालत को गवर्नरों के लिए स्पष्ट समय-सीमा तय करनी चाहिए।
- यदि समय-सीमा का पालन न हो, तो ऐसे विधेयकों को “स्वीकृत” मान लिया जाए।
न्यायालय की टिप्पणियाँ
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने कहा कि अनुच्छेद 200 गवर्नर को चार विकल्प देता है..
- विधेयक को स्वीकृति देना।
- स्वीकृति रोकना।
- सुझावों के साथ विधेयक विधानसभा को लौटाना।
- राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखना।
उन्होंने सवाल किया कि “अगर अदालत लंबित विधेयकों को मंजूरी मान सकती है, तो क्या अदालत गवर्नर की अन्य संवैधानिक शक्तियों का भी प्रयोग कर सकती है?”
सीजेआई बी.आर. गवई ने कहा कि..
- अदालत ने पहले भी स्पीकर के मामलों में (जैसे 10वीं अनुसूची के तहत अयोग्यता याचिकाएँ) समय-सीमा तय की है।
- लेकिन, सामान्य रूप से सभी स्पीकरों के लिए समय-सीमा तय करने का काम संसद पर छोड़ा गया था।
गवर्नर बनाम जनप्रतिनिधि
सिंघवी ने कहा कि जब गवर्नर वर्षों तक विधेयक लंबित रख देते हैं और उनकी कार्यवाही को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती, तब वे “जेब में वीटो रखने वाले सुपर सीएम” की तरह हो जाते हैं। इससे चुनी हुई सरकार केवल दर्शक बनकर रह जाती है।
केंद्र की प्रतिक्रिया
- सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अगर गवर्नरों द्वारा विधेयकों को रोके जाने के उदाहरण गिनाए गए तो यह “गंदी राह” होगी।
- उन्होंने कहा कि वे इसके जवाब में हलफ़नामा दाखिल कर बताएंगे कि आज़ादी के बाद से ही संविधान के साथ कैसे खिलवाड़ हुआ।
अदालत का रुख
सीजेआई गवई ने स्पष्ट किया कि..
- अदालत तमिलनाडु, केरल या कर्नाटक जैसे राज्यों में गवर्नरों की कार्यप्रणाली से प्रभावित होकर फैसला नहीं करेगी।
- वह केवल राष्ट्रपति के परामर्श (Presidential Reference) पर उठाए गए सवालों का संवैधानिक दायरे में जवाब देगी।
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