मनरेगा में मजदूरी बकाया 1,340 करोड़ रुपये तक पहुंचा, सिर्फ 4 राज्यों में 82% बकाया—आंकड़ों से खुलासा
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत मजदूरी भुगतान में बकाया राशि बढ़कर 1,340 करोड़ रुपये हो गई है। इसमें से करीब 1,095 करोड़ रुपये यानी हर 10 रुपये में से लगभग 8 रुपये—सिर्फ चार राज्यों में ही लंबित..
मनरेगा में मजदूरी बकाया 1,340 करोड़ रुपये तक पहुंचा, सिर्फ 4 राज्यों में 82% बकाया—आंकड़ों से खुलासा
नयी दिल्ली। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत मजदूरी भुगतान में बकाया राशि बढ़कर 1,340 करोड़ रुपये हो गई है। इसमें से करीब 1,095 करोड़ रुपये यानी हर 10 रुपये में से लगभग 8 रुपये—सिर्फ चार राज्यों में ही लंबित हैं।
ग्रामीण विकास मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 5 दिसंबर तक आंध्र प्रदेश में मजदूरी बकाया सबसे अधिक 402.93 करोड़ रुपये था। इसके बाद केरल में 339.87 करोड़ रुपये का बकाया है। तमिलनाडु 220.13 करोड़ रुपये के साथ तीसरे स्थान पर है, जबकि मध्य प्रदेश में 131 करोड़ रुपये की मजदूरी लंबित है।
दिलचस्प बात यह है कि ये वही राज्य नहीं हैं जहां मनरेगा के तहत सबसे अधिक सक्रिय श्रमिक हैं। मजदूरी बकाया और सक्रिय कार्यबल के विश्लेषण से स्पष्ट असंतुलन सामने आता है, जहां अपेक्षाकृत कम श्रमिकों वाले राज्य मजदूरी भुगतान में देरी का बड़ा कारण बन रहे हैं।
NREGASoft के अनुसार, मनरेगा के तहत कुल श्रमिकों की संख्या 27.64 करोड़ है, जिनमें से 1 दिसंबर तक 12.16 करोड़ श्रमिक सक्रिय थे।
आंध्र प्रदेश में कुल 1.1 करोड़ पंजीकृत श्रमिक हैं, जिनमें से लगभग 90.54 लाख सक्रिय हैं। सक्रिय श्रमिकों की संख्या के लिहाज से यह राज्य छठे स्थान पर है, लेकिन देश की कुल लंबित मजदूरी का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा अकेले इसी राज्य में है।
केरल में कुल 58.03 लाख श्रमिक पंजीकृत हैं और इनमें से 22.63 लाख सक्रिय हैं। इसके बावजूद, देश की कुल मजदूरी बकाया राशि का 25 प्रतिशत केरल में लंबित है, जो आंध्र प्रदेश के बाद दूसरा सबसे बड़ा हिस्सा है।
सामूहिक रूप से देखें तो ये चारों राज्य देश के कुल सक्रिय मनरेगा श्रमिकों का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं, लेकिन कुल लंबित मजदूरी का करीब 82 प्रतिशत इन्हीं राज्यों में केंद्रित है।
उत्तर प्रदेश: सबसे अधिक सक्रिय श्रमिक, लेकिन बकाया सबसे कम
उत्तर प्रदेश में कुल 2.34 करोड़ पंजीकृत श्रमिक हैं और 1.2 करोड़ सक्रिय श्रमिकों के साथ यह देश का सबसे बड़ा सक्रिय मनरेगा कार्यबल है। इसके बावजूद, राज्य में कुल लंबित मजदूरी सिर्फ 33.18 करोड़ रुपये है, जो 1,340 करोड़ रुपये के कुल बकाया का मात्र 2.5 प्रतिशत है।
राजस्थान में 2.33 करोड़ पंजीकृत श्रमिक हैं और 1.17 करोड़ सक्रिय श्रमिकों के साथ यह देश का दूसरा सबसे बड़ा सक्रिय मनरेगा कार्यबल है। इसके बावजूद, यहां मजदूरी बकाया सिर्फ 5.04 करोड़ रुपये है, जो राष्ट्रीय स्तर पर कुल बकाया का केवल 0.38 प्रतिशत है।
मध्य प्रदेश में 1.87 करोड़ पंजीकृत श्रमिक हैं और 1 करोड़ से अधिक सक्रिय श्रमिक हैं, जिससे यह देश का तीसरा सबसे बड़ा सक्रिय मनरेगा कार्यबल बनता है। हालांकि, जैसा कि पहले बताया गया है, मध्य प्रदेश का मजदूरी बकाया राष्ट्रीय कुल का लगभग 10 प्रतिशत है, जो असमान रूप से अधिक है।
महाराष्ट्र में देश में मनरेगा के तहत सबसे अधिक पंजीकृत श्रमिक हैं 3.32 करोड़। हालांकि, सक्रिय श्रमिकों की संख्या 88.79 लाख है, जो चौथे स्थान पर है। इसके बावजूद, राज्य में मजदूरी बकाया सिर्फ 14.87 करोड़ रुपये है, जो देश के कुल बकाया का 1.1 प्रतिशत है।
तमिलनाडु में 1.10 करोड़ पंजीकृत श्रमिक हैं और 88.66 लाख सक्रिय श्रमिकों के साथ यह सक्रिय कार्यबल के लिहाज से पांचवें स्थान पर है। लेकिन मजदूरी बकाया के मामले में यह तीसरे स्थान पर है, जहां देश के कुल बकाया का 16.4 प्रतिशत हिस्सा लंबित है।
मनरेगा एक मांग-आधारित मजदूरी रोजगार योजना है और आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार इसके तहत फंड जारी करने की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। योजना के तहत मजदूरी का भुगतान केंद्र सरकार द्वारा प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) प्रणाली के माध्यम से सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में किया जाता है।
मंत्रालय द्वारा राज्यों से निर्धारित प्रक्रिया के बाद प्राप्त फंड ट्रांसफर ऑर्डर के आधार पर सार्वजनिक वित्त प्रबंधन प्रणाली (PFMS) के जरिए प्रतिदिन मजदूरी भुगतान की स्वीकृति दी जाती है।
वित्त वर्ष 2024-25 के लिए इस योजना के तहत 86,000 करोड़ रुपये का बजट आवंटन किया गया था, जो योजना की शुरुआत से अब तक बजट अनुमान (BE) चरण में किया गया सबसे बड़ा आवंटन है। वित्त वर्ष 2025-26 में भी सरकार ने इस आवंटन को 86,000 करोड़ रुपये पर बरकरार रखा है, जिससे ग्रामीण रोजगार को निरंतर समर्थन सुनिश्चित किया गया है।
इसके अलावा, पश्चिम बंगाल को छोड़कर वित्त वर्ष 2024-25 तक की सभी लंबित मजदूरी देनदारियां पहले ही चुकाई जा चुकी हैं। अधिनियम की धारा 27 के प्रावधानों के तहत, केंद्र सरकार के निर्देशों का पालन न करने के कारण मार्च 2022 से पश्चिम बंगाल को फंड जारी करना बंद कर दिया गया है।
जुलाई के अंत तक के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में योजना के तहत 47,567 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं, जिनमें से 39,595 करोड़ रुपये मजदूरी भुगतान के लिए हैं।
नवंबर के अंत तक राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कुल 68,393.67 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके हैं। इसमें 57,853.62 करोड़ रुपये मजदूरी मद के लिए और 10,540.05 करोड़ रुपये सामग्री एवं प्रशासनिक खर्च के लिए शामिल हैं।
जब केंद्र सरकार इस योजना के लिए अब तक का सबसे बड़ा आवंटन बनाए हुए है, तब चुनौती केवल धन की उपलब्धता की नहीं रह गई है, बल्कि यह सुनिश्चित करने की है कि मस्टर रोल से लेकर श्रमिकों के बैंक खातों तक भुगतान की प्रक्रिया तेज और समान रूप से लागू हो। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक मजदूरी बकाया कुछ चुनिंदा राज्यों में सिमटा रहेगा, जिससे उस योजना का उद्देश्य प्रभावित होगा, जिसे काम और गरिमा की गारंटी देने के लिए बनाया गया है।
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