मद्रास हाईकोर्ट में पहाड़ी तीर्थस्थल पर दीप प्रज्ज्वलन के खिलाफ दरगाह की याचिका पर सुनवाई

हज़रत सुल्तान सिकंदर बदूशा औलिया दरगाह ने तिरुपरंकुंद्रम पहाड़ियों के शीर्ष पर स्थित पत्थर के स्तंभ (दीपथून) पर दीप जलाने के निर्देश देने वाले एकल न्यायाधीश के आदेश को चुनौती देते हुए सोमवार (15 दिसंबर) को मद्रास हाईकोर्ट (मदुरै पीठ) में दलील दी कि वर्ष 1920 में अल्पसंख्यक समुदाय को दी गई भूमि का शांतिपूर्वक उपभोग करने में उसे गंभीर कठिनाइयों का सामना करना..

मद्रास हाईकोर्ट में पहाड़ी तीर्थस्थल पर दीप प्रज्ज्वलन के खिलाफ दरगाह की याचिका पर सुनवाई
17-12-2025 - 10:29 AM
22-04-2026 - 05:53 PM

चेन्नई। हज़रत सुल्तान सिकंदर बदूशा औलिया दरगाह ने तिरुपरंकुंद्रम पहाड़ियों के शीर्ष पर स्थित पत्थर के स्तंभ (दीपथून) पर दीप जलाने के निर्देश देने वाले एकल न्यायाधीश के आदेश को चुनौती देते हुए सोमवार (15 दिसंबर) को मद्रास हाईकोर्ट (मदुरै पीठ) में दलील दी कि वर्ष 1920 में अल्पसंख्यक समुदाय को दी गई भूमि का शांतिपूर्वक उपभोग करने में उसे गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

न्यायमूर्ति जी. जयचंद्रन और न्यायमूर्ति के.के. रामकृष्णन की पीठ कई अपीलों पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें दरगाह प्रबंधन द्वारा दायर वह अपील भी शामिल है, जिसमें मंदिर प्रशासन को पत्थर के स्तंभ पर दीप जलाने का निर्देश देने वाले एकल न्यायाधीश के आदेश को चुनौती दी गई है। एकल न्यायाधीश ने पहले यह माना था कि दीपथून मुस्लिम समुदाय की भूमि पर स्थित नहीं है और इसलिए वहां दीप जलाने से समुदाय के अधिकारों का उल्लंघन नहीं होगा।

दरगाह की दलील: ‘खुद की रक्षा के लिए खंजर उठाने को मजबूर किया जा रहा है’

राज्य प्राधिकारियों ने भी एकल न्यायाधीश के 4 दिसंबर के उस आदेश को चुनौती देते हुए अपील दायर की है, जो अवमानना याचिका में पारित हुआ था और जिसमें दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 144 के तहत जारी निषेधाज्ञा को रद्द कर दिया गया था। इसके अलावा, उसी अवमानना कार्यवाही में 9 दिसंबर को पारित आदेश के खिलाफ भी अपीलें दाखिल की गई हैं, जिनमें मुख्य सचिव, एडीजीपी और डीसीपी की व्यक्तिगत उपस्थिति का निर्देश दिया गया था तथा केंद्रीय गृह सचिव को भी पक्षकार बनाया गया था।

सुनवाई के दौरान दरगाह की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता टी. मोहन ने पशु बलि से संबंधित एक पूर्व निर्णय का हवाला दिया, जिसमें पहाड़ी पर ऐसी प्रथाओं की अनुमति देने से इनकार किया गया था। उन्होंने कहा कि उस आदेश में दरगाह की भूमि पर शौचालय, बिजली और जलापूर्ति जैसी बुनियादी सुविधाओं की स्थापना पर भी रोक लगा दी गई थी। उन्होंने आगे बताया कि नेल्लिथोप क्षेत्र, जो दरगाह का हिस्सा है, वहां नमाज़ की अनुमति नहीं दी जाती क्योंकि इससे काशी विश्वनाथर मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या प्रभावित हो सकती है।

मोहन ने कहा, अब मैं यह कह सकता हूं कि भीड़ दरगाह की ओर जाने वाले रास्ते पर कब्जा कर सकती है। यह नहीं हो सकता कि 1920 में दी गई भूमि का उपभोग करते समय अल्पसंख्यक समुदाय को इतनी परेशानियों का सामना करना पड़े और हर चरण पर हमें ऐसे अतिक्रमणों से अपनी रक्षा के लिए खंजर उठाने को मजबूर किया जाए।”

प्रक्रिया में अनुचितता का आरोप

मोहन ने यह भी दलील दी कि प्रारंभ में दरगाह को कार्यवाही में पक्षकार नहीं बनाया गया था और बाद में बिना उचित अवसर दिए उसे रिकॉर्ड पर लाया गया। इस पर अदालत ने मौखिक रूप से कहा कि फिलहाल वह एकल न्यायाधीश के आदेश में प्रक्रियागत खामियों पर विचार नहीं कर रही है। इसके जवाब में मोहन ने कहा कि प्रक्रियागत अनुचितता स्वयं किसी आदेश को अवैध बना सकती है। पीठ ने मौखिक टिप्पणी की, आप मान लीजिए कि उन सभी पहलुओं पर विचार किया जाएगा। आपको इस पर समय बर्बाद करने की जरूरत नहीं है। अन्य वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने इसे इंगित किया है। अभी हमें यह देखना है कि क्या कोई कानूनी त्रुटि है।”

मोहन ने कार्यवाही को तेज़ी से आगे बढ़ाए जाने पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि रिट नियमों के अनुसार, सामान्यतः प्रतिवादी को जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए आठ सप्ताह का समय दिया जाता है, जबकि दरगाह को केवल तीन दिन का समय दिया गया।
उन्होंने कहा, माननीय न्यायाधीश ने इसे तीन दिन तक सीमित करना उचित समझा। यह विवादास्पद है कि ऐसा प्रतिबंध लगाया जा सकता था या नहीं। कम से कम इसका उल्लेख डॉकेट आदेश में होना चाहिए था, जिसमें मुझे जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया जाता।”

मोहन ने यह भी आरोप लगाया कि उन्होंने याचिका की पोषणीयता (maintainability) पर प्रारंभिक आपत्ति उठाई थी, लेकिन उन्हें सुना नहीं गया और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से अचानक हटा दिया गया। उन्होंने यह भी बताया कि एकल न्यायाधीश ने स्थल निरीक्षण किया और सभी पक्षों को आमंत्रित किया, लेकिन उस दिन दरगाह का प्रतिनिधित्व नहीं था क्योंकि तब तक उसे पक्षकार नहीं बनाया गया था।

उन्होंने कहा कि एकल न्यायाधीश ने ऐसा नया मामला गढ़ दिया जो किसी भी पक्ष की दलीलों में नहीं था। उन्होंने कहा कि यह किसी का भी मामला नहीं था कि दरगाह कब्जा करने की कोशिश कर रही है। मोहन के अनुसार, न्यायाधीश ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता की प्रस्तुति कमजोर थी, इसलिए वे अन्य लोगों की दलीलों को ध्यान में रखेंगे।

मोहन ने इस टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति जताई कि दीप जलाने का विरोध कुछ निहित स्वार्थों के इशारे पर किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता ने खुद को हिंदू मक्कल कच्ची का सदस्य बताया था, लेकिन यह बात अपने हलफनामे में छिपाई। मोहन ने कहा, हमें यह जानकारी उसके ट्विटर हैंडल से मिली। हमने इसे अपने जवाबी हलफनामे में विशेष रूप से दर्ज किया है। वह पुलिस सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की मांग कर रहा है। कुछ तीसरे पक्ष हैं जो जानबूझकर माहौल बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं।

सांप्रदायिक सौहार्द पर जोर

मोहन ने कहा कि मदुरै क्षेत्र में हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच कभी कोई समस्या नहीं रही है। उन्होंने कहा, कभी-कभार कुछ निहित स्वार्थी तत्व ही परेशानी पैदा करते हैं। अगर हर श्रद्धालु अपने तरीके से चीज़ें करने पर अड़ा रहेगा, तो इसका कोई अंत नहीं होगा।” 
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि यदि याचिकाकर्ता किसी धार्मिक परंपरा के अस्तित्व का दावा कर रहे हैं, तो उसे सिविल कोर्ट में सिद्ध करना होगा जैसा कि पशु बलि से जुड़े एक पुराने फैसले में हाईकोर्ट ने कहा था।

राज्य ने दीप प्रज्ज्वलन के खिलाफ ऐतिहासिक ग्रंथों का हवाला दिया

इस बीच, राज्य के हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्त (HR&CE) विभाग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता आर. शुनमुगसुंदरम ने कहा कि अदालत के पूर्व प्रश्न के उत्तर में आयुक्त ने बताया है कि वे इस मुद्दे पर श्रद्धालु के अभ्यावेदन पर विचार करने के लिए तैयार हैं।

संयुक्त आयुक्त, HR&CE विभाग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एन. जोथी ने कहा कि तमिलनाडु मंदिर प्रवेश प्राधिकरण अधिनियम की धारा 4 ट्रस्टियों को नियम बनाने का अधिकार देती है। अदालत ने मौखिक रूप से पूछा कि क्या मंदिर के लिए निर्वाचित बोर्ड मौजूद है। इस पर जोथी ने कहा कि निर्वाचित और नामित बोर्ड मौजूद है और प्रभावी रूप से कार्य कर रहा है।

जोथी ने 1981 में प्रकाशित एक पुस्तक का हवाला दिया, जिसे एक पुरातत्व विशेषज्ञ ने लिखा है। उन्होंने कहा, इस लेखक ने विशेष रूप से दीप जलाने का उल्लेख किया है। यह पुस्तक पहले ही अदालत के समक्ष रखी जानी चाहिए थी।”
पुस्तक के अंश पढ़ते हुए उन्होंने बताया कि इसमें घी का उपयोग कर दीपथून पर दीप जलाने की प्रक्रिया का वर्णन है।

उन्होंने यह भी कहा कि पुस्तक की पहली तस्वीर तिरुपरंकुंद्रम पहाड़ी की है, जहां दीप जलाने का निर्देश दिया गया है। उन्होंने बताया कि इसी तरह का एक और स्तंभ लगभग 20 किलोमीटर दूर स्वामियार मलाई में भी है और दोनों की बनावट एक जैसी है। उन्होंने कहा, सभी स्तंभ अधूरे हैं। पृष्ठ 4 पर एक अन्य स्तंभ का उल्लेख है। पृष्ठ 5 पर दो स्तंभों का सामने का दृश्य है। अंतिम पृष्ठ पर भी इसी प्रकार का स्तंभ दिखाया गया है। डिजाइन, चबूतरा और ऊंचाई समान हैं। ऐसे स्तंभ अलग-अलग स्थानों पर हैं। इन्हें कार्तिकै दीपम के लिए नहीं बनाया गया था।” 

जैन साधुओं के लिए थे स्तंभ: HR&CE के वकील

जोथी ने वेंकटस्वामी द्वारा लिखित एक अन्य पुस्तक का भी हवाला दिया, जिसमें मदुरै क्षेत्र और तिरुपरंकुंद्रम पहाड़ियों का विवरण है। उन्होंने कहा कि दिगंबर..जो परंपरागत रूप से वस्त्र नहीं पहनते—मध्य प्रदेश से मदुरै आए थे और अक्सर पहाड़ियों में रहते थे ताकि वे दूसरों, विशेषकर महिलाओं, की नजरों से दूर रह सकें।

जोथी के अनुसार, ये दिगंबर अक्सर एकत्र होते थे और संबंधित स्तंभों का उपयोग रात के समय प्रकाश के स्रोत के रूप में किया जाता था। उन्होंने कहा, ये स्तंभ कार्तिकै दीपम के लिए नहीं थे, बल्कि मुनियों को प्रकाश देने के लिए उपयोग में लाए जाते थे।

अदालत ने स्तंभों पर शिलालेखों के उल्लेख और क्या समान स्तंभ समनार मलाई में भी मौजूद है, इस पर स्पष्टीकरण मांगा। जोथी ने कहा कि इसकी पुष्टि की जानी होगी और स्तंभों की कालावधि अलग-अलग हो सकती है।

उन्होंने चेतावनी दी कि इन स्तंभों की प्रकृति में किसी भी तरह का परिवर्तन या रूपांतरण अधिनियम के तहत प्रतिबंधित है। उन्होंने यह भी बताया कि याचिकाकर्ताओं ने दोपहर 2:15 बजे मंदिर के कार्यकारी अधिकारी को अभ्यावेदन दिया और उसी दिन हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर दी।

जोथी ने कहा कि प्रशासन को धर्मनिरपेक्ष रहना होगा, क्योंकि विभाग विभिन्न संप्रदायों और परंपराओं वैष्णव, तेंगलाई और वडाकलाई से जुड़े मंदिरों का प्रबंधन करता है। उन्होंने कहा कि जिस स्तंभ की बात हो रही है, वह बाईं ओर है और अब तक उस पर कभी दीप नहीं जलाया गया इसलिए उसकी प्रकृति बदली नहीं जा सकती।
उन्होंने यह भी जोड़ा कि याचिकाकर्ता हर स्तंभ पर कार्तिकै दीपम जलाने की मांग नहीं कर सकते।

मेरे स्वामित्व अधिकारों का प्रश्न’

दरगाह की ओर से पेश एक अन्य अधिवक्ता ने कहा कि एकल न्यायाधीश के आदेश में प्रक्रियागत अनियमितताएं हैं। उन्होंने कहा कि न्यायाधीश ने यह निष्कर्ष दर्ज किए कि दरगाह कैसे प्रभावित होगी  

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THE NEWS THIKANA, संपादकीय डेस्क यह द न्यूजठिकाना डॉट कॉम की संपादकीय डेस्क है। डेस्क के संपादकीय सदस्यों का प्रयास रहता है कि अपने पाठकों को निष्पक्षता और निर्भीकता के साथ विभिन्न विषयों के सच्चे, सटीक, विश्वसनीय व सामयिक समाचारों के अलावाआवश्यक उल्लेखनीय विचारों को भी सही समय पर अवगत कराएं।